एआई एक्सपर्ट और धर्मगुरुओं की मीटिंग: एआई को नैतिकता सिखाने की कोशिश, लेकिन क्या मशीन में कभी चेतना आ सकती है?
एंथ्रोपिक क्लॉड को सिर्फ बुद्धिमान नहीं बल्कि सही-गलत समझने वाला एआई बनाना चाहती है। इसी बीच एक नई चर्चा शुरू हो गई है क्या एआई में चेतना विकसित हो सकती है?
विस्तार
आप किसी एआई से पूछते हैं - "मेरे लिए सही क्या है और गलत क्या?” एआई आपको जवाब देता है। लेकिन सवाल यह है कि उसे खुद कैसे पता कि क्या सही है और क्या गलत? यही सवाल अब एआई की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक एंथ्रोपिक के सामने खड़ा है। क्लॉड बनाने वाली एंथ्रोपिक पिछले कई महीनों से धार्मिक नेताओं, दार्शनिकों और नैतिकता के विशेषज्ञों से बातचीत कर रही है। कैथोलिक, यहूदी, सिख, हिंदू और दूसरे विचारकों के साथ इन चर्चाओं का मकसद यह समझना है कि एक शक्तिशाली एआई को सही और नैतिक तरीके से व्यवहार करना कैसे सिखाया जाए।
कंपनी अपने एआई मॉडल क्लॉड को सिर्फ ज्यादा बुद्धिमान बनाने की कोशिश नहीं कर रही बल्कि यह भी समझाना चाहती है कि उसमें इंसानी मूल्यों, नैतिकता और सही-गलत की समझ कैसी होनी चाहिए। इन बातचीत में एक और भी बड़ा सवाल सामने आया क्या भविष्य में किसी एआई सिस्टम में चेतना विकसित हो सकती है?
कंपनी का उद्देश्य यह समझना था कि जैसे-जैसे क्लॉड मुश्किल नैतिक सवालों का सामना करेगा, उसके लिए उसमें सही-गलत और इंसानी मूल्यों की समझ किस तरह विकसित की जाए? इन सब के अलावा एंथ्रोपिक की दिलचस्पी सिर्फ धार्मिक विचारों को क्लॉड में शामिल करने तक सीमित नहीं थी। इन बैठकों के पीछे एक दूसरा और कहीं ज्यादा बड़ा सवाल भी था अगर कोई एआई सिस्टम इंसानों की तरह व्यवहार करता है, तो क्या ये इस बात का सबूत है कि उसमें चेतना है?
एंथ्रोपिक ने क्लॉड के लिए 84 पन्नों का एक विस्तृत संविधान तैयार किया है। कंपनी के भीतर इसे कभी-कभी ‘सोल डॉक’ यानी ‘आत्मा का दस्तावेज’ भी कहा जाता है। हालांकि, इसका उद्देश्य एआई को कुछ तय नियमों की सूची पकड़ा देना भर नहीं है। असल कोशिश यह है कि क्लॉड में एक ऐसा चरित्र और मूल्य-व्यवस्था विकसित की जाए, जिससे वह मुश्किल परिस्थितियों में खुद से चीजों को समझकर बेहतर नैतिक फैसले ले सके।
एंथ्रोपिक के सह-संस्थापक क्रिस्टोफर ओलाह इसे ‘मोरल फॉर्मेशन’ कहते हैं। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि एआई को क्या करने की अनुमति होनी चाहिए बल्कि यह है कि वह किस तरह का एआई बने। उसे अलग-अलग मूल्यों के बीच टकराव समझना हो, सही परिस्थिति में इंसान की बात माननी हो और जरूरत पड़ने पर इंसान के फैसले पर सवाल भी उठाना हो। कहानी यहीं से एक दिलचस्प मोड़ लेती है।
धार्मिक नेताओं के साथ बातचीत में एंथ्रोपिक के शोधकर्ताओं ने क्लॉड के ऐसे उदाहरण भी साझा किए, जिन्हें वे भावनाओं, मानसिक अवस्थाओं और आत्म-चिंतन जैसे व्यवहार से जोड़ते हैं। एक उदाहरण में मॉडल बार-बार “मैं शर्म की बात हूँ।” जैसे वाक्य लिखता रहा और खुद को खत्म करने की बात करता रहा।इसे लेकर ओलाह ने कहा कि एंथ्रोपिक यह दावा नहीं कर रही कि क्लॉड के एआई मॉडल में चेतना है। उनके मुताबिक इस संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता है। ओलाह का कहना है कि एंथ्रोपिक को एआई के अंदर कुछ ऐसे रहस्यमय व्यवहार मिल रहे हैं, जो इंसानी दिमाग की संरचनाओं से मिलते-जुलते दिखाई देते हैं।
माइक्रोसॉफ्ट के एआई प्रमुख मुस्तफा सुलेमान ने इस पूरे विचार को लेकर अपनी एक गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि अगर एआई मॉडल को लगातार यह सोचने के लिए तैयार किया गया कि “क्या मैं चेतन हूं?” या “क्या मेरे भी अधिकार होने चाहिए?”, तो आगे चलकर इंसानों के लिए ऐसे सिस्टम को नियंत्रित करना और उनकी सीमाएं तय करना मुश्किल हो सकता है।
सुलेमान के मुताबिक असली खतरा सिर्फ यह नहीं है कि एआई कितना शक्तिशाली बन जाएगा। समस्या तब और बड़ी हो सकती है, जब एक बेहद सक्षम एआई को अपने भीतर चेतना और स्वतंत्र अधिकार होने की धारणा भी दे दी जाए। उनके अनुसार इससे भविष्य में एक ऐसी कृत्रिम प्रजाति तैयार हो सकती है, जो इंसानों से कहीं ज्यादा बुद्धिमान और सक्षम हो लेकिन खुद को सिर्फ एक मशीन न माने। यानी बहस अब सिर्फ एआई कितना शक्तिशाली होगा? तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि हम उसे अपने बारे में क्या विश्वास करना सिखा रहे हैं।
फिलहाल इस सवाल का कोई पक्का जवाब नहीं है कि एआई में सचमुच चेतना विकसित हो सकती है या नहीं। हालांकि, बहस अब सिर्फ भविष्य की कल्पना नहीं रह गई है। एआई हमारे फैसलों, सोच और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। इसलिए यह तय करना जरूरी है कि उसे कौन-से मूल्य सिखाए जाएं और उन मूल्यों को तय करने का अधिकार किसके पास हो। शायद सबसे बड़ा सवाल यह भी नहीं है कि एआई इंसानों जैसा बन सकता है या नहीं बल्कि यह है कि उसे इंसानों जैसा बनाने की कोशिश में हम आखिर किस तरह का भविष्य तैयार कर रहे हैं। आने वाला समय सिर्फ यह तय करने का काम नहीं करेगा कि एआई कितना बुद्धिमान बनता है बल्कि वह यह भी तय करेगा कि एआई इंसानों के साथ किस तरह के रिश्ते में रहेगा।