हिमाचल हाईकोर्ट बड़े फैसले: याचिकाकर्ता साफ हाथों से आएं, तथ्य छिपाने वाली याचिका खारिज
उच्च न्यायालय ने राजस्व रिकॉर्ड में सुधार से जुड़ी एक रिट याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि अदालत में आने वाले याचिकाकर्ता को साफ हाथों यानी बिना किसी तथ्य को छिपाए आना चाहिए। जानिए हाईकोर्ट के बड़े फैसले
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हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राजस्व रिकॉर्ड में सुधार से जुड़ी एक रिट याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि अदालत में आने वाले याचिकाकर्ता को साफ हाथों यानी बिना किसी तथ्य को छिपाए आना चाहिए। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने याचिकाकर्ता वीर कली की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि जब याचिकाकर्ता ने तथ्य छिपाए हों और अपील दायर करने में हुई देरी का कोई उचित कारण न दिया हो तो अदालत ऐसे मामलों में राहत नहीं दे सकती। पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसे कलेक्टर के आदेश की जानकारी जून 2020 में मिली। हालांकि, रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि आदेश की प्रमाणित प्रति याचिकाकर्ता ने 6 दिसंबर 2019 को ही प्राप्त कर ली थी।
इसके अलावा 26 नवंबर 2019 को याचिकाकर्ता के बेटे की मौजूदगी में म्यूटेशन भी दर्ज हुआ था। हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ने अदालत से महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए और गलत तथ्य पेश करने की कोशिश की। याचिकाकर्ता ने अपील दायर करने में हुई 7 महीने की देरी का कोई संतोषजनक या स्पष्ट कारण पेश नहीं किया। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि इस दौरान निजी प्रतिवादी द्वारा दायर दीवानी मुकदमे में उनके पक्ष में डिक्री पारित हो चुकी है और उन्हें विवादित भूमि का कब्जा भी सौंपा जा चुका है। कलेक्टर द्वारा 21 अगस्त 2019 को दिए गए आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता वीर कली ने देरी से अपील दायर की थी, जिसे संभागीय आयुक्त और बाद में वित्तीय आयुक्त (अपील) ने खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसे उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। यह मामला संपत्ति विवाद से जुड़ा है।
सेब कारोबार में बिना लाइसेंस के भी वैध माना जाएगा वित्तीय लेनदेन
प्रदेश हाईकोर्ट ने चेक बाउंस से जुड़े मामले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यापारी बिना लाइसेंस के भी किसी अन्य फर्म के लाइसेंस और प्लेटफॉर्म का उपयोग करके व्यापारिक लेनदेन करता है, तो उसके द्वारा किए गए सौदे और लिए गए चेक कानूनी रूप से वैध माने जाएंगे। न्यायाधीश चिराग भानु की अदालत ने इस व्यवस्था के साथ आरोपी को बरी करने के जिला अदालत शिमला के फैसले को रद्द कर दिया है। साथ ही अदालत ने अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, शिमला की ओर से आरोपी को दी गई 6 महीने की कैद और 15,20,000 मुआवजे की सजा को बहाल कर दिया है। शिकायतकर्ता फर्म मैसर्स एडीएस, ढली (शिमला) के साझीदारों (अनिल कपरेट और दीपक चौहान) ने साल 2011 में आरोपी राजिंदर चौहान (प्रोप्राइटर, मैसर्स राजिंदर ऑर्चर्ड एंड कंपनी) को सेब बेचे थे।
इस कारोबारी लेनदेन के भुगतान के लिए आरोपी ने 5-5 लाख के तीन चेक (कुल 15 लाख) जारी किए थे। जब इन चेक को बैंक में लगाया गया, तो वे खाते में पर्याप्त राशि न होने के कारण बाउंस हो गए। इसके बाद शिकायतकर्ता ने एनआईए की धारा 138 के तहत मुकदमा दर्ज कराया था। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, शिमला ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए 6 महीने की साधारण कैद और 15.20 लाख मुआवजे की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इसके खिलाफ अपील की, तो सेशन कोर्ट ने उसे बरी कर दिया। जिला अदालत का तर्क था कि शिकायतकर्ता फर्म के पास सेब खरीदने-बेचने का कोई आधिकारिक लाइसेंस नहीं था, इसलिए यह पूरा लेनदेन और कर्ज कानूनी रूप से मान्य नहीं है। आरोपी ने खुद माना कि उसने साल 2011 में शिकायतकर्ता को बैंक ट्रांसफर के जरिए कई बार पैसे भेजे थे। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने चेकों पर अपने हस्ताक्षर होने की बात से कभी इन्कार नहीं किया।
सिहुंता कॉलेज दूसरी जमीन पर बना, दान की भूमि वापस लेने के लिए तीन महीने का समय
प्रदेश हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को राजकीय महाविद्यालय सिहुंता के निर्माण के लिए दान की गई भूमि को वापस पाने के लिए सक्षम प्राधिकारी के पास जाने की स्वतंत्रता प्रदान की है। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने जाफू और अन्य की ओर से दायर याचिका को वापस लेने की अनुमति दे दी है। न्यायालय ने मामले का निपटारा करते हुए निर्देश दिया है कि यदि याचिकाकर्ता की ओर से भूमि वापसी के लिए कोई अभ्यावेदन या प्रार्थना पत्र दिया जाता है, तो सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार उस पर तेजी से विचार करेंगे। हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को अभ्यावेदन प्राप्त होने की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर निपटाने और उचित निर्णय लेने के आदेश दिए हैं।अदालत ने पाया कि सरकार और विभाग ने राजकीय महाविद्यालय सिहुंता का निर्माण उस भूमि पर न करके किसी अन्य भूमि पर किया है, जिसे याचिकाकर्ता ने दान में दिया था। इस तथ्य को देखते हुए याचिकाकर्ता ने अदालत से अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी थी।