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Chamba News: कला और संस्कृति को सहेजने के लिए तैयार हो डिजिटल मंच
Wed, 05 Nov 2025 10:18 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
Updated Wed, 05 Nov 2025 10:18 PM IST
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चंबा। जिले की कला और संस्कृति को सहेजने के लिए एक डिजिटल मंच तैयार किया जाए। इससे आने वाले समय में शोधार्थियों के लिए शोध संबंधी सारी सामग्री एक ही जगह पर उपलब्ध हो पाए। साथ ही उनका जो शोध तैयार होकर आए वह भी चंबा में रहे। यह मांग भूरी सिंह संग्रहालय में राष्ट्रीय सम्मेलन हिमालयन लेगेसीज, एक्सप्लोरिंग हिस्ट्रीज, हेरिटेज प्रैक्टिसेज एंड कल्चरल फ्यूचर्स के दौरान शोधकर्ताओं ने की।
यह आयोजन भूरी सिंह संग्रहालय चंबा तथा नॉट ऑन मैप के संयुक्त तत्वावधान में संग्रहालय की स्थापना के 117वें वर्ष के उपलक्ष्य में किया। तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर से विद्वान, शोधकर्ता और सांस्कृतिक विशेषज्ञ शामिल हुए। बुधवार को छह शोधपत्र प्रस्तुत किए। सम्मेलन में डॉ. पर्वत रंजन सेठी इतिहास विभाग केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश ने हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. विद्या सागर शर्मा पूर्व संयुक्त निदेशक उच्च शिक्षा विभाग ने सामूहिक प्रयासों से हिमाचल की संस्कृति को बचाने पर बल दिया। वहीं, राज्य संग्रहालय शिमला के क्यूरेटर डा. हरि चौहान ने भी संबोधित किया। डॉ. कुमार ने कहा कि संस्कृति को केवल प्रदर्शन या उत्सवों तक सीमित करने के बजाय उसे जीवंत संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए, जो पहचान और अर्थव्यवस्था दोनों को संबल देता है। इस अवसर पर शोधार्थी विकास बन्याल, ममता देवर, मधु चंदा, अमित शोष्टा, यदुनंदन और शिवम ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
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यह आयोजन भूरी सिंह संग्रहालय चंबा तथा नॉट ऑन मैप के संयुक्त तत्वावधान में संग्रहालय की स्थापना के 117वें वर्ष के उपलक्ष्य में किया। तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर से विद्वान, शोधकर्ता और सांस्कृतिक विशेषज्ञ शामिल हुए। बुधवार को छह शोधपत्र प्रस्तुत किए। सम्मेलन में डॉ. पर्वत रंजन सेठी इतिहास विभाग केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश ने हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. विद्या सागर शर्मा पूर्व संयुक्त निदेशक उच्च शिक्षा विभाग ने सामूहिक प्रयासों से हिमाचल की संस्कृति को बचाने पर बल दिया। वहीं, राज्य संग्रहालय शिमला के क्यूरेटर डा. हरि चौहान ने भी संबोधित किया। डॉ. कुमार ने कहा कि संस्कृति को केवल प्रदर्शन या उत्सवों तक सीमित करने के बजाय उसे जीवंत संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए, जो पहचान और अर्थव्यवस्था दोनों को संबल देता है। इस अवसर पर शोधार्थी विकास बन्याल, ममता देवर, मधु चंदा, अमित शोष्टा, यदुनंदन और शिवम ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
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