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Bilaspur News: श्रीमद्भागवत में सुनाई राजा परीक्षित की कथा
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-आवागमन ही संसार की रीत : भास्करा नंद
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। शहर के डियारा सेक्टर में स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन कथा वाचक पंडित भास्करानंद शर्मा ने मृत्यु के रहस्य से पर्दा उठाया। उन्होंने श्रद्धालुओं को राजा परीक्षित की कथा सुनाई।
उन्होंने कहा कि संसार में जो भी जीव आता है। उसे संसार छोड़कर अवश्य जाना पड़ता है। आवागमन ही संसार की रीत है। जिस प्रकार जीवन जिया जाता है, उसी प्रकार मृत्यु को सुधारना आवश्यक है। इसे सत्संग और भगवान की शरण में जाकर ही सुधारा जा सकता है। ताकि जीवात्मा मुक्त होकर परमात्मा के चरणों को प्राप्त कर सके। उन्होंने कहा कि भागवत कथा सुनाते हुए शुकदेव को छह दिन बीत गए और उनकी मृत्यु में बस एक दिन शेष रह गया। राजा को शोक और मृत्यु का भय कम नहीं हुआ तब शुकदेव जी ने राजा को एक कथा सुनाई। परीक्षित ने मृत्यु के भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से निर्वाण की तैयारी कर ली और अंतिम दिन का कथा श्रवण पूरे मन से किया। उन्होंने बताया कि शिक्षा ग्रहण करने के बाद परीक्षित ने शुकदेव से कहा कि अब उन्हें सांपों के काटने का कोई डर नहीं है। उन्होंने आत्मा और ब्रम्हा की प्रकृति को जान लिया है। जब शुकदेव चले गए तो परीक्षित ने बैठकर ध्यान लगाना शुरू कर दिया। इसी दौरान उस काल के प्रचलित नाग वंश तक्षक का एक नाग ब्राह्मण की वेशभूषा में उनके नजदीक आया। उन्होंने परीक्षित को काट खाया और इससे परीक्षित की मौत हो गई। कथा के समापन के बाद भंडारे का आयोजन किया गया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। शहर के डियारा सेक्टर में स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन कथा वाचक पंडित भास्करानंद शर्मा ने मृत्यु के रहस्य से पर्दा उठाया। उन्होंने श्रद्धालुओं को राजा परीक्षित की कथा सुनाई।
उन्होंने कहा कि संसार में जो भी जीव आता है। उसे संसार छोड़कर अवश्य जाना पड़ता है। आवागमन ही संसार की रीत है। जिस प्रकार जीवन जिया जाता है, उसी प्रकार मृत्यु को सुधारना आवश्यक है। इसे सत्संग और भगवान की शरण में जाकर ही सुधारा जा सकता है। ताकि जीवात्मा मुक्त होकर परमात्मा के चरणों को प्राप्त कर सके। उन्होंने कहा कि भागवत कथा सुनाते हुए शुकदेव को छह दिन बीत गए और उनकी मृत्यु में बस एक दिन शेष रह गया। राजा को शोक और मृत्यु का भय कम नहीं हुआ तब शुकदेव जी ने राजा को एक कथा सुनाई। परीक्षित ने मृत्यु के भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से निर्वाण की तैयारी कर ली और अंतिम दिन का कथा श्रवण पूरे मन से किया। उन्होंने बताया कि शिक्षा ग्रहण करने के बाद परीक्षित ने शुकदेव से कहा कि अब उन्हें सांपों के काटने का कोई डर नहीं है। उन्होंने आत्मा और ब्रम्हा की प्रकृति को जान लिया है। जब शुकदेव चले गए तो परीक्षित ने बैठकर ध्यान लगाना शुरू कर दिया। इसी दौरान उस काल के प्रचलित नाग वंश तक्षक का एक नाग ब्राह्मण की वेशभूषा में उनके नजदीक आया। उन्होंने परीक्षित को काट खाया और इससे परीक्षित की मौत हो गई। कथा के समापन के बाद भंडारे का आयोजन किया गया।
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