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Bilaspur News: कथा में सुनाया महिषासुर के संहार का वर्णन
Thu, 12 Feb 2026 11:17 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Thu, 12 Feb 2026 11:17 PM IST
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शिव शक्ति मंदिर कोटलु ब्राह्मणा में चल रही श्रीमद् देवी भागवत कथा में मौजूद श्रद्धालु। स्रोत: आ
संवाद न्यूज एजेंसी
बरठीं (बिलासपुर)। शिव शक्ति मंदिर कोटलु ब्राह्मणा में चल रही श्रीमद् देवी भागवत कथा में वीरवार को पंडित मदन लाल दुर्वासा ने महिषासुर के संहार के वर्णन का प्रसंग सुनाया। उन्होंने महिषासुर जन्म कथा, देवी का प्रादुर्भाव और संवाद की व्याख्या की।
कथा में कृष्ण जन्म का वर्णन होते ही श्रद्धालु भगवान कृष्ण के जयकारों के साथ झूम उठे। उन्होंने कहा कि देवी ने महिषासुर, निशुंभ चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे अनेक राक्षसों का वध कर असुरों का सर्वनाश किया जिससे सृष्टि में भी संतुलन स्थापित हुआ। उन्होंने बताया कि भगवती दुर्गा के विभिन्न रूपों माता काली, बगलामुखी, ललिता सहित अन्य रूपों ने दुष्ट राक्षस शक्तियों का संहार कर धर्म की स्थापना की। मगर देव और असुरों के बीच निरंतर युद्ध चलता रहा, और एक समय ऐसा आया जब देवों की स्थिति मजबूत हो गई। असुरों को खतरा महसूस हुआ और उन्हें भागकर असुरों के गुरु शुक्राचार्य की शरण लेनी पड़ी। शुक्राचार्य ने देवों को पराजित करने के लिए आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने के लिए तपस्या करने का निश्चय किया और असुरों से कहा कि वे शांत रहें और देवों से युद्ध न करें। शुक्राचार्य ने अपनी इच्छित तपस्या को सफलतापूर्वक संपन्न करने के लिए भगवान शंकर से आशीर्वाद मांगा।
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बरठीं (बिलासपुर)। शिव शक्ति मंदिर कोटलु ब्राह्मणा में चल रही श्रीमद् देवी भागवत कथा में वीरवार को पंडित मदन लाल दुर्वासा ने महिषासुर के संहार के वर्णन का प्रसंग सुनाया। उन्होंने महिषासुर जन्म कथा, देवी का प्रादुर्भाव और संवाद की व्याख्या की।
कथा में कृष्ण जन्म का वर्णन होते ही श्रद्धालु भगवान कृष्ण के जयकारों के साथ झूम उठे। उन्होंने कहा कि देवी ने महिषासुर, निशुंभ चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे अनेक राक्षसों का वध कर असुरों का सर्वनाश किया जिससे सृष्टि में भी संतुलन स्थापित हुआ। उन्होंने बताया कि भगवती दुर्गा के विभिन्न रूपों माता काली, बगलामुखी, ललिता सहित अन्य रूपों ने दुष्ट राक्षस शक्तियों का संहार कर धर्म की स्थापना की। मगर देव और असुरों के बीच निरंतर युद्ध चलता रहा, और एक समय ऐसा आया जब देवों की स्थिति मजबूत हो गई। असुरों को खतरा महसूस हुआ और उन्हें भागकर असुरों के गुरु शुक्राचार्य की शरण लेनी पड़ी। शुक्राचार्य ने देवों को पराजित करने के लिए आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने के लिए तपस्या करने का निश्चय किया और असुरों से कहा कि वे शांत रहें और देवों से युद्ध न करें। शुक्राचार्य ने अपनी इच्छित तपस्या को सफलतापूर्वक संपन्न करने के लिए भगवान शंकर से आशीर्वाद मांगा।
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