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Bilaspur News: प्रदेश के जलाशयों में इस साल डाला जाएगा एक करोड़ मछली का बीज
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मत्स्य निदेशक ओमकांत ठाकुर।
15 नवंबर तक चलेगा अभियान, पौंग बांध, कोलडैम और गोबिंद सागर में बढ़ेगा मछली बीज का स्टॉक
रोहू, कतला, मृगल, सिल्वर कॉर्प और ग्रास कॉर्प प्रजातियों को प्राथमिकता
झीलों में डाला जा रहा है 70, 100 एमएम आकार की मछलियों का बीज
सरोज पाठक
बिलासपुर। प्रदेश के जलाशयों में मछलियों की संख्या बढ़ाने और मत्स्य उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए विभाग ने मछली बीज डालने का अभियान शुरू किया है। इसके तहत पौंग बांध, कोलडैम और गोबिंद सागर समेत विभिन्न जलाशयों में करीब एक करोड़ मछली बीज डाला जाएगा। अभियान 15 नवंबर तक जारी रहेगा। विभाग रोहू, कतला, मृगल, सिल्वर कॉर्प और ग्रास कॉर्प जैसी प्रजातियों के बीज जलाशयों में डाल रहा है। प्रदेश में करीब 2300 परिवार मछली पालन से रोजी-रोटी चला रहे हैं। मछुआरों की आय और कारोबार बढ़ाने के उद्देश्य से विभाग जलाशयों में मछली बीज की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। इसके लिए हिमाचल में तैयार बीज के साथ बाहर से भी खरीद की जा रही है। विभाग 70 और 100 मिलीमीटर आकार के मछली बीज का इस्तेमाल कर रहा है, ताकि जलाशयों में उनके जीवित रहने की संभावना बढ़ सके। छोटे आकार की मछलियों के दूसरी मछलियों का शिकार बनने का खतरा अधिक रहता है। प्रदेश में मछली बीज का उत्पादन बढ़ाने के लिए नालागढ़ में ब्रूड बैंक तैयार किया जा रहा है। इसका करीब 80 फीसदी काम पूरा हो चुका है। इसके शुरू होने से विभाग को मछलियों के प्रजनन के लिए अपना ब्रूड स्टॉक उपलब्ध होगा। इससे बीज उत्पादन बढ़ाने और भविष्य में बाहर से खरीद पर निर्भरता कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। संवाद
रूपचंद और पंगेशियस के उत्पादन पर प्रयोग
मत्स्य पालन विभाग रूपचंद और पंगेशियस जैसी प्रजातियों के उत्पादन की संभावनाएं भी तलाश रहा है। नालागढ़ में पंगेशियस पर प्रायोगिक तौर पर काम किया गया है। अब इसके प्रजनन और जीवित रहने की क्षमता का आकलन किया जाएगा। इसकी हैचिंग मार्च-अप्रैल में होती है। प्रयोग सफल रहने पर अगले सीजन में सितंबर-अक्तूबर तक इन मछलियों को जलाशयों में डालने योग्य बनाने की संभावना है।
कोलडैम में सालाना एक टन ट्राउट उत्पादन
कोलडैम में पिंजरा पद्धति से ट्राउट मछली पालन का प्रयोग जारी है। हालांकि, मछलियों की बढ़वार और वजन अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो रहा है। फिलहाल यहां सालाना करीब एक टन ट्राउट का उत्पादन हो रहा है। मछलियों का वजन कम रहने से उत्पादन को लाभकारी बनाना चुनौती बना हुआ है।
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कोट
प्रदेश के जलाशयों में करीब एक करोड़ मछली बीज डालने का काम चल रहा है। अभियान 15 नवंबर तक जारी रहेगा। पौंग, कोलडैम और गोबिंद सागर समेत विभिन्न जलाशयों में बीज डाला जा रहा है। नालागढ़ में ब्रूड बैंक का काम भी करीब 80 फीसदी पूरा हो चुका है।
-ओमकांत ठाकुर, निदेशक, मत्स्य पालन,विभाग
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रोहू, कतला, मृगल, सिल्वर कॉर्प और ग्रास कॉर्प प्रजातियों को प्राथमिकता
झीलों में डाला जा रहा है 70, 100 एमएम आकार की मछलियों का बीज
सरोज पाठक
बिलासपुर। प्रदेश के जलाशयों में मछलियों की संख्या बढ़ाने और मत्स्य उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए विभाग ने मछली बीज डालने का अभियान शुरू किया है। इसके तहत पौंग बांध, कोलडैम और गोबिंद सागर समेत विभिन्न जलाशयों में करीब एक करोड़ मछली बीज डाला जाएगा। अभियान 15 नवंबर तक जारी रहेगा। विभाग रोहू, कतला, मृगल, सिल्वर कॉर्प और ग्रास कॉर्प जैसी प्रजातियों के बीज जलाशयों में डाल रहा है। प्रदेश में करीब 2300 परिवार मछली पालन से रोजी-रोटी चला रहे हैं। मछुआरों की आय और कारोबार बढ़ाने के उद्देश्य से विभाग जलाशयों में मछली बीज की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। इसके लिए हिमाचल में तैयार बीज के साथ बाहर से भी खरीद की जा रही है। विभाग 70 और 100 मिलीमीटर आकार के मछली बीज का इस्तेमाल कर रहा है, ताकि जलाशयों में उनके जीवित रहने की संभावना बढ़ सके। छोटे आकार की मछलियों के दूसरी मछलियों का शिकार बनने का खतरा अधिक रहता है। प्रदेश में मछली बीज का उत्पादन बढ़ाने के लिए नालागढ़ में ब्रूड बैंक तैयार किया जा रहा है। इसका करीब 80 फीसदी काम पूरा हो चुका है। इसके शुरू होने से विभाग को मछलियों के प्रजनन के लिए अपना ब्रूड स्टॉक उपलब्ध होगा। इससे बीज उत्पादन बढ़ाने और भविष्य में बाहर से खरीद पर निर्भरता कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। संवाद
रूपचंद और पंगेशियस के उत्पादन पर प्रयोग
मत्स्य पालन विभाग रूपचंद और पंगेशियस जैसी प्रजातियों के उत्पादन की संभावनाएं भी तलाश रहा है। नालागढ़ में पंगेशियस पर प्रायोगिक तौर पर काम किया गया है। अब इसके प्रजनन और जीवित रहने की क्षमता का आकलन किया जाएगा। इसकी हैचिंग मार्च-अप्रैल में होती है। प्रयोग सफल रहने पर अगले सीजन में सितंबर-अक्तूबर तक इन मछलियों को जलाशयों में डालने योग्य बनाने की संभावना है।
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कोलडैम में सालाना एक टन ट्राउट उत्पादन
कोलडैम में पिंजरा पद्धति से ट्राउट मछली पालन का प्रयोग जारी है। हालांकि, मछलियों की बढ़वार और वजन अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो रहा है। फिलहाल यहां सालाना करीब एक टन ट्राउट का उत्पादन हो रहा है। मछलियों का वजन कम रहने से उत्पादन को लाभकारी बनाना चुनौती बना हुआ है।
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कोट
प्रदेश के जलाशयों में करीब एक करोड़ मछली बीज डालने का काम चल रहा है। अभियान 15 नवंबर तक जारी रहेगा। पौंग, कोलडैम और गोबिंद सागर समेत विभिन्न जलाशयों में बीज डाला जा रहा है। नालागढ़ में ब्रूड बैंक का काम भी करीब 80 फीसदी पूरा हो चुका है।
-ओमकांत ठाकुर, निदेशक, मत्स्य पालन,विभाग