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दुष्टों के संहार के लिए भगवान धरती पर लेते हैं अवतार : हंसराज

Sun, 19 Nov 2023 05:46 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 19 Nov 2023 05:46 PM IST
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God incarnates on earth to destroy the wicked: Hansraj
- श्रीमद्भागवत कथा में सुनाई भगवान श्री कृष्ण जन्म कथा
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। श्री नयना देवी जी के गांव झड़ियां में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में रविवार को प्रवचन करते हुए कथावाचक पंडित हंसराज शर्मा ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि जब-जब धरती पर अत्याचार बढ़ता है तो दुष्टों के संहार के लिए भगवान किसी न किसी रूप में अवतार लेते हैं।

उन्होंने कहा कि भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी कहते हैं, क्योंकि यह दिन भगवान श्री कृष्ण का जन्मदिवस माना जाता है। इसी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वासुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया। द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वासुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई, हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी के गर्भ में तेरा काल जन्म लेगा। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा। यह सुनकर कंस वासुदेव को मारने के लिए उद्वेलित हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है। उसने वासुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। जब आठवां बच्चा होने वाला था, तब कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वासुदेव, देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वासुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ। जिस कोठरी में देवकी-वासुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा अब मैं पुन: नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंद जी के घर वृंदावन में छोड़ आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस अवसर पर भगवान श्री कृष्ण जन्म को बहुत ही अलौकिक तरीके से प्रस्तुत किया गया और सुंदर भजनों से पंडाल झूम उठा।
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