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Yamuna Nagar News: पंचकूला से मिट्टी लाकर कुम्हारों ने तैयार किए ढाई लाख दीये
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गांव ससौली में मिट्टी के बर्तन तैयार करता प्रिंस। संवाद
यमुनानगर। दिवाली आने में अभी समय है, लेकिन ससौली गांव के कुम्हार परिवार के लिए त्योहार पहले ही दस्तक दे चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के लिए जिले के कुम्हारों को ढाई लाख मिट्टी के दीये तैयार करने का ऑर्डर मिला। महज एक सप्ताह में इतना बड़ा ऑर्डर पूरा करना आसान नहीं था। मौसम में बदलाव, बारिश के कारण दीयों को सुखाने में परेशानी और बिजली की समस्या के बीच कुम्हारों ने पूरे परिवार ने दिन-रात मेहनत कर ऑर्डर तैयार किया।
कुम्हारों ने बताया कि कुछ दीयों का स्टॉक उन्होंने पहले से तैयार कर रखा था, जिससे काम में थोड़ी मदद मिली। बाकी दीये तैयार करने के लिए परिवार के सभी सदस्य जुट गए। कुम्हार प्रिंस, प्रवीन, करनैलो देवी, रेखा देवी, गुंजन और परिवार के बच्चे भी दीये बनाने और उन्हें तैयार करने के काम में लगे रहे। उन्होंने बताया कि रविवार को कैथल, शाहाबाद समेत अन्य स्थानों पर दीयों की खेप भेजी गई।
बिजली के चाक ने बढ़ाई रफ्तार:
प्रिंस के मुताबिक पहले परिवार हाथ से दीये तैयार करता था, लेकिन बड़े ऑर्डर को देखते हुए अब बिजली के चाक का इस्तेमाल किया गया। इससे कम समय में अधिक दीये तैयार हो सके। हालांकि बिजली की समस्या के कारण कई बार काम रोकना पड़ा। कच्चे दीयों को पकाने के लिए उपलों की भी जरूरत पड़ती है। मौसम खराब होने के कारण दीयों को सुखाने और पकाने में अतिरिक्त समय लगा। एक साथ ढाई लाख दीये तैयार करना संभव नहीं था। इसलिए आसपास के अन्य कुम्हारों से भी माल तैयार करवाकर ऑर्डर पूरा किया गया। इस तरह गांव और आसपास के कुम्हार परिवारों की मेहनत भी इस बड़े ऑर्डर को पूरा करने में लगी।
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अब दूसरे क्षेत्रों से मंगानी पड़ती है मिट्टी:
रामचंद्र, राजेश, कमलेश, अजय, अहम, बीना, नैना, उमा, राजेश प्रजापत, मुकेश, अमित, भगत राम, नरेश आदि ने बताया कि पहले ससौली और आसपास के क्षेत्र में ही मिट्टी आसानी से उपलब्ध हो जाती थी। तालाबों और खुदाई वाले स्थानों से चिकनी मिट्टी मिल जाती थी, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने के लिए उपयुक्त चिकनी मिट्टी पंचकूला के कक्कड़ माजरा से मंगानी पड़ती है। इससे कारोबार की लागत बढ़ गई है। ढाई लाख दीये तैयार करने में करीब एक ट्रॉली मिट्टी का इस्तेमाल हुआ।
50 परिवारों से घटकर तीन पर पहुंचा कारोबार:
प्रिंस ने बताया कि ससौली में कभी करीब 50 परिवार मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते थे। समय के साथ लागत बढ़ने और तैयार माल की उचित कीमत नहीं मिलने के कारण अधिकांश परिवार इस काम से दूर हो गए। अब गांव में केवल तीन परिवार ही इस पुश्तैनी कला को आगे बढ़ा रहे हैं। यमुनानगर जिले में करीब 150 कुम्हार परिवार ऐसे हैं, जो विशेष रूप से दिवाली के दौरान मिट्टी के दीये और अन्य सामान तैयार करते हैं। साधारण दीये सामान्य दिनों में करीब 10 रुपये में दस बिकते हैं। स्टॉक में 50 रुपये में 100 दीये तक बेचने पड़ते हैं। कुम्हारों का कहना है कि मिट्टी, ईंधन, बिजली और मजदूरी की लागत बढ़ने के बावजूद बाजार में कीमत बढ़ाना आसान नहीं है।
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कुम्हारों ने बताया कि कुछ दीयों का स्टॉक उन्होंने पहले से तैयार कर रखा था, जिससे काम में थोड़ी मदद मिली। बाकी दीये तैयार करने के लिए परिवार के सभी सदस्य जुट गए। कुम्हार प्रिंस, प्रवीन, करनैलो देवी, रेखा देवी, गुंजन और परिवार के बच्चे भी दीये बनाने और उन्हें तैयार करने के काम में लगे रहे। उन्होंने बताया कि रविवार को कैथल, शाहाबाद समेत अन्य स्थानों पर दीयों की खेप भेजी गई।
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बिजली के चाक ने बढ़ाई रफ्तार:
प्रिंस के मुताबिक पहले परिवार हाथ से दीये तैयार करता था, लेकिन बड़े ऑर्डर को देखते हुए अब बिजली के चाक का इस्तेमाल किया गया। इससे कम समय में अधिक दीये तैयार हो सके। हालांकि बिजली की समस्या के कारण कई बार काम रोकना पड़ा। कच्चे दीयों को पकाने के लिए उपलों की भी जरूरत पड़ती है। मौसम खराब होने के कारण दीयों को सुखाने और पकाने में अतिरिक्त समय लगा। एक साथ ढाई लाख दीये तैयार करना संभव नहीं था। इसलिए आसपास के अन्य कुम्हारों से भी माल तैयार करवाकर ऑर्डर पूरा किया गया। इस तरह गांव और आसपास के कुम्हार परिवारों की मेहनत भी इस बड़े ऑर्डर को पूरा करने में लगी।
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अब दूसरे क्षेत्रों से मंगानी पड़ती है मिट्टी:
रामचंद्र, राजेश, कमलेश, अजय, अहम, बीना, नैना, उमा, राजेश प्रजापत, मुकेश, अमित, भगत राम, नरेश आदि ने बताया कि पहले ससौली और आसपास के क्षेत्र में ही मिट्टी आसानी से उपलब्ध हो जाती थी। तालाबों और खुदाई वाले स्थानों से चिकनी मिट्टी मिल जाती थी, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने के लिए उपयुक्त चिकनी मिट्टी पंचकूला के कक्कड़ माजरा से मंगानी पड़ती है। इससे कारोबार की लागत बढ़ गई है। ढाई लाख दीये तैयार करने में करीब एक ट्रॉली मिट्टी का इस्तेमाल हुआ।
50 परिवारों से घटकर तीन पर पहुंचा कारोबार:
प्रिंस ने बताया कि ससौली में कभी करीब 50 परिवार मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते थे। समय के साथ लागत बढ़ने और तैयार माल की उचित कीमत नहीं मिलने के कारण अधिकांश परिवार इस काम से दूर हो गए। अब गांव में केवल तीन परिवार ही इस पुश्तैनी कला को आगे बढ़ा रहे हैं। यमुनानगर जिले में करीब 150 कुम्हार परिवार ऐसे हैं, जो विशेष रूप से दिवाली के दौरान मिट्टी के दीये और अन्य सामान तैयार करते हैं। साधारण दीये सामान्य दिनों में करीब 10 रुपये में दस बिकते हैं। स्टॉक में 50 रुपये में 100 दीये तक बेचने पड़ते हैं। कुम्हारों का कहना है कि मिट्टी, ईंधन, बिजली और मजदूरी की लागत बढ़ने के बावजूद बाजार में कीमत बढ़ाना आसान नहीं है।