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बाहरी वैभव का जीवन में कोई मोल नहीं : डॉ. स्वाति
Wed, 06 Nov 2024 01:39 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Wed, 06 Nov 2024 01:39 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 108वें दिन महा साध्वी डॉ. स्वाति महाराज ने फरमाया कि बाहरी वैभव का जीवन में कोई मोल नहीं है। बाहरी वैभव आपको कुछ समय के लिए शानो-शौकत, सुख शांति प्रदान कर सकता है परंतु वह वास्तविक सुख और वास्तविक शांति नहीं है। वह तो क्षणिक भंगुर चीज है।
डॉ. स्वाति ने कहा कि वास्तविक आनंद परमपिता परमात्मा के बताए हुए रास्ते पर चलने में है। अहिंसा का पालन करने में है,दीन दुखियों की मदद करने में है और शांत जीत से तपस्या कर गुरुओं के चरणों में भावना भरी वंदना करने में है। यदि धन से ही सुख मिलता होता तो इस संसार के सब धनी व्यक्ति सुखी होते परंतु परमपिता परमात्मा का रचाया हुआ चक्र ऐसा है कि पैसे से आप सुख ले सकते हो लेकिन वह सुख कहने को तो सुख है लेकिन वास्तविक सुख नहीं है।
उन्होंने कहा कि हमारा जैन धर्म स्पष्ट रूप से व्याख्या करता है कि यदि हम अहिंसा का मार्ग बनाएंगे। तप तपस्या को शुद्ध भावना से करेंगे और अपने जीवन को सिद्ध बुध और मुक्त बनाने के लिए मन से वचन से और काया से भगवान महावीर स्वामी की आराधना करेंगे तो हमारा यह लोक भी संवर जाएगा और हमारा परलोक भी संवर जाएगा। हमारा लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है लेकिन उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर गुरुओं की शरण में जाकर तपस्या करनी होगी आराधना करनी होगी और अहिंसा का मार्ग पालते हुए मोक्ष प्राप्ति का ध्येय पाना होगा।
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यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 108वें दिन महा साध्वी डॉ. स्वाति महाराज ने फरमाया कि बाहरी वैभव का जीवन में कोई मोल नहीं है। बाहरी वैभव आपको कुछ समय के लिए शानो-शौकत, सुख शांति प्रदान कर सकता है परंतु वह वास्तविक सुख और वास्तविक शांति नहीं है। वह तो क्षणिक भंगुर चीज है।
डॉ. स्वाति ने कहा कि वास्तविक आनंद परमपिता परमात्मा के बताए हुए रास्ते पर चलने में है। अहिंसा का पालन करने में है,दीन दुखियों की मदद करने में है और शांत जीत से तपस्या कर गुरुओं के चरणों में भावना भरी वंदना करने में है। यदि धन से ही सुख मिलता होता तो इस संसार के सब धनी व्यक्ति सुखी होते परंतु परमपिता परमात्मा का रचाया हुआ चक्र ऐसा है कि पैसे से आप सुख ले सकते हो लेकिन वह सुख कहने को तो सुख है लेकिन वास्तविक सुख नहीं है।
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उन्होंने कहा कि हमारा जैन धर्म स्पष्ट रूप से व्याख्या करता है कि यदि हम अहिंसा का मार्ग बनाएंगे। तप तपस्या को शुद्ध भावना से करेंगे और अपने जीवन को सिद्ध बुध और मुक्त बनाने के लिए मन से वचन से और काया से भगवान महावीर स्वामी की आराधना करेंगे तो हमारा यह लोक भी संवर जाएगा और हमारा परलोक भी संवर जाएगा। हमारा लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है लेकिन उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर गुरुओं की शरण में जाकर तपस्या करनी होगी आराधना करनी होगी और अहिंसा का मार्ग पालते हुए मोक्ष प्राप्ति का ध्येय पाना होगा।
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