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36 वर्षो से कर रहे हिंदी की सेवा, 20 विद्यार्थियों को हिंदी में करवाई पीएचडी
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सोनीपत। हिंदी भले ही हमारी मातृभाषा हो, लेकिन आज भी हिंदी को वह स्थान नहीं मिल सका है जो उससे मिलना चाहिए था। मातृभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए कई संस्थाएं व लोग समय-समय पर प्रयास करते रहे हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने हिंदी के उत्थान में अपना पूरा जीवन लगा दिया। उनमें एक नाम है डॉ. पूर्णमल गौड़, जो अखिल भारतीय साहित्य परिषद हरियाणा के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं। वर्तमान में मार्गदर्शक के रूप में कार्य कर रहे हैं।
डॉ. पूर्णमल गौड़ का कहना है कि युवाओं को बताना होगा कि किस तरह से हिंदी उनके भविष्य को उज्ज्वल बनाने में सहयोगी साबित हो सकती है। इसीलिए अंग्रेजी से ज्यादा उनको हिंदी को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। डॉ. गौड़ का कहना है कि वह 36 वर्षों से हिंदी को उसका वास्तविक स्थान दिलाने के लिए संघर्षरत हैं। उन्होंने यूपीएससी का माध्यम हिंदी कराने के लिए दिल्ली में यूपीएससी कार्यालय के सामने करीब डेढ़ माह तक आंदोलन किया था। अंत में जीत मिली। इस प्रकार अदालतों में जिरह व अन्य काम हिंदी में कराने के लिए लंबा संघर्ष किया। डॉ. पूर्णमल गौड़ ने कहा कि वर्तमान में एसआरएम विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में कार्यरत हैं। कुरुक्षेत्र, एसआरएम, एमडीयू व बीएमयू के शोध निदेशक भी हैं। उनके निर्देशन में 20 विद्यार्थी हिंदी विषय में पीएचडी कर चुके हैं, जबकि दो अभी कर रहे हैं। डॉ. गौड़ का कहना है कि हिंदी पर हमें गर्व करना चाहिए। हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए। हर हिंदुस्तानी का कर्तव्य है कि वह मातृभाषा का सम्मान करे। हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है।
अधिकतर आबादी हिंदी को भूलती जा रही : डॉ. संतराम देशवाल
महाकवि सूरदास साहित्य साधना पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार एवं सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. संतराम देशवाल ने कहा कि राजभाषा हिंदी के उत्थान व उसका गौरव दिलाना सबकी जिम्मेदारी है। संस्कृति की संवाहक हिंदी भाषा ही है। सही मायने में देशभक्ति व राष्ट्रवाद के दो ही आधार मातृभूमि व भाषा होते हैं। उन्होंने कहा कि वे हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए लगातार प्रयासरत हैं। उन्होंने हिंदी के उत्थान के लिए सैकड़ों अधिवेशन व कार्यशालाओं में भाग लिया है। उनकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकों में इक्कीसवीं सदी के ललित निबंध, लोक पथ, संस्कृत दर्पण, संस्कृति स्वरूप एवं भूमंडलीकरण, आंगन में मोर नाचा किसने देखा, लोक आलोक, हरियाणा : संस्कृति एवं कला, संस्मरण आदि हिंदी के समग्र विकास पर ही लिखी गई है। उन्होंने कहा कि बदलते परिवेश में देश की अधिकतर आबादी हिंदी को भूलती जा रही है। ऐसा ही रहा तो हिंदी की जगह अन्य भाषाओं का प्रचलन बढ़ जाएगा। हम सभी को मिलकर मातृभाषा को बचाने व इसके उत्थान के लिए मिलकर प्रयास करने होंगे।
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डॉ. पूर्णमल गौड़ का कहना है कि युवाओं को बताना होगा कि किस तरह से हिंदी उनके भविष्य को उज्ज्वल बनाने में सहयोगी साबित हो सकती है। इसीलिए अंग्रेजी से ज्यादा उनको हिंदी को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। डॉ. गौड़ का कहना है कि वह 36 वर्षों से हिंदी को उसका वास्तविक स्थान दिलाने के लिए संघर्षरत हैं। उन्होंने यूपीएससी का माध्यम हिंदी कराने के लिए दिल्ली में यूपीएससी कार्यालय के सामने करीब डेढ़ माह तक आंदोलन किया था। अंत में जीत मिली। इस प्रकार अदालतों में जिरह व अन्य काम हिंदी में कराने के लिए लंबा संघर्ष किया। डॉ. पूर्णमल गौड़ ने कहा कि वर्तमान में एसआरएम विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में कार्यरत हैं। कुरुक्षेत्र, एसआरएम, एमडीयू व बीएमयू के शोध निदेशक भी हैं। उनके निर्देशन में 20 विद्यार्थी हिंदी विषय में पीएचडी कर चुके हैं, जबकि दो अभी कर रहे हैं। डॉ. गौड़ का कहना है कि हिंदी पर हमें गर्व करना चाहिए। हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए। हर हिंदुस्तानी का कर्तव्य है कि वह मातृभाषा का सम्मान करे। हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है।
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अधिकतर आबादी हिंदी को भूलती जा रही : डॉ. संतराम देशवाल
महाकवि सूरदास साहित्य साधना पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार एवं सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. संतराम देशवाल ने कहा कि राजभाषा हिंदी के उत्थान व उसका गौरव दिलाना सबकी जिम्मेदारी है। संस्कृति की संवाहक हिंदी भाषा ही है। सही मायने में देशभक्ति व राष्ट्रवाद के दो ही आधार मातृभूमि व भाषा होते हैं। उन्होंने कहा कि वे हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए लगातार प्रयासरत हैं। उन्होंने हिंदी के उत्थान के लिए सैकड़ों अधिवेशन व कार्यशालाओं में भाग लिया है। उनकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकों में इक्कीसवीं सदी के ललित निबंध, लोक पथ, संस्कृत दर्पण, संस्कृति स्वरूप एवं भूमंडलीकरण, आंगन में मोर नाचा किसने देखा, लोक आलोक, हरियाणा : संस्कृति एवं कला, संस्मरण आदि हिंदी के समग्र विकास पर ही लिखी गई है। उन्होंने कहा कि बदलते परिवेश में देश की अधिकतर आबादी हिंदी को भूलती जा रही है। ऐसा ही रहा तो हिंदी की जगह अन्य भाषाओं का प्रचलन बढ़ जाएगा। हम सभी को मिलकर मातृभाषा को बचाने व इसके उत्थान के लिए मिलकर प्रयास करने होंगे।
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