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Sonipat News: कुलपति ने बुल्गारिया में आईएएफएस सम्मेलन में शोधपत्र प्रस्तुत किया
Fri, 29 May 2026 08:46 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
Updated Fri, 29 May 2026 08:46 PM IST
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फोटो : बुल्गारिया में आयोजित आईएएफएस सम्मेलन में पहुंचे कुलपति प्रो. (डॉ.) देविंदर सिंह। स्रोत:
संवाद न्यूज एजेंसी
सोनीपत। डॉ. बीआर आंबेडकर राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, राई के कुलपति डॉ. देविंदर सिंह को इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज (आईएएफएस-2026) की 24वीं वार्षिक बैठक में पहुंचे। यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 25 से 30 मई तक सोफिया, बुल्गारिया में आयोजित किया जा रहा है।
सम्मेलन के दौरान डॉ. देविंदर सिंह ने “भारतीय फॉरेंसिक विज्ञान में एक नवीन परिवर्तन : दंड प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022 -आपराधिक न्याय प्रणाली में तकनीकी एकीकरण एवं संवैधानिक सुरक्षा उपायों के मध्य संतुलन” विषय पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने भारत में फोरेंसिक विज्ञान के बदलते स्वरूप व आपराधिक अन्वेषण में आधुनिक तकनीकों के बढ़ते उपयोग पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि भारत की अन्वेषण एजेंसियां लंबे समय तक औपनिवेशिक कालीन “बंदी पहचान अधिनियम, 1920” के अंतर्गत कार्य करती रही थीं। इसके कारण वैज्ञानिक साक्ष्य संग्रहण एवं फॉरेंसिक आधुनिकीकरण में अनेक सीमाएं थीं। उन्होंने राष्ट्रीय फॉरेंसिक मानकीकरण प्रोटोकॉल की स्थापना, सुरक्षित डिजिटल अवसंरचना के विकास तथा तकनीक आधारित न्याय प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
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उन्होंने यह भी कहा कि तकनीकी एकीकरण के साथ-साथ संवैधानिक सुरक्षा एवं व्यक्तिगत अधिकारों के संतुलन को बनाए रखना आवश्यक है।
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सोनीपत। डॉ. बीआर आंबेडकर राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, राई के कुलपति डॉ. देविंदर सिंह को इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज (आईएएफएस-2026) की 24वीं वार्षिक बैठक में पहुंचे। यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 25 से 30 मई तक सोफिया, बुल्गारिया में आयोजित किया जा रहा है।
सम्मेलन के दौरान डॉ. देविंदर सिंह ने “भारतीय फॉरेंसिक विज्ञान में एक नवीन परिवर्तन : दंड प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022 -आपराधिक न्याय प्रणाली में तकनीकी एकीकरण एवं संवैधानिक सुरक्षा उपायों के मध्य संतुलन” विषय पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने भारत में फोरेंसिक विज्ञान के बदलते स्वरूप व आपराधिक अन्वेषण में आधुनिक तकनीकों के बढ़ते उपयोग पर प्रकाश डाला।
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उन्होंने कहा कि भारत की अन्वेषण एजेंसियां लंबे समय तक औपनिवेशिक कालीन “बंदी पहचान अधिनियम, 1920” के अंतर्गत कार्य करती रही थीं। इसके कारण वैज्ञानिक साक्ष्य संग्रहण एवं फॉरेंसिक आधुनिकीकरण में अनेक सीमाएं थीं। उन्होंने राष्ट्रीय फॉरेंसिक मानकीकरण प्रोटोकॉल की स्थापना, सुरक्षित डिजिटल अवसंरचना के विकास तथा तकनीक आधारित न्याय प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
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उन्होंने यह भी कहा कि तकनीकी एकीकरण के साथ-साथ संवैधानिक सुरक्षा एवं व्यक्तिगत अधिकारों के संतुलन को बनाए रखना आवश्यक है।