{"_id":"67cef0feabf5ddcd56064958","slug":"those-days-were-very-special-now-there-is-joy-in-the-memories-sonipat-news-c-197-1-snp1008-133516-2025-03-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"Sonipat News: वो दिन थे खास, अब तो यादों में है उल्लास","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Sonipat News: वो दिन थे खास, अब तो यादों में है उल्लास
Tue, 11 Mar 2025 04:31 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
Updated Tue, 11 Mar 2025 04:31 AM IST
विज्ञापन
सोनीपत। होली पर्व पर मंडली बनाकर भजनों के साथ होली खेलने की परंपराओं का उत्सव प्रेम के रंगाें से ओझल होने लगा है। करीब दो दशक से मंडलियों के बीच जमने वाला रंग आधुनिक दौर में लुप्त हो चुका है। वो दिन बड़े खास थे, अब तो उल्लास यादों में है।
फाल्गुन मास की शुरुआत से ही लोग होली पर्व मनाने की तैयारी शुरू कर देते थे। अब सप्ताह पहले सजी दुकानों को देख होली पर्व का पता चलता है।
होली के बदलते स्वरूप को लेकर बुजुर्गों ने यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि वक्त के साथ गोबर के ढाल बुरकले बनाने, आस-पड़ोस की महिलाओं का एकत्रित होकर गीत गाते हुए होलिका पूजन के लिए जाना, एक-साथ मंडली बनाकर होली खेलना सिर्फ कहावतें बनकर रह गई हैं। आधुनिकता की दौड़ में आज किसी के पास एकजुटता का समय नहीं है। शहर में गुड़ मंडी बाजार, हलवाई हट्टा, गंज बाजार व नेहरू पार्क सहित कई स्थल ऐसे हैं, जहां लोग होली मनाने के लिए एकत्रित होते थे।
-- --
फाल्गुन माह की शुरुआत में ही लोग होलिका की तैयारी शुरू कर देते थे। रोजाना थोड़ी-थोड़ी झाड़ियां इकट्ठी कर कई जगह बड़ी-बड़ी होलिका तैयार की जाती थी। अब लोग एक दिन में ही आरे से लकड़ियां लाकर होलिका तैयार कर लेते हैं। बच्चे 20-20 दिन पहले होली खेलना शुरू कर देते थे, एक-दूसरे को रंग लगाते थे। अब रंग लगाने की बात पर ही झगड़ा हो जाता है।
विज्ञापन
सरदार सिंह, रोहट
महिलाएं कई दिन पहले गोबर के ढाल बुरकले बनाकर मालाएं बनाना शुरू कर देती थी। होलिका दहन के दिन आस-पड़ोस की महिलाएं एकत्रित होकर बच्चों के साथ गीत गाती हुई होलिका पूजन के लिए जाती थी। महिलाएं घरों में पकवान बनाने में एक-दूसरे का सहयोग करती थी। बदलते समय के साथ सभी परंपराएं खत्म हो रही हैं। अब बच्चों के पास वक्त ही नहीं है।
कृष्ण वीर, रोहट
बिखरते संयुक्त परिवार भी हमारे पर्वों की परंपराओं को ओझल कर रहे हैं। एकल परिवार में रहकर बच्चे अपने हिसाब से त्योहार मनाते हैं। पहले पर्वों का मतलब समस्त परिवार का एक जगह एकत्रित होना था। वक्त के साथ सभी परंपराएं बदल रही हैं। नई पीढ़ी के युवा एक जगह एकत्रित नहीं होना चाहते हैं। जिससे पर्वों का महत्व कम हो रहा है।
प्रेमावती, रायपुर
मंडली बनाकर भजन गाकर होली खेलना सिर्फ कहावतें रह गई हैं। आस-पड़ोस के लोग एक ही जगह एकत्रित होते थे। देवर-भाभी मजाक के साथ एक-दूसरे को कोरड़े मारकर होली खेलते थे। मंडलियां एकत्रित होकर फाग के गीत गाती थी। एक-दूसरे पर रंग डाला जाता था। अब एक दिन पहले ही होली खेलने पर लड़ाई-झगड़े होने लगते हैं।
हरनारायण, रायपुर
विज्ञापन
फाल्गुन मास की शुरुआत से ही लोग होली पर्व मनाने की तैयारी शुरू कर देते थे। अब सप्ताह पहले सजी दुकानों को देख होली पर्व का पता चलता है।
होली के बदलते स्वरूप को लेकर बुजुर्गों ने यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि वक्त के साथ गोबर के ढाल बुरकले बनाने, आस-पड़ोस की महिलाओं का एकत्रित होकर गीत गाते हुए होलिका पूजन के लिए जाना, एक-साथ मंडली बनाकर होली खेलना सिर्फ कहावतें बनकर रह गई हैं। आधुनिकता की दौड़ में आज किसी के पास एकजुटता का समय नहीं है। शहर में गुड़ मंडी बाजार, हलवाई हट्टा, गंज बाजार व नेहरू पार्क सहित कई स्थल ऐसे हैं, जहां लोग होली मनाने के लिए एकत्रित होते थे।
विज्ञापन
फाल्गुन माह की शुरुआत में ही लोग होलिका की तैयारी शुरू कर देते थे। रोजाना थोड़ी-थोड़ी झाड़ियां इकट्ठी कर कई जगह बड़ी-बड़ी होलिका तैयार की जाती थी। अब लोग एक दिन में ही आरे से लकड़ियां लाकर होलिका तैयार कर लेते हैं। बच्चे 20-20 दिन पहले होली खेलना शुरू कर देते थे, एक-दूसरे को रंग लगाते थे। अब रंग लगाने की बात पर ही झगड़ा हो जाता है।
विज्ञापन
सरदार सिंह, रोहट
महिलाएं कई दिन पहले गोबर के ढाल बुरकले बनाकर मालाएं बनाना शुरू कर देती थी। होलिका दहन के दिन आस-पड़ोस की महिलाएं एकत्रित होकर बच्चों के साथ गीत गाती हुई होलिका पूजन के लिए जाती थी। महिलाएं घरों में पकवान बनाने में एक-दूसरे का सहयोग करती थी। बदलते समय के साथ सभी परंपराएं खत्म हो रही हैं। अब बच्चों के पास वक्त ही नहीं है।
कृष्ण वीर, रोहट
बिखरते संयुक्त परिवार भी हमारे पर्वों की परंपराओं को ओझल कर रहे हैं। एकल परिवार में रहकर बच्चे अपने हिसाब से त्योहार मनाते हैं। पहले पर्वों का मतलब समस्त परिवार का एक जगह एकत्रित होना था। वक्त के साथ सभी परंपराएं बदल रही हैं। नई पीढ़ी के युवा एक जगह एकत्रित नहीं होना चाहते हैं। जिससे पर्वों का महत्व कम हो रहा है।
प्रेमावती, रायपुर
मंडली बनाकर भजन गाकर होली खेलना सिर्फ कहावतें रह गई हैं। आस-पड़ोस के लोग एक ही जगह एकत्रित होते थे। देवर-भाभी मजाक के साथ एक-दूसरे को कोरड़े मारकर होली खेलते थे। मंडलियां एकत्रित होकर फाग के गीत गाती थी। एक-दूसरे पर रंग डाला जाता था। अब एक दिन पहले ही होली खेलने पर लड़ाई-झगड़े होने लगते हैं।
हरनारायण, रायपुर