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Sonipat News: हॉकी के हर संस्करण में छाप छोड़ रहीं प्रीतम सिवाच
Wed, 03 Dec 2025 12:58 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
Updated Wed, 03 Dec 2025 12:58 AM IST
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फोटो :07: प्रीतम सिवाच।
सोनीपत। भारतीय महिला हॉकी की पहचान बन चुकी प्रीतम सिवाच वह नाम हैं जिसने न केवल अपने खेल से देश का गौरव बढ़ाया बल्कि अपनी लगन, अनुशासन और समर्पण से महिला हॉकी की नई इबारत लिखी है। कभी मैदान में देश को जीत दिलाने वाली प्रीतम आज हॉकी की नई पौध तैयार करने में जुटी हैं।
हाल ही में विश्व मास्टर्स हॉकी एशिया चैंपियनशिप में भारतीय टीम को विजेता बनाकर उन्होंने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उनका सफर अभी थमा नहीं है। प्रीतम सिवाच का हॉकी से रिश्ता बचपन की एक छोटी सी शुरुआत से अंतरराष्ट्रीय सफलता तक जा पहुंचा।
गुरुग्राम के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम ने वर्ष 1987 में पहली बार स्टिक थामी और 1990 में पहली राष्ट्रीय स्पर्धा में उतरकर सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनीं। 1992 में जूनियर एशिया कप से अंतरराष्ट्रीय कॅरिअर शुरू करने वाली प्रीतम ने कुछ ही वर्षों में देश की सबसे भरोसेमंद खिलाड़ियों में स्थान बना लिया।
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वर्ष 1998 में बैंकाक एशियाड में उनकी कप्तानी में 15 साल बाद भारत को रजत पदक मिला था। वर्ष 2002 मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स में टीम को स्वर्ण दिलाया। 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स, 2017 एशिया कप, चीन एशियन गेम्स, अर्जेंटीना विश्व कप में प्रीतम ने भारतीय महिला टीम को प्रशिक्षित करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहचान दिलाई।
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खिलाड़ी से गुरु बनीं प्रीतम
ओलंपिक में पदक से चूकने का दर्द आज प्रीतम की प्रेरणा बन चुका है। वर्ष 2004 से वह सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को हॉकी का प्रशिक्षण दे रही हैं। उनकी प्रीतम सिवाच हॉकी अकादमी से अब तक 250 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी निकल चुकी हैं। आज भी करीब 150 लड़कियां नियमित अभ्यास कर रही हैं। इनमें से कई जरूरतमंद बेटियों का पूरा दायित्व प्रीतम स्वयं उठाती हैं। उन्हें द्रोणाचार्य अवॉर्ड, अर्जुन पुरस्कार व हरियाणा का प्रतिष्ठित भीम अवॉर्ड मिल चुका है। उनकी शिष्या नेहा गोयल, किरण दहिया, ज्योति रूमावत, निशा वारसी, प्रीति, महिमा चौधरी, शर्मिला देश का नाम रोशन कर रही हैं।
प्रशिक्षण को मानती हैं असली चुनौती
प्रीतम सिवाच कहती हैं कि खिलाड़ी अपने भीतर जज्बा खुद पैदा करता हैं लेकिन एक प्रशिक्षक को किसी और के भीतर जुनून जगाना पड़ता है। यही सबसे बड़ी चुनौती और संतोष है।
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हाल ही में विश्व मास्टर्स हॉकी एशिया चैंपियनशिप में भारतीय टीम को विजेता बनाकर उन्होंने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उनका सफर अभी थमा नहीं है। प्रीतम सिवाच का हॉकी से रिश्ता बचपन की एक छोटी सी शुरुआत से अंतरराष्ट्रीय सफलता तक जा पहुंचा।
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गुरुग्राम के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम ने वर्ष 1987 में पहली बार स्टिक थामी और 1990 में पहली राष्ट्रीय स्पर्धा में उतरकर सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनीं। 1992 में जूनियर एशिया कप से अंतरराष्ट्रीय कॅरिअर शुरू करने वाली प्रीतम ने कुछ ही वर्षों में देश की सबसे भरोसेमंद खिलाड़ियों में स्थान बना लिया।
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वर्ष 1998 में बैंकाक एशियाड में उनकी कप्तानी में 15 साल बाद भारत को रजत पदक मिला था। वर्ष 2002 मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स में टीम को स्वर्ण दिलाया। 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स, 2017 एशिया कप, चीन एशियन गेम्स, अर्जेंटीना विश्व कप में प्रीतम ने भारतीय महिला टीम को प्रशिक्षित करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहचान दिलाई।
खिलाड़ी से गुरु बनीं प्रीतम
ओलंपिक में पदक से चूकने का दर्द आज प्रीतम की प्रेरणा बन चुका है। वर्ष 2004 से वह सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को हॉकी का प्रशिक्षण दे रही हैं। उनकी प्रीतम सिवाच हॉकी अकादमी से अब तक 250 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी निकल चुकी हैं। आज भी करीब 150 लड़कियां नियमित अभ्यास कर रही हैं। इनमें से कई जरूरतमंद बेटियों का पूरा दायित्व प्रीतम स्वयं उठाती हैं। उन्हें द्रोणाचार्य अवॉर्ड, अर्जुन पुरस्कार व हरियाणा का प्रतिष्ठित भीम अवॉर्ड मिल चुका है। उनकी शिष्या नेहा गोयल, किरण दहिया, ज्योति रूमावत, निशा वारसी, प्रीति, महिमा चौधरी, शर्मिला देश का नाम रोशन कर रही हैं।
प्रशिक्षण को मानती हैं असली चुनौती
प्रीतम सिवाच कहती हैं कि खिलाड़ी अपने भीतर जज्बा खुद पैदा करता हैं लेकिन एक प्रशिक्षक को किसी और के भीतर जुनून जगाना पड़ता है। यही सबसे बड़ी चुनौती और संतोष है।