60 दिन के किसान आंदोलन पर भारी पड़े 60 मिनट, किसान नेता अब डैमेज कंट्रोल में जुटे
कृषि कानून रद्द कराने की मांग को लेकर किसानों के आंदोलन को 60 दिन हो चुके हैं। इन 60 दिनों में जिस शांतिपूर्ण तरीके से यह आंदोलन चल रहा था, वह हर किसी के लिए मिसाल था। इन 60 दिनों पर केवल 60 मिनट भारी पड़ गए और पूरा माहौल बिगड़ गया, जिससे आंदोलन को बदनामी झेलनी पड़ रही है।
यह हालात भी उस समय पैदा हुए जब किसान नेता 15 दिनों से लगातार ट्रैक्टर परेड को शांतिपूर्ण तरीके से करने की अपील कर रहे थे। किसान नेताओं की अपील भी काम नहीं आई और युवाओं ने किसान नेताओं के फैसलों तक पर अमल नहीं किया। अब किसान नेता किसी तरह से डैमेज कंट्रोल करने में जुटे हैं। इस तरह दोबारा नहीं होने देने का भरोसा दिलाने का प्रयास किया जा रहा है।
कृषि कानून रद्द करने की मांग को लेकर कुंडली बॉर्डर पर डेरा डाले किसानों का आंदोलन लंबा होता जा रहा है। किसानों के संयम की वजह से ही आम लोग भी भावनात्मक रूप से जुड़ रहे थे। किसान नेताओं ने गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर परेड निकालने का एलान भी इसलिए किया था कि वह शांतिपूर्ण तरीके से परेड निकालेंगे और उसका संदेश पूरी दुनिया में जाएगा।
वह पिछले 15 दिन से सोशल मीडिया, पत्रकार वार्ता, बैठक समेत हर जगह परेड में शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील करते थे। किसानों को भावनात्मक रूप से तैयार किया जा रहा था कि अगर किसी तरह से माहौल खराब हुआ तो आंदोलन खराब हो जाएगा और उनकी छवि पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ेगा। इसके बावजूद युवा किसानों ने उग्र होना शुरू कर दिया और वह गणतंत्र दिवस से पहले ही परेड के रूट को लेकर हंगामा करने लगे।
इसके बाद भी किसान नेता नहीं संभले। गणतंत्र दिवस पर किसान नेताओं की अनदेखी करके निर्धारित समय से कई घंटे पहले बैरिकेड तोड़कर परेड शुरू कर दी। उस परेड को शुरू करने के 60 मिनट के अंदर ही माहौल खराब होना शुरू हो गया, जब मुकरबा चौक पर रूट बदलने को लेकर पुलिस से झड़प हुई। उसके बाद बवाल बढ़ता गया और दिल्ली में कई जगह बवाल होने के साथ ही लाल किला पर धार्मिक झंडा फहराने से आंदोलन की बदनामी शुरू हो गई। इस तरह 60 दिनों से शांति की मिसाल बना आंदोलन 60 मिनट में खराब हो गया और यह 60 मिनट ही आंदोलन पर भारी पड़ते दिखे।
किसान नेताओं ने शुरू किया डैमेज कंट्रोल
दिल्ली में बवाल व लाल किला पर झंडा फहराने से आंदोलन को लेकर गलत संदेश जा रहा है। किसान नेता अब इसके डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं। किसानों को समझाया जा रहा है कि यह शरारती तत्वों ने किया है और इसमें हक के लिए लड़ाई करने वाले किसान शामिल नहीं थे। इसके साथ ही किसानों को भरोसा दिलाने का प्रयास हो रहा है कि इस तरह की घटना को दोबारा नहीं होने दिया जाएगा। अब किसान नेताओं का यह डैमेज कंट्रोल कितना होगा, यह आंदोलन की अगली रणनीति के साथ पता लग जाएगा।
हरियाणा-पंजाब को लेकर खींचतान भी दिखने लगी
पंजाब के किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल का एक वीडियो बुधवार को वायरल हुआ। इसमें वह मंच से कहते दिख रहे है कि बैठक में मुझे प्रधानी करने के लिए कहा गया लेकिन मैंने प्रधानी करने से मना कर दिया। क्योंकि मैं तभी प्रधानी करूंगा, जब हरियाणा वाले अपने युवाओं पर काबू करेंगे। उनका अपने ही युवाओं पर काबू नहीं है। दिल्ली से वापस लौटने की अपील करने के बाद पंजाब के युवा आ गए, लेकिन हरियाणा के युवा अभी तक वहां घूम रहे हैं। इस तरह का वीडियो वायरल होने के बाद खींचतान भी होती दिख रही है।