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खुद की संवारी झोपड़ी लेकर रवाना हुए जितेंदर, इसमें बनाएंगे लाइब्रेरी
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कुंडली बॉडर पर गले में हरा पटका डाले खड़े एसकेएम सदस्य अभिमन्यु कोहाड़ के दाएं तरफ खड़े जितेंदर।
- फोटो : Sonipat
सोनीपत। भले ही किसान आंदोलन स्थगित हो गया हो, लेकिन इससे जुड़े लोग इसकी यादों को हमेशा के लिए अपने साथ रखना चाहते हैं। इनमें से एक है बठिंडा निवासी युवक जितेंदर सिद्धू। वह किसान आंदोलन की शुरुआत में न्यूजीलैंड में रहकर नौकरी कर रहा था। देश में तीन कृषि कानून लागू करने व उनके खिलाफ पंजाब के किसानों की तरफ से कुंडली बॉर्डर पर आंदोलन शुरू किए जाने का पता लगते ही पंजाब के बेटे में मन में अपनी किसानी बचाने का जज्बा पैदा हुआ और वह आंदोलन में शामिल हो गया। साल भर किसानों के बीच रहकर सेवा की और अब सोमवार को आखिरी जत्थे के साथ वह पंजाब के लिए रवाना हो गए। वह अपने हाथों से तैयार की गई झोपड़ी भी संजोकर साथ ले गए। जिसमें वह लाइब्रेरी बनाएंगे।
कुंडली बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन 26 नवंबर, 2020 को शुरू हुआ था। आंदोलन में देश के साथ ही विदेशों में रहने वाले किसान भी आकर जुड़ गए थे। उनमें से ही एक हैं पंजाब के बठिंडा के जितेंदर सिद्धू। वह आंदोलन शुरू होने के बाद न्यूजीलैंड में अपनी नौकरी छोडकऱ वापस लौट आए। करीब सालभर पहले वह किसान आंदोलन से जुड़ गए। यहां आकर उन्होंने साथियों के साथ झोपड़ी बनाई और किसानों की सेवा करने लगे। उन्होंने देखा कि आंदोलन में किसानों के साथ ही उनके परिवार की महिलाएं व बच्चे भी शामिल हैं। ऐसे में आंदोलन स्थल पर रात को सुरक्षा सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक है। उन्होंने अपने साथी व हमउम्र करीब 250 किसानों का जत्था तैयार किया। वह रात को पहरा देकर सुरक्षा देते थे। वहीं ट्रैफिक की व्यवस्था को भी संभालते थे। साथ ही दिन में किसानों की सेवा करते थे। इस तरह सालभर वह सेवा में जुटे रहे। वह सोमवार को किसानों के आखिरी जत्थे के साथ यहां से रवाना हुए।
पराली व मिट्टी के लेप से तैयार की थी झोपड़ी
कुंडली बॉर्डर पर आकर जितेंदर व उनके साथियों ने अपनी झोपड़ी स्वयं तैयार की थी। पराली व मिट्टी के लेप से तैयार की गई झोपड़ी पर किसानों व फसलों के साथ किसानी आंदोलन के नारे लिखवाए गए थे। अब आंदोलन की समाप्ति पर वह अपनी झोपड़ी को साथ लेकर पंजाब गए हैं। जिसे वह संजोकर रखना चाहते हैं।
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झोपड़ी में बनाएंगे लाइब्रेरी, साथ ही अस्पताल खोलेंगे
जितेंदर सिद्धू व सुखविंदर सिंह कहते हैं कि झोपड़ी में एक साल तक रहे हैं। इसे अपने साथ लेकर जा रहे हैं। इसे स्मारक के रूप में रखा जाएगा। उनके साथियों का कहना था कि इसमें बठिंडा में लाइब्रेरी बनाएंगे। जिससे युवा पीढ़ी को उनके द्वारा किए गए संघर्ष की याद बनी रहे। इतना ही नहीं इसके साथ ही एक अस्पताल भी खोला जाएगा।
किसानों के संघर्ष की जीत, जितेंदर जैसे युवा बने ताकत
संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य अभिमन्यु कोहाड़ बताते हैं कि आंदोलन किसानों की जीत है। इस आंदोलन में जितेंदर जैसे युवा साथियों का जो साथ मिला वह ताकत बन गया। एकजुटता ने आखिर किसानों को उनकी मंजिल तक पहुंचाया। यह सभी की जीत है।
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कुंडली बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन 26 नवंबर, 2020 को शुरू हुआ था। आंदोलन में देश के साथ ही विदेशों में रहने वाले किसान भी आकर जुड़ गए थे। उनमें से ही एक हैं पंजाब के बठिंडा के जितेंदर सिद्धू। वह आंदोलन शुरू होने के बाद न्यूजीलैंड में अपनी नौकरी छोडकऱ वापस लौट आए। करीब सालभर पहले वह किसान आंदोलन से जुड़ गए। यहां आकर उन्होंने साथियों के साथ झोपड़ी बनाई और किसानों की सेवा करने लगे। उन्होंने देखा कि आंदोलन में किसानों के साथ ही उनके परिवार की महिलाएं व बच्चे भी शामिल हैं। ऐसे में आंदोलन स्थल पर रात को सुरक्षा सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक है। उन्होंने अपने साथी व हमउम्र करीब 250 किसानों का जत्था तैयार किया। वह रात को पहरा देकर सुरक्षा देते थे। वहीं ट्रैफिक की व्यवस्था को भी संभालते थे। साथ ही दिन में किसानों की सेवा करते थे। इस तरह सालभर वह सेवा में जुटे रहे। वह सोमवार को किसानों के आखिरी जत्थे के साथ यहां से रवाना हुए।
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पराली व मिट्टी के लेप से तैयार की थी झोपड़ी
कुंडली बॉर्डर पर आकर जितेंदर व उनके साथियों ने अपनी झोपड़ी स्वयं तैयार की थी। पराली व मिट्टी के लेप से तैयार की गई झोपड़ी पर किसानों व फसलों के साथ किसानी आंदोलन के नारे लिखवाए गए थे। अब आंदोलन की समाप्ति पर वह अपनी झोपड़ी को साथ लेकर पंजाब गए हैं। जिसे वह संजोकर रखना चाहते हैं।
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झोपड़ी में बनाएंगे लाइब्रेरी, साथ ही अस्पताल खोलेंगे
जितेंदर सिद्धू व सुखविंदर सिंह कहते हैं कि झोपड़ी में एक साल तक रहे हैं। इसे अपने साथ लेकर जा रहे हैं। इसे स्मारक के रूप में रखा जाएगा। उनके साथियों का कहना था कि इसमें बठिंडा में लाइब्रेरी बनाएंगे। जिससे युवा पीढ़ी को उनके द्वारा किए गए संघर्ष की याद बनी रहे। इतना ही नहीं इसके साथ ही एक अस्पताल भी खोला जाएगा।
किसानों के संघर्ष की जीत, जितेंदर जैसे युवा बने ताकत
संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य अभिमन्यु कोहाड़ बताते हैं कि आंदोलन किसानों की जीत है। इस आंदोलन में जितेंदर जैसे युवा साथियों का जो साथ मिला वह ताकत बन गया। एकजुटता ने आखिर किसानों को उनकी मंजिल तक पहुंचाया। यह सभी की जीत है।