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सरकार से बातचीत बंद होने से लंबा हो रहा आंदोलन, दिल्ली की सीमाओं पर कम होने लगी भीड़
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अंकित चौहान
सोनीपत। किसान आंदोलन में उतार-चढ़ाव खत्म नहीं हो रहा है। अब सरकार से बातचीत बंद होने से आंदोलन को लंबा होता देखकर दिल्ली की सीमाओं पर भीड़ कम होने लगी है। कुंडली बॉर्डर से किसान दोबारा वापस चले गए और वहां टेंट खाली दिखाई देने लगे हैं तो लंगरों में लगने वाली लाइन भी खत्म हो गई है। हरियाणा के किसान भी पहले के मुकाबले बॉर्डर पर काफी कम पहुंच रहे हैं। कुछ किसान धरनास्थल पर सुबह को जाकर शाम को लौट आते हैं। भीड़ को कम होती देखकर पंजाब के किसान नेताओं ने महापंचायत की जगह किसानों को बॉर्डर पर लेकर पहुंचने की अपील शुरू कर दी है और इसके लिए गांव-गांव अभियान भी शुरू कर दिया है।
कृषि कानून रद्द कराने के लिए पिछले 85 दिनों से किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं। इस बीच किसानों व सरकार के बीच 11 दौर की बातचीत हो चुकी है तो गृहमंत्री अमित शाह भी किसानों से वार्ता कर चुके हैं। इसके बावजूद कोई हल अभी तक नहीं निकल सका है, लेकिन किसानों को लगातार बातचीत होने से एक उम्मीद थी। किसानों व सरकार के बीच आखिरी बैठक 22 जनवरी को हुई थी और उसके बाद से बातचीत का रास्ता बंद पड़ा है। इस बीच आंदोलन में कई उतार चढ़ाव भी चल रहे हैं और ट्रैक्टर परेड के दौरान बवाल होने पर दो दिन तक टूटता आंदोलन किसान नेताओं की भावुक अपील के बाद दोबारा खड़ा हो गया था। लेकिन अब इतना समय बीतने के बावजूद सरकार से बातचीत का रास्ता न खुलने पर आंदोलन लंबा होता देखकर किसानों का धैर्य जवाब देने लगा है। जिससे किसानों ने लौटना शुरू कर दिया है और कुंडली बॉर्डर पर भीड़ कम होने लगी है। जहां कुछ दिन पहले तक करीब 45 हजार किसान हो गए थे, वहीं अब दोबारा से यह आधे रह गए हैं। इसका पता इसी बात से चलता है कि धरनास्थल के पास सड़कें खाली पड़ी रहती हैं तो टेंट व लंगरों में भीड़ नहीं दिखाई देती है। इस तरह से किसान आंदोलन में दोबारा से स्थिति बदलती दिख रही है।
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पंजाब में हर घर से एक किसान को दोबारा बॉर्डर पर लेकर आने में जुटे
कुंडली बॉर्डर पर भीड़ कम होने से किसान नेताओं की परेशानी भी बढ़ी है और वह इसका कारण पता करके दोबारा से किसानों को बॉर्डर पर लेकर आने में जुटे हैं। पंजाब के किसान नेताओं ने सबसे पहले महापंचायतों को बंद कराने का आह्वान किया है, क्योंकि उनको लगता है कि किसानों को कृषि कानूनों से होने वाले नुकसान को लेकर जागरूक करने के लिए महापंचायत की जा रही है। लेकिन पंजाब में पहले ही किसान जागरूक हैं और इसलिए पंजाब में इनकी जरूरत नहीं है। इसलिए किसान नेता जितनी मेहनत महापंचायतों में कर रहे हैं, वह गांवों में अभियान चलाकर हर घर से एक किसान को बॉर्डर चलने की अपील करे। इसके लिए अभियान भी शुरू कर दिया है और पंजाब से जल्द ही काफी किसानों के बॉर्डर पर पहुंचने का दावा किया जा रहा है।
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पंजाब में सभी किसान कृषि कानूनों से होने वाले नुकसान को लेकर जागरूक हैं। इसलिए वहां से सभी को बॉर्डर पर पहुंचने के लिए कहा गया है और उसका असर दिखने लगा है। वहां से काफी किसान जल्द ही बॉर्डर पर पहुंचेंगे और बॉर्डर पर पहले से ज्यादा भीड़ दिखाई देगी।
- बूटा सिंह, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा
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किसान महापंचायतों में जुट गए थे, जबकि इसकी कोई जरूरत नहीं है। इसलिए सभी को कहा गया है कि महापंचायतों की जगह बॉर्डर पर पक्के मोर्चों पर जाकर बैठें। उससे ही सरकार पर दबाव बनेगा। पंजाब से काफी किसान बॉर्डर पर पहुंच रहे हैं।
- राजेंद्र सिंह दीपसिंह वाला, अध्यक्ष कीर्ति किसान यूनियन
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सोनीपत। किसान आंदोलन में उतार-चढ़ाव खत्म नहीं हो रहा है। अब सरकार से बातचीत बंद होने से आंदोलन को लंबा होता देखकर दिल्ली की सीमाओं पर भीड़ कम होने लगी है। कुंडली बॉर्डर से किसान दोबारा वापस चले गए और वहां टेंट खाली दिखाई देने लगे हैं तो लंगरों में लगने वाली लाइन भी खत्म हो गई है। हरियाणा के किसान भी पहले के मुकाबले बॉर्डर पर काफी कम पहुंच रहे हैं। कुछ किसान धरनास्थल पर सुबह को जाकर शाम को लौट आते हैं। भीड़ को कम होती देखकर पंजाब के किसान नेताओं ने महापंचायत की जगह किसानों को बॉर्डर पर लेकर पहुंचने की अपील शुरू कर दी है और इसके लिए गांव-गांव अभियान भी शुरू कर दिया है।
कृषि कानून रद्द कराने के लिए पिछले 85 दिनों से किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं। इस बीच किसानों व सरकार के बीच 11 दौर की बातचीत हो चुकी है तो गृहमंत्री अमित शाह भी किसानों से वार्ता कर चुके हैं। इसके बावजूद कोई हल अभी तक नहीं निकल सका है, लेकिन किसानों को लगातार बातचीत होने से एक उम्मीद थी। किसानों व सरकार के बीच आखिरी बैठक 22 जनवरी को हुई थी और उसके बाद से बातचीत का रास्ता बंद पड़ा है। इस बीच आंदोलन में कई उतार चढ़ाव भी चल रहे हैं और ट्रैक्टर परेड के दौरान बवाल होने पर दो दिन तक टूटता आंदोलन किसान नेताओं की भावुक अपील के बाद दोबारा खड़ा हो गया था। लेकिन अब इतना समय बीतने के बावजूद सरकार से बातचीत का रास्ता न खुलने पर आंदोलन लंबा होता देखकर किसानों का धैर्य जवाब देने लगा है। जिससे किसानों ने लौटना शुरू कर दिया है और कुंडली बॉर्डर पर भीड़ कम होने लगी है। जहां कुछ दिन पहले तक करीब 45 हजार किसान हो गए थे, वहीं अब दोबारा से यह आधे रह गए हैं। इसका पता इसी बात से चलता है कि धरनास्थल के पास सड़कें खाली पड़ी रहती हैं तो टेंट व लंगरों में भीड़ नहीं दिखाई देती है। इस तरह से किसान आंदोलन में दोबारा से स्थिति बदलती दिख रही है।
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पंजाब में हर घर से एक किसान को दोबारा बॉर्डर पर लेकर आने में जुटे
कुंडली बॉर्डर पर भीड़ कम होने से किसान नेताओं की परेशानी भी बढ़ी है और वह इसका कारण पता करके दोबारा से किसानों को बॉर्डर पर लेकर आने में जुटे हैं। पंजाब के किसान नेताओं ने सबसे पहले महापंचायतों को बंद कराने का आह्वान किया है, क्योंकि उनको लगता है कि किसानों को कृषि कानूनों से होने वाले नुकसान को लेकर जागरूक करने के लिए महापंचायत की जा रही है। लेकिन पंजाब में पहले ही किसान जागरूक हैं और इसलिए पंजाब में इनकी जरूरत नहीं है। इसलिए किसान नेता जितनी मेहनत महापंचायतों में कर रहे हैं, वह गांवों में अभियान चलाकर हर घर से एक किसान को बॉर्डर चलने की अपील करे। इसके लिए अभियान भी शुरू कर दिया है और पंजाब से जल्द ही काफी किसानों के बॉर्डर पर पहुंचने का दावा किया जा रहा है।
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पंजाब में सभी किसान कृषि कानूनों से होने वाले नुकसान को लेकर जागरूक हैं। इसलिए वहां से सभी को बॉर्डर पर पहुंचने के लिए कहा गया है और उसका असर दिखने लगा है। वहां से काफी किसान जल्द ही बॉर्डर पर पहुंचेंगे और बॉर्डर पर पहले से ज्यादा भीड़ दिखाई देगी।
- बूटा सिंह, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा
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किसान महापंचायतों में जुट गए थे, जबकि इसकी कोई जरूरत नहीं है। इसलिए सभी को कहा गया है कि महापंचायतों की जगह बॉर्डर पर पक्के मोर्चों पर जाकर बैठें। उससे ही सरकार पर दबाव बनेगा। पंजाब से काफी किसान बॉर्डर पर पहुंच रहे हैं।
- राजेंद्र सिंह दीपसिंह वाला, अध्यक्ष कीर्ति किसान यूनियन