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दिल्ली के बॉर्डरों से चल रही तीन प्रदेशों के कई गांवों की सरकार
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अंकित चौहान
सोनीपत। जहां दिल्ली की सीमाओं पर किसान डटे हुए हैं और कृषि कानून रद्द करने की मांग कर रहे हैं। वहीं उन बॉर्डर से तीन प्रदेशों के कई गांवों की सरकार भी चल रही है। पंजाब, हरियाणा व यूपी के 50 से ज्यादा गांवों के सरपंच भी किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए आए हुए हैं तो ऐसे भी सरपंच हैं जो बॉर्डर पर किसानों के बीच प्रतिदिन जा रहे हैं। इस तरह गांवों में विकास से लेकर अन्य कार्य भी वह बॉर्डर पर रहकर की करा रहे हैं। वह कोई भी कार्य कराने के लिए निर्देश देते हैं और उस कार्य के होने पर सरपंच के साथी व अन्य पंच जाकर देख लेते हैं। केवल सरपंच ही नहीं, बल्कि गांवों के नंबरदार भी बॉर्डर पर किसान आंदोलन में शामिल होकर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर किसान 45 दिन से आंदोलन करते हुए बॉर्डर पर डटे हुए हैं। किसानों व सरकार के बीच लगातार बातचीत हो रही है, लेकिन उसके बावजूद कोई फैसला नहीं होने से आंदोलन तेज होता जा रहा है। जहां किसान बॉर्डर पर रहकर ही अपने परिवार की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं और बॉर्डर से दिशा निर्देश देकर घर की महिलाओं से खेती करा रहे हैं। इस तरह ही तीन प्रदेशों हरियाणा, पंजाब, यूपी के कई गांवों की सरकार भी बॉर्डर से चल रही है। इन जगहों के 50 से ज्यादा गांवों के सरपंच भी अलग-अलग बॉर्डर पर डेरा डाले हुए है और गांवों में विकास से लेकर अन्य कार्य वहां से निर्देश देकर ही करा रहे हैं। वहीं अब सरकार का रुख देखकर सरपंचों ने 26 जनवरी की किसान परेड के लिए लोगों को एकजुट करके बॉर्डर पर बुलाने का बीड़ा भी उठा लिया है। इनके साथ ही गांवों के नंबरदार भी किसान आंदोलन में शामिल होकर बॉर्डर पर पहुंच गए हैं और वह भी गणतंत्र दिवस की परेड के लिए लोगों को जागरूक करने में जुटे है। किसान आंदोलन में पहुंच रहे सरपंच व नंबरदारों कहते हैं कि वह सबसे पहले किसान हैं और इसलिए ही किसान आंदोलन में शामिल हुए हैं। अब कृषि कानून रद्द कराने के बाद ही वह वापस लौटेंगे, क्योंकि कानून रद्द नहीं होते है तो उनकी खेती भी नहीं बचेगी। ऐसे में उनके लौटने से कोई फायदा नहीं है। इसलिए सरकार को 26 जनवरी को किसान अपनी ताकत का अहसास कराएंगे और कृषि कानून रद्द कराकर रहेंगे। वह कहते है कि बॉर्डर पर रहते हुए कोई भी कार्य कराना होता है तो वह मजदूरों को उसके बारे में बता देते हैं और उसके बाद कोई साथी उस कार्य को जाकर देख लेता है। इस तरह से वह काम भी कर रहे हैं।
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हमारे लिए सरपंच का पद ज्यादा जरूरी नहीं है, बल्कि किसानों की हक की लड़ाई जरूरी है। गांव में काम चल रहा है और भाई व अन्य से काम करा लिया जाता है तो यहां से मैं खुद बता देता हूं। सरकार संशोधन के लिए जोर दे रही है, लेकिन हम संशोधन नहीं चाहिए। 26 जनवरी का इंतजार कर रहे हैं और उस दिन लालकिला पर किसान झंडा लहराएंगे। अगर अपनी जान भी देनी पड़ी तो हम पीछे हटने वाले नहीं है।
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संजू, सरपंच सिहाग कुरुक्षेत्र
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किसानों के समर्थन में सभी खड़े हो रहे हैं और हम भी किसान हैं। यह आंदोलन केवल बॉर्डर तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों से यहां नहीं आने वाले लोग भी कानूनों का विरोध कर रहे हैं। हमारे लिए यहां रहना जरूरी है और हम यहां से कानून रद्द नहीं होने तक नहीं जाएंगे। सरकार के संशोधन करने की बात कहने से कुछ नहीं होता है। हम अपनी बात पर अडिग है और हम किसी भी हालत में पीछे हटने वाले नहीं हैं। हम गांवों में लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि वह 26 जनवरी की किसान परेड में शामिल हो। उस दिन गांवों से सभी लोग आएंगे और वह किसान परेड में शामिल होंगे। उससे सरकार को पता चल जाएगा कि किसानों की कितनी ताकत है।
सुरेंद्र, नंबरदार, करोड़ा, कैथल
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किसान आंदोलन में सरपंच, नंबरदार, पंच सभी आए हुए हैं। वह भी पहले किसान हैं और गांव में किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हम सभी बॉर्डर पर जा रहे हैं तो हरियाणा, पंजाब, यूपी के सरपंच मिल रहे हैं और वह गणतंत्र दिवस की किसान परेड में ज्यादा से ज्यादा किसानों को गांव से लेकर आने की बात भी कहते हैं। वह खुद पहले से किसान आंदोलन में शामिल होकर बॉर्डर पर डटे हुए हैं और अब अन्य किसानों को लाने में लगे हैं। वह अपने अधिकतर यहां बैठकर भी कर लेते हैं।
गुरनाम सिंह चढूनी, अध्यक्ष, भाकियू, हरियाणा
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सोनीपत। जहां दिल्ली की सीमाओं पर किसान डटे हुए हैं और कृषि कानून रद्द करने की मांग कर रहे हैं। वहीं उन बॉर्डर से तीन प्रदेशों के कई गांवों की सरकार भी चल रही है। पंजाब, हरियाणा व यूपी के 50 से ज्यादा गांवों के सरपंच भी किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए आए हुए हैं तो ऐसे भी सरपंच हैं जो बॉर्डर पर किसानों के बीच प्रतिदिन जा रहे हैं। इस तरह गांवों में विकास से लेकर अन्य कार्य भी वह बॉर्डर पर रहकर की करा रहे हैं। वह कोई भी कार्य कराने के लिए निर्देश देते हैं और उस कार्य के होने पर सरपंच के साथी व अन्य पंच जाकर देख लेते हैं। केवल सरपंच ही नहीं, बल्कि गांवों के नंबरदार भी बॉर्डर पर किसान आंदोलन में शामिल होकर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर किसान 45 दिन से आंदोलन करते हुए बॉर्डर पर डटे हुए हैं। किसानों व सरकार के बीच लगातार बातचीत हो रही है, लेकिन उसके बावजूद कोई फैसला नहीं होने से आंदोलन तेज होता जा रहा है। जहां किसान बॉर्डर पर रहकर ही अपने परिवार की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं और बॉर्डर से दिशा निर्देश देकर घर की महिलाओं से खेती करा रहे हैं। इस तरह ही तीन प्रदेशों हरियाणा, पंजाब, यूपी के कई गांवों की सरकार भी बॉर्डर से चल रही है। इन जगहों के 50 से ज्यादा गांवों के सरपंच भी अलग-अलग बॉर्डर पर डेरा डाले हुए है और गांवों में विकास से लेकर अन्य कार्य वहां से निर्देश देकर ही करा रहे हैं। वहीं अब सरकार का रुख देखकर सरपंचों ने 26 जनवरी की किसान परेड के लिए लोगों को एकजुट करके बॉर्डर पर बुलाने का बीड़ा भी उठा लिया है। इनके साथ ही गांवों के नंबरदार भी किसान आंदोलन में शामिल होकर बॉर्डर पर पहुंच गए हैं और वह भी गणतंत्र दिवस की परेड के लिए लोगों को जागरूक करने में जुटे है। किसान आंदोलन में पहुंच रहे सरपंच व नंबरदारों कहते हैं कि वह सबसे पहले किसान हैं और इसलिए ही किसान आंदोलन में शामिल हुए हैं। अब कृषि कानून रद्द कराने के बाद ही वह वापस लौटेंगे, क्योंकि कानून रद्द नहीं होते है तो उनकी खेती भी नहीं बचेगी। ऐसे में उनके लौटने से कोई फायदा नहीं है। इसलिए सरकार को 26 जनवरी को किसान अपनी ताकत का अहसास कराएंगे और कृषि कानून रद्द कराकर रहेंगे। वह कहते है कि बॉर्डर पर रहते हुए कोई भी कार्य कराना होता है तो वह मजदूरों को उसके बारे में बता देते हैं और उसके बाद कोई साथी उस कार्य को जाकर देख लेता है। इस तरह से वह काम भी कर रहे हैं।
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हमारे लिए सरपंच का पद ज्यादा जरूरी नहीं है, बल्कि किसानों की हक की लड़ाई जरूरी है। गांव में काम चल रहा है और भाई व अन्य से काम करा लिया जाता है तो यहां से मैं खुद बता देता हूं। सरकार संशोधन के लिए जोर दे रही है, लेकिन हम संशोधन नहीं चाहिए। 26 जनवरी का इंतजार कर रहे हैं और उस दिन लालकिला पर किसान झंडा लहराएंगे। अगर अपनी जान भी देनी पड़ी तो हम पीछे हटने वाले नहीं है।
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संजू, सरपंच सिहाग कुरुक्षेत्र
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किसानों के समर्थन में सभी खड़े हो रहे हैं और हम भी किसान हैं। यह आंदोलन केवल बॉर्डर तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों से यहां नहीं आने वाले लोग भी कानूनों का विरोध कर रहे हैं। हमारे लिए यहां रहना जरूरी है और हम यहां से कानून रद्द नहीं होने तक नहीं जाएंगे। सरकार के संशोधन करने की बात कहने से कुछ नहीं होता है। हम अपनी बात पर अडिग है और हम किसी भी हालत में पीछे हटने वाले नहीं हैं। हम गांवों में लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि वह 26 जनवरी की किसान परेड में शामिल हो। उस दिन गांवों से सभी लोग आएंगे और वह किसान परेड में शामिल होंगे। उससे सरकार को पता चल जाएगा कि किसानों की कितनी ताकत है।
सुरेंद्र, नंबरदार, करोड़ा, कैथल
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किसान आंदोलन में सरपंच, नंबरदार, पंच सभी आए हुए हैं। वह भी पहले किसान हैं और गांव में किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हम सभी बॉर्डर पर जा रहे हैं तो हरियाणा, पंजाब, यूपी के सरपंच मिल रहे हैं और वह गणतंत्र दिवस की किसान परेड में ज्यादा से ज्यादा किसानों को गांव से लेकर आने की बात भी कहते हैं। वह खुद पहले से किसान आंदोलन में शामिल होकर बॉर्डर पर डटे हुए हैं और अब अन्य किसानों को लाने में लगे हैं। वह अपने अधिकतर यहां बैठकर भी कर लेते हैं।
गुरनाम सिंह चढूनी, अध्यक्ष, भाकियू, हरियाणा