फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Sonipat News ›   exclusive

विदेश निर्यात नहीं हो रहा चावल, राइस मिलों में स्टॉक लगा होने से धान के दाम में आई कमी

Tue, 29 Sep 2020 12:57 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Tue, 29 Sep 2020 12:57 AM IST
विज्ञापन
exclusive
रोहतक रोड स्थित अनाज मंडी में लगे धान के बोरे। - फोटो : Sonipat
सोनीपत। कोरोना महामारी की मार धान की खेती करने वाले किसानों पर भी पड़ रही है। कोरोना के कारण विदेश में चावल निर्यात न होने के कारण राइस मिलों में अभी तक स्टॉक लगा हुआ है। राइस मिलों में स्टॉक लगा होने के कारण धान के दाम में पिछले वर्ष के मुकाबले इस बार 600 से 700 रुपये तक कमी आई है। इससे किसानों को अपनी फसल को कम दामों पर ही बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है। ऐसे में किसानों का आरोप है कि सरकार का उनकी आय बढ़ाने का दावा हवा-हवाई हो चुका है। धान के रेट में कमी आने के चलते इस बार उनकी लागत भी नहीं निकल पा रही है। हालांकि एक सप्ताह से चल रही धान की खरीद के बाद सोमवार को 130 रुपये की बढ़ोत्तरी हुई है।
विज्ञापन

गांव शहजादपुर के कुलदीप व नांगल कलां के रहने वाले बिंद्र का कहना है कि धान की फसल में लगने वाली कीटनाशक व खरपतवार की दवाइयों के रेट दोगुने दामों में पहुंच गए हैं। यही नहीं डीजल के दाम भी इस वक्त पेट्रोल के बराबर हो रहे हैं। जिस कारण प्रतिवर्ष धान की फसल उगाने के लिए लागत बढ़ती जा रही है। लेकिन पिछले कई सालों से धान की कीमत चार हजार रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर नहीं पहुंच सकी है। ऐसे में किसान हर वर्ष कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा है। यही नहीं बारिश के कम होने से भी धान की पैदावार कम हो रही है। इसके बावजूद लगातार धान के रेट कम होते जा रहे हैं। हालांकि सरकार ने किसानों की आय को दोगुना करने का दावा किया था, लेकिन अब लगता है कि किसानों को अपनी फसल को कौड़ियों के दाम ही बेचना पड़ेगा। मिलर्स के लोग मंडी में अपनी मर्जी के रेट लगा रहे हैं, जिस कारण किसानों को कम दामों में ही अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
विज्ञापन

सिंचाई व मजदूरी को छोड़कर एक एकड़ में आ रही 20 हजार रुपये की लागत
मंडी में धान की फसल लेकर पहुंचे किसानों की मानें तो सिंचाई व मजदूरी को छोड़कर एक एकड़ में 20 हजार रुपये की लागत आ रही है। जबकि आमदनी मात्र 32 हजार रुपये की हो रही है। ऐसे में यदि किसान अपनी मेहनत व सिंचाई का हिसाब जोड़े तो यह लागत आमदनी से भी अधिक पहुंच जाएगी। वहीं किसानों का कहना है कि जब से सरकार ने ई-पेमेंट की सुविधा की है, तब से आढ़ती भी किसानों को नकद भुगतान करने से कतराने लगे हैं। जिस कारण किसानों की और अधिक समस्या बढ़ गई है। फसल बेचने के बाद किसानों को सीधे पेमेंट न मिलने के कारण उन्हें अगली फसल बोने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन

किसानों की समस्या उन्हीं की जुबानी :
सरकार का दोगुनी आय का दावा फेल साबित हो चुका है। अब सरकार किसानों को परंपरागत खेती छोड़कर वैज्ञानिक खेती अपनाने के लिए कह रही है। ऐसे में किसानों की समस्या और अधिक बढ़ जाएगी। यदि सभी किसान परंपरागत खेती को छोड़कर वैज्ञानिक खेती अपनाने लगेंगे तो उनकी हालत पहले से भी बदतर हो जाएगी।

-कुलदीप, शहजादपुर।
-हम लोग अपने बुजुर्गों की नीति पर फसल उगा रहे हैं। ऐसे में यदि एकदम परंपरागत खेती को छोड़कर वैज्ञानिक खेती को अपनाएंगे तो उसमें बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। फसल उगाने से लेकर बेचने तक परेशानी ही परेशानी होगी। ऐसे में सरकार को नई फसल को खरीदने के लिए उचित प्रबंध करने चाहिए।
-बिंद्र, नांगल कलां।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed