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केंद्रीय मंत्री ने कानून में काला पूछा तो किसान नेताओं ने अभियान चलाकर कहा मंडी खत्म हो जाएगी, अनुबंध खेती के लिए नियम गलत

Sun, 07 Feb 2021 12:44 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sun, 07 Feb 2021 12:44 AM IST
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सोनीपत। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने राज्यसभा में पूछा कि कृषि कानूनों में काला आखिर काला क्या है, यह किसान नेता भी आजतक नहीं बता सके। जिसके बाद किसान नेताओं ने अभियान शुरू कर दिया और कृषि कानूनों को आखिर वह काला क्यों कहते है, उसके बारे में शनिवार को कुंडली बॉर्डर के मंच से बताया गया तो सोशल मीडिया पर भी अभियान छेड़ा गया। किसान नेताओं ने यहां तक कहा कि जब वह कानूनों की खामियां बताते है, तभी मंत्री उठकर चले जाते हैं।
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कानून संविधान के अनुसार नहीं, हर किसी के लिए नुकसानदायक
कृषि मंत्री के कानून में काला क्या होने के बारे में पूछने पर किसान नेता जगजीत सिंह दल्लेवाल ने कहा कि सरकार ने कानूनों में फूड ग्रेन व मार्केटिंग को शामिल किया है। जबकि संविधान के अनुसार सरकार इनपर कोई कानून नहीं बना सकती है। उन्होंने कहा कि जब मंत्री को बैठक में यह कहा जाता है तो वह हर बार यह कहकर निकल जाते थे कि यह कानून संविधान के अनुसार नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट चले जाओ। जगजीत सिंह दल्लेवाल ने कहा कि कानून बनाने की नीयत ही काली है। जब सरकारी मंडी के बराबर प्राइवेट मंडी होगी। वहां व्यापारी माल खरीदेगा तो उसपर 164 रुपये प्रति क्विंटल टैक्स नहीं लगेगा। उसमें से व्यापारियों को ज्यादा फायदा होगा, जबकि किसानों को केवल 64 रुपये की छूट दी जाएगी। जबकि अभी तक वह टैक्स का रुपया मंडी क्षेत्र में विकास में खर्च होता है और उससे किसानों को फायदा है। इसके साथ ही सरकारी मंडी के आढ़ती व मजदूर नहीं रहेगा। अगर फसल खरीदने वाला पैसे लेकर भाग जाएगा। किसान कोर्ट नहीं जा सकेगा और इस तरह से कोर्ट जाने का रास्ता बंद कर देना काला कानून है।
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किसान की फसल व पैसे लेकर भागने पर कोर्ट जाने का नियम ही नहीं, इसलिए काला कानून
कीर्ति किसान यूनियन के राजिंदर सिंह दीप सिंह वाला ने कहा कि इन कानूनों का उद्देश्य सबकुछ कारपोरेट के हवाले करना है। पहले कानून में प्राइवेट मंडी खोलने की तैयारी है, जिससे सरकारी मंडी बंद हो जाएगी। जब सरकारी मंडी ही खत्म हो जाएगी तो एमएसपी पर फसल खरीद का कोई मतलब ही नहीं होता है। उन्होंने कहा कि जिस टैक्स को खत्म करने की बात कही जा रही है, वह व्यापारी पर लगता था जो 164 रुपये क्विंटल देता था। मार्केट कमेटी का वह पैसा किसानों को हादसा होने पर मदद के रूप में मिलता है। उसको विकास पर खर्च किया जाता है। यह पैसा किसानों के लिए ही खर्च होता है। इस तरह यह समझना होगा। कहा कि जिस अनुबंध खेती की बात कही जा रही है, अगर अनुबंध खेती में कोई व्यापारी किसान के पैसे व फसल लेकर भाग जाता है तो उसके खिलाफ कोर्ट नहीं जा सकता है। इसके अलावा फसल की गुणवत्ता जांचने के बाद दाम तय होंगे। किसान की फसल खुले आसमान के नीचे होती है और उसका रंग बारिश व हवा में बदल जाता है। हालांकि फसल अच्छी रहती है। लेकिन फसल के रंग से दाम तय करेंगे तो इस तरह से इन सभी नियमों से यह काला कानून है।
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