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पहले फौज में रहकर की देश की सुरक्षा, अब जैविक खेती कर विदेशों तक पहुंचा रह मिठास
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पहले फौज में रहकर की देश की सुरक्षा, अब जैविक खेती कर विदेशों तक पहुंचा रहा मिठास
अमर उजाला ब्यूरो
सोनीपत। फौजियों के अंदर एक अलग ही जज्बा होता है और वह कुछ अलग करने की ठान लेते हैं तो उसे करके ही दिखाते हैं। ऐसे ही पानीपत के ताजपुर गांव के रहने वाले महाल सिंह है जो पहले फौज में रहकर सीमा पर देश की सुरक्षा की अब सेवानिवृत्त होने पर जैविक खेती कर अपने गन्ने की मिठास विदेशों तक पहुंचा रहे हैं। उनको शुरूआत में ताने भी झेलने पड़े, लेकिन उसके बाद भी पीछे नही हटे और अब कामयाबी ऐसी मिली कि एग्री लीडरशिप समिट में किसानों को जागरूक करने के लिए उनको बुलाया गया।
पानीपत के ताजपुर के रहने वाले महाल सिंह ने फौज से सेवानिवृत्त होने के बाद जैविक खेती करनी शुरू कर दी। महाल सिंह ने गन्ने की फसल को जैविक तरीके से उगाया, लेकिन पहली बार में फसल नहीं हुई। गांव के लोगों ने ताना मारना शुरू कर दिया, क्योंकि महाल सिंह अपने साथ ही दूसरे किसानों को भी जैविक खेती करने की सलाह देते थे। अपनी फसल नहीं होने पर महाल सिंह थोड़े उदास जरूर हुए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और दोबारा से जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाया। इस तरह दोबारा प्रयास करने पर अच्छी फसल हुई और उनके खेत में गन्ना 15 फुट तक पहुंच गया। उनके खेत में गन्ना देखने के लिए लोग जाने लगे। महाल सिंह ने अपनी सोच को केवल गन्ना उगाने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि खेती को उद्योग के साथ जोड़ दिया। उसने अपने गन्ने से अपने ही कोल्हू में गुड़, खांड़, शक्कर बनाकर सप्लाई शुरू कर दी। अपने ही देश में मांग बढ़ने के बाद अब गन्ने के उत्पादों की सप्लाई दुबई, नाइजीरिया, अमेरिका व थाइलैंड तक करते हैं।
नौकरी नहीं मिलने पर खेती करने लगा रवींद्र, प्रति एकड़ 6 लाख तक कमा रहा
सोनीपत के रवींद्र दहिया ने बीए करने के बाद नौकरी करनी चाही, लेकिन वह काफी भागदौड़ करता रहा और उसे नौकरी नहीं मिली। उसने आखिर में खेती करने का फैसला लिया। उसने पारंपरिक खेती से हटकर किया और अपने खेतों में फूलों की खेती शुरू कर दी। पहले वह अपने खेतों में फूलों की खेती करता था, लेकिन अब वह झुंडपुर व मुरथल में 15 एकड़ में फूलों की खेती करता है। रवींद्र ने बताया कि उससे 5-6 लाख रुपये प्रति एकड़ तक एक सीजन में कमाई करता है। उसको भी प्रगतिशील किसानों की श्रेणी में रखकर दूसरे किसानों को जागरूक करने के लिए समिट में बुलाया गया।
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अमर उजाला ब्यूरो
सोनीपत। फौजियों के अंदर एक अलग ही जज्बा होता है और वह कुछ अलग करने की ठान लेते हैं तो उसे करके ही दिखाते हैं। ऐसे ही पानीपत के ताजपुर गांव के रहने वाले महाल सिंह है जो पहले फौज में रहकर सीमा पर देश की सुरक्षा की अब सेवानिवृत्त होने पर जैविक खेती कर अपने गन्ने की मिठास विदेशों तक पहुंचा रहे हैं। उनको शुरूआत में ताने भी झेलने पड़े, लेकिन उसके बाद भी पीछे नही हटे और अब कामयाबी ऐसी मिली कि एग्री लीडरशिप समिट में किसानों को जागरूक करने के लिए उनको बुलाया गया।
पानीपत के ताजपुर के रहने वाले महाल सिंह ने फौज से सेवानिवृत्त होने के बाद जैविक खेती करनी शुरू कर दी। महाल सिंह ने गन्ने की फसल को जैविक तरीके से उगाया, लेकिन पहली बार में फसल नहीं हुई। गांव के लोगों ने ताना मारना शुरू कर दिया, क्योंकि महाल सिंह अपने साथ ही दूसरे किसानों को भी जैविक खेती करने की सलाह देते थे। अपनी फसल नहीं होने पर महाल सिंह थोड़े उदास जरूर हुए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और दोबारा से जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाया। इस तरह दोबारा प्रयास करने पर अच्छी फसल हुई और उनके खेत में गन्ना 15 फुट तक पहुंच गया। उनके खेत में गन्ना देखने के लिए लोग जाने लगे। महाल सिंह ने अपनी सोच को केवल गन्ना उगाने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि खेती को उद्योग के साथ जोड़ दिया। उसने अपने गन्ने से अपने ही कोल्हू में गुड़, खांड़, शक्कर बनाकर सप्लाई शुरू कर दी। अपने ही देश में मांग बढ़ने के बाद अब गन्ने के उत्पादों की सप्लाई दुबई, नाइजीरिया, अमेरिका व थाइलैंड तक करते हैं।
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नौकरी नहीं मिलने पर खेती करने लगा रवींद्र, प्रति एकड़ 6 लाख तक कमा रहा
सोनीपत के रवींद्र दहिया ने बीए करने के बाद नौकरी करनी चाही, लेकिन वह काफी भागदौड़ करता रहा और उसे नौकरी नहीं मिली। उसने आखिर में खेती करने का फैसला लिया। उसने पारंपरिक खेती से हटकर किया और अपने खेतों में फूलों की खेती शुरू कर दी। पहले वह अपने खेतों में फूलों की खेती करता था, लेकिन अब वह झुंडपुर व मुरथल में 15 एकड़ में फूलों की खेती करता है। रवींद्र ने बताया कि उससे 5-6 लाख रुपये प्रति एकड़ तक एक सीजन में कमाई करता है। उसको भी प्रगतिशील किसानों की श्रेणी में रखकर दूसरे किसानों को जागरूक करने के लिए समिट में बुलाया गया।
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