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Sirsa News: माहे रमजान रोजा की पहली सहरी होगी 5 बजकर 22 मिनट पर
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सिरसा। जिले में माहे रमजान रोजा मंगलवार से शुरू हो रहे हैं। मुस्लिम समाज के लोगों ने तैयारियां पूरी कर ली हैं। रोजा इफ्तार को लेकर सोमवार को जिले की विभिन्न मस्जिदों की साफ सफाई की गई। वहीं शहर की मुख्य मस्जिद सदर बाजार में मुख्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। सोमवार को मुस्लिम समाज के लोगों ने रोजा की तैयारियां की। इस दौरान लोगों ने फल खजूर और सेवई लच्छा की खरीदारी की।
सदर बाजार स्थित जामा मस्जिद के मौलाना मोहम्मद सुलेमान ने बताया कि रोजा रखने का असल मकसद महज भूख प्यास पर नियंत्रण रखना ही नहीं बल्कि रोजा की रूह दरअसल आत्म संयम, नियंत्रण अल्लाह के प्रति अकीदत और सही राह पर चलने के संकल्प है। 11 महीने तक इंसान दुनियादारी में फंसा रहता है। रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना होता है। रोजे को इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक माना जाता है।
रमजान में मुस्लिम समुदाय के लोग महीने भर रोजा रखते हैं और अल्लाह की पूरी शिद्दत से इबादत करते हैं। इस्लामी आस्था के मुताबिक दिनभर रोजा रखने से बंदे अल्लाह के करीब पहुंचते हैं और दूसरों के कासन को समझते है। रोज के लिए सुबह शहरी और शाम को इफ्तार करके रोजा खोला जाता है।
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सोमवार को चांद का दीदार कर शुरू किया रोजा
सोमवार रात से मुस्लिम समाज के लोग चांद का दीदार कर माहे रमजान रोजा की शुरू करेंगे। चांद का दीदार कर नमाज ए तरावीह शुरू हो जाएगी। मंगलवार सुबह 5 बजकर 22 मिनट पर सहरी होगी। उसके बाद शाम को 6 बजकर 39 पर इफ्तार होगा। ऐसे ही हर दिन सहरी के लिए एक मिनट घटता जाएगा। वहीं इफ्तार के लिए एक मिनट रोज बढ़ता रहेगा।
जाने क्या होता है सहरी और इफ्तार
इस्लाम धर्म का सबसे महत्वपूर्ण रमजान का महीना होता है। इस्लाम धर्म में रोजा रखने का मतलब है, खुद को खुदा के लिए समर्पित करना। ये रोजा पूरे एक महीने तक सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त रखा जाता है। इसके साथ ही रमजान के महीने में सहरी और इफ्तार की परंपरा भी निभाई जाती है। इस्लामिक परंपराओं के अनुसार, रमजान के महीने में रोजा रखने वाले अगर सुबह सूर्योदय से पहले कुछ खा लेते हैं तो उसे सहरी कहते हैं और पूरे दिन इबादत कर शाम को सूर्यास्त के बाद खुदा से दुआ करने के बाद उपवास तोड़ा जाता है। जिसे इफ्तार कहा जाता है। रोजे के दौरान कुछ भी खाने या पीने की अनुमति नहीं होती है। इफ्तार में खजूर खाकर ही रोजा खोला जाता है।
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- सोमवार रात को चांद के दीदार के साथ रोजा शुरू हो जाएंगे। मंगलवार सुबह सभी जुहू करके 5 बजकर 22 मिनट पर सहरी करेंगे। वहीं शाम को 6 बजकर 39 मिनट पर इफ्तार होगा।
-मौलाना मोहम्मद सुलेमान, जामा मस्जिद सदर बाजार, सिरसा।
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सदर बाजार स्थित जामा मस्जिद के मौलाना मोहम्मद सुलेमान ने बताया कि रोजा रखने का असल मकसद महज भूख प्यास पर नियंत्रण रखना ही नहीं बल्कि रोजा की रूह दरअसल आत्म संयम, नियंत्रण अल्लाह के प्रति अकीदत और सही राह पर चलने के संकल्प है। 11 महीने तक इंसान दुनियादारी में फंसा रहता है। रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना होता है। रोजे को इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक माना जाता है।
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रमजान में मुस्लिम समुदाय के लोग महीने भर रोजा रखते हैं और अल्लाह की पूरी शिद्दत से इबादत करते हैं। इस्लामी आस्था के मुताबिक दिनभर रोजा रखने से बंदे अल्लाह के करीब पहुंचते हैं और दूसरों के कासन को समझते है। रोज के लिए सुबह शहरी और शाम को इफ्तार करके रोजा खोला जाता है।
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सोमवार को चांद का दीदार कर शुरू किया रोजा
सोमवार रात से मुस्लिम समाज के लोग चांद का दीदार कर माहे रमजान रोजा की शुरू करेंगे। चांद का दीदार कर नमाज ए तरावीह शुरू हो जाएगी। मंगलवार सुबह 5 बजकर 22 मिनट पर सहरी होगी। उसके बाद शाम को 6 बजकर 39 पर इफ्तार होगा। ऐसे ही हर दिन सहरी के लिए एक मिनट घटता जाएगा। वहीं इफ्तार के लिए एक मिनट रोज बढ़ता रहेगा।
जाने क्या होता है सहरी और इफ्तार
इस्लाम धर्म का सबसे महत्वपूर्ण रमजान का महीना होता है। इस्लाम धर्म में रोजा रखने का मतलब है, खुद को खुदा के लिए समर्पित करना। ये रोजा पूरे एक महीने तक सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त रखा जाता है। इसके साथ ही रमजान के महीने में सहरी और इफ्तार की परंपरा भी निभाई जाती है। इस्लामिक परंपराओं के अनुसार, रमजान के महीने में रोजा रखने वाले अगर सुबह सूर्योदय से पहले कुछ खा लेते हैं तो उसे सहरी कहते हैं और पूरे दिन इबादत कर शाम को सूर्यास्त के बाद खुदा से दुआ करने के बाद उपवास तोड़ा जाता है। जिसे इफ्तार कहा जाता है। रोजे के दौरान कुछ भी खाने या पीने की अनुमति नहीं होती है। इफ्तार में खजूर खाकर ही रोजा खोला जाता है।
-मौलाना मोहम्मद सुलेमान, जामा मस्जिद सदर बाजार, सिरसा।