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माटी म्ह माटी हुई कुम्हार की जिंदगानी
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The life of a potter
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माटी म्ह माटी हुई कुम्हार जिंदगानी...यह बोल उस कुम्हार के हैं, जो अपने मेहनत और कला के दम पर दीपावली और अन्य पर्वों पर लोगों के घर और मंदिर को रोशन करता है। आधुनिकता की चकाचौंध में खत्म हो रही पारंपरिक कला और व्यवसाय से कुम्हार परेशान है। महंगाई और जिंदगी के अन्य झंझावात के कारण उनके लिए कुटुंब का पालन पोषण भी परेशानी का सबब बना हुआ है। अमर उजाला से बातचीत के दौरान एक कुम्हार ने अपने दर्द को बयां किया।
माजरा निवासी तोताराम ने बताया कि करवाचौथ व दीपावली का त्योहार जैसे-जैसे नजदीक आता है, वैसे-वैसे ही कुम्हार की चाक भी रफ्तार पकड़ने लगती है। कुम्हार को आस बंधी रहती है कि जब वह ज्यादा बर्तन बनाएगा तो ज्यादा बिक्री होगी। इससे वह कुछ रुपये कमा लेगा। उसके परिवार के लिए कुछ दिनों तक दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो जाएगा। उन्होंने बताया कि कच्ची मिट्टी को आकार देने वाले हाथ हर साल इसी उम्मीद के साथ दीये व मिट्टी के बर्तन बनाना शुरू करते हैं। उन्हें उम्मीद रहती है कि करवाचौथ पर पूजा में उपयोग होने वाला पात्र ‘करवा’ व दीये उनकी जिंदगी में खुशियां ले कर आएगा।
आधुनिकता और स्पर्धा के चलते पारंपरिक कला और व्यवसाय का हो रहा ह्रास
तोताराम ने बताया कि दीपावली पर लोग फैंसी उत्पादों को अधिक पसंद करते हैं। प्लास्टिक से बनी चाइनीज चीजें लोगों को ज्यादा पसंद आती हैं। आधुनिकता और स्पर्धा के चलते उनकी पारंपरिक कला और व्यवसाय का ह्रास हो रहा है। साथ ही रोजी-रोटी पर संकट आ रहा है। उन्होंने बताया कि पहले साधारण दीये बनाये जाते थे और लोग उन्हेें पसंद भी करते थे। अब लोगों की पसंद को देखते हुए उन्होंने भी डिजाइनदार दीये और अन्य मिट्टी के बर्तन बनाने शुरू कर दिए हैं, लेकिन इसके बाद भी लोग नहीं खरीद रहे हैं। बाजार में चाइनीज झालर और अन्य रोशनी करने वाली चीजों की मांग रहती है। उनके दीये को कोई भी नहीं पूछता है।
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पिता की विरासत को आगे नहीं बढ़ाना चाहते हैं बेटे
तोताराम ने बताया कि मिट्टी के बर्तन बनाने की कला उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली है। उनके पिता ने यह कला अपने पूर्वजों से सीखी थी। लेकिन अब उनके बेटे इस विरासत को आगे नहीं ले जाना चाहते हैं। वे यह काम नहीं करना चाहते हैं। उनका कहना है कि वे दूसरा कार्य कर लेंगे, लेकिन मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य नहीं करेंगे। इस काम में अब कोई लाभ नहीं है। मेहनताना भी मुश्किल से निकलता है।
पिछले साल का बनाया दीया व बर्तन आज तक नहीं बिक सका
तोताराम ने बताया कि पिछले साल जो मिट्टी के दीये व बर्तन बनाए थे, वो आज तक पूरा नहीं बिक सका है। आधा सामान बचा हुआ है। वह चार महीने से मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं और इस उम्मीद से बना रहे हैं कि शायद इस बार सब बिक जाए। इस काम मेें ज्यादा लाभ नहीं है, लेकिन फिर भी वो अपने बेटों को ये कला सिखाने की उनकी चाह रखते हैं। ताकि उनकी ये पूर्वजों की धरोहर आगे बनी रहे।
लागत मूल्य भी निकालना हो जाता है मुश्किल, चटनी-रोटी खाकर बिता रहे जीवन
माजरा निवासी कुलदीप ने बताया कि वह बचपन से मिटटी के बर्तन बनाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि महंगाई ने कुम्हारों की कमर तोड़ रखी है। व्यवसाय पर भी महंगाई की मार पड़ रही है। पूर्व में एक ट्रॉली मिट्टी 2000 रुपये में मिलती थी, लेकिन इस बार इसका मूल्य 4000 रुपये हो गया है। बर्तन पकाने के लिए 12,000 रुपये का ईंधन लग जाता है। इसके बाद भी एक रुपये में एक दीया बिकता है। लागत मूल्य भी निकालना मुश्किल हो जाता है। महंगाई के इस दौर में कुम्हार चटनी-रोटी खाकर जीवन बिता रहे हैं।
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माजरा निवासी तोताराम ने बताया कि करवाचौथ व दीपावली का त्योहार जैसे-जैसे नजदीक आता है, वैसे-वैसे ही कुम्हार की चाक भी रफ्तार पकड़ने लगती है। कुम्हार को आस बंधी रहती है कि जब वह ज्यादा बर्तन बनाएगा तो ज्यादा बिक्री होगी। इससे वह कुछ रुपये कमा लेगा। उसके परिवार के लिए कुछ दिनों तक दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो जाएगा। उन्होंने बताया कि कच्ची मिट्टी को आकार देने वाले हाथ हर साल इसी उम्मीद के साथ दीये व मिट्टी के बर्तन बनाना शुरू करते हैं। उन्हें उम्मीद रहती है कि करवाचौथ पर पूजा में उपयोग होने वाला पात्र ‘करवा’ व दीये उनकी जिंदगी में खुशियां ले कर आएगा।
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आधुनिकता और स्पर्धा के चलते पारंपरिक कला और व्यवसाय का हो रहा ह्रास
तोताराम ने बताया कि दीपावली पर लोग फैंसी उत्पादों को अधिक पसंद करते हैं। प्लास्टिक से बनी चाइनीज चीजें लोगों को ज्यादा पसंद आती हैं। आधुनिकता और स्पर्धा के चलते उनकी पारंपरिक कला और व्यवसाय का ह्रास हो रहा है। साथ ही रोजी-रोटी पर संकट आ रहा है। उन्होंने बताया कि पहले साधारण दीये बनाये जाते थे और लोग उन्हेें पसंद भी करते थे। अब लोगों की पसंद को देखते हुए उन्होंने भी डिजाइनदार दीये और अन्य मिट्टी के बर्तन बनाने शुरू कर दिए हैं, लेकिन इसके बाद भी लोग नहीं खरीद रहे हैं। बाजार में चाइनीज झालर और अन्य रोशनी करने वाली चीजों की मांग रहती है। उनके दीये को कोई भी नहीं पूछता है।
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पिता की विरासत को आगे नहीं बढ़ाना चाहते हैं बेटे
तोताराम ने बताया कि मिट्टी के बर्तन बनाने की कला उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली है। उनके पिता ने यह कला अपने पूर्वजों से सीखी थी। लेकिन अब उनके बेटे इस विरासत को आगे नहीं ले जाना चाहते हैं। वे यह काम नहीं करना चाहते हैं। उनका कहना है कि वे दूसरा कार्य कर लेंगे, लेकिन मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य नहीं करेंगे। इस काम में अब कोई लाभ नहीं है। मेहनताना भी मुश्किल से निकलता है।
पिछले साल का बनाया दीया व बर्तन आज तक नहीं बिक सका
तोताराम ने बताया कि पिछले साल जो मिट्टी के दीये व बर्तन बनाए थे, वो आज तक पूरा नहीं बिक सका है। आधा सामान बचा हुआ है। वह चार महीने से मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं और इस उम्मीद से बना रहे हैं कि शायद इस बार सब बिक जाए। इस काम मेें ज्यादा लाभ नहीं है, लेकिन फिर भी वो अपने बेटों को ये कला सिखाने की उनकी चाह रखते हैं। ताकि उनकी ये पूर्वजों की धरोहर आगे बनी रहे।
लागत मूल्य भी निकालना हो जाता है मुश्किल, चटनी-रोटी खाकर बिता रहे जीवन
माजरा निवासी कुलदीप ने बताया कि वह बचपन से मिटटी के बर्तन बनाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि महंगाई ने कुम्हारों की कमर तोड़ रखी है। व्यवसाय पर भी महंगाई की मार पड़ रही है। पूर्व में एक ट्रॉली मिट्टी 2000 रुपये में मिलती थी, लेकिन इस बार इसका मूल्य 4000 रुपये हो गया है। बर्तन पकाने के लिए 12,000 रुपये का ईंधन लग जाता है। इसके बाद भी एक रुपये में एक दीया बिकता है। लागत मूल्य भी निकालना मुश्किल हो जाता है। महंगाई के इस दौर में कुम्हार चटनी-रोटी खाकर जीवन बिता रहे हैं।