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महर्षि दयानंद की 196वीं जयंतीः रेत के टीले से शुरू हुआ आज आठ एकड़ में फैला आर्य समाज का मठ
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Mehrishi Daynand 196th jyanti today
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रोहतक। वेदों की ओर लौटो का नारा देने वाले समाज सुधारक महर्षि दयानंद सरस्वती के अनुयायियों ने पूरे देश में घूम-घूमकर आर्य समाज की शिक्षाओं का विस्तार किया। हरियाणा राज्य में रोहतक जिला इनमें सबसे महत्वपूर्ण है। यहां पर दयानंद सरस्वती की शिक्षाओं को समाज में आगे बढ़ाने के लिए दयानंद मठ की स्थापना स्वामी स्वतंत्रानंद सरस्वती ने आजादी से पहले की थी। रोहतक में आर्य समाज का काफी प्रभाव है। यहां पर महर्षि दयानंद नाम से विश्वविद्यालय के अलावा कई शैक्षणिक संस्थान और आर्य समाज मंदिर हैं।
रेत के टीले पर शुरू हुआ मठ आज 8 एकड़ जमीन पर बन गया है। इस मठ में वर्तमान समय में भी निर्माण कार्य चल रहा है। मठ के पदाधिकारियों की मानें तो स्वामी दयानंद के अनुयायी रहे स्वामी स्वतंत्रानंद ने लगभग 1937 में इसकी स्थापना की थी। आजादी आंदोलन के अलावा हिंदी आंदोलन के समय में भी यह मठ आंदोलन का केंद्र बना रहा था। गोहाना रोड स्थित इस मठ से शिक्षा दीक्षा लेकर अनेक सदस्य देश के विभिन्न हिस्सों में कार्य कर रहे है। ऐतिहासिक महत्व रखने वाले इस मठ का संचालन आर्य प्रतिनिधि सभा हरियाणा की ओर से किया जा रहा है। सभा का गठन 1975 में किया गया था। इससे पहले यह मठ आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब की देखरेख हो रहा था।
आर्य समाज के बारे में जानकारी
प्रदेश अध्यक्ष मास्टर रामपाल आर्य बताते हैं कि 1966 से पहले पंजाब हरियाणा दिल्ली को आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब चलाती थी 1966 में पंजाब से हरियाणा अलग हो गया। इसके बाद भी आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब ही इसको चलाती रही। 1975 में मठ का विभाजन हुआ। जिसके बाद 1975 में हरियाणा के रोहतक में यह प्रदेश स्तरीय आर्य प्रतिनिधित्व बनाया गया। पूरे हरियाणा में 704 से अधिक आर्य समाज मंदिर हैं। कुरुक्षेत्र में संचालित गुरुकुल भी आर्य समाज का ही है। रोहतक के इस मठ में सुबह शाम हवन होता है। रोहतक झज्जर और सोनीपत में सबसे ज्यादा आर्य समाजी हैं। रोहतक में एक लाख से ज्यादा आर्य समाजी हैं। हर जिले में वेद प्रचार मंडल अध्यक्ष के नेतृत्व में 14 वेद प्रचार रथ वेद प्रचार को बढ़ावा देते हैं और निशुल्क वेद प्रचार वितरित भी किया जाता है। दीपावली पर प्रदूषण होने पर पर्यावरण शुद्धि यज्ञ का आयोजन हर जिले में प्रतिवर्ष किया जाता है। इसके अलावा आर्य समाज शराबबंदी, मांस मदिरा प्रतिबंध, गौ हत्या के विरुद्ध आवाज बखूबी व निरंतर उठाता रहता है और इसके लिए बड़े स्तर पर अभियान भी चलाता है। रोहतक के 8 एकड़ पर बने इस मठ में कई वर्षों से निर्माणाधीन कार्य चल रहा है, जो कि आगे भी चलता रहेगा।
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ये हैं मान्यताएं
ईश्वर का सर्वोत्तम और निज नाम ऊं है। उसमें अनंत गुण होने के कारण उसके ब्रह्मा, महेश, विष्णु, गणेश, देवी, अग्नि, शनि वगैरह अनंत नाम हैं। इनकी अलग-अलग नामों से मूर्ति पूजा ठीक नहीं है। आर्य समाज वर्णव्यवस्था यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र को कर्म से मानता है, जन्म से नहीं। आर्य समाज स्वदेशी, स्वभाषा, स्वसंस्कृति और स्वधर्म का पोषक है।
आर्य समाज सृष्टि की उत्पत्ति का समय चार अरब 32 करोड़ वर्ष और इतना ही समय प्रलय काल का मानता है। योग से प्राप्त मुक्ति का समय वेदों के अनुसार 31 नील 10 खरब 40 अरब यानी एक परांत काल मानता है। आर्य समाज वसुधैव कुटुंबकम् को मानता है। लेकिन भूमंडलीकरण को देश, समाज और संस्कृति के लिए घातक मानता है। आर्य समाज वैदिक समाज रचना के निर्माण व आर्य चक्रवर्ती राज्य स्थापित करने के लिए प्रयासरत है।
आर्य समाज के दस नियम
1. सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैंए उन सबका आदिमूल परमेश्वर है।
2. ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करने योग्य है।
3. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना, पढ़ाना और सुनना, सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।
4. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।
5. सब काम धर्मानुसार, अर्थात सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।
6. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
7. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिए।
8. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए।
9. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिए, किंतु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।
10. सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी, नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने में स्वतंत्र रहें।
अब तक चुने गए 18 प्रधान
आर्य प्रतिनिधि सभा हरियाणा के अब तक 18 प्रधान चुने गए हैं। सर्वप्रथम 1975 में स्वामी रामेश्वरानंद को सभा का प्रधान चुना गया। जिसके बाद दलीप सिंह आर्य, फि र स्वामी रामेश्वरानंद, उनके बाद फि र दलीप सिंह आर्य दो बार प्रधान रहे। उनके बाद प्रो. शेर सिंह लगातार छह बार प्रधान चुने गए। अब तक सबसे लंबे समय तक शेर सिंह की प्रधान रहे हैं। उनके बाद स्वामी ओमानंद को लगातार तीन बार प्रधान चुना गया। उनके बाद आचार्य बलदेव को प्रधान चुना गया। उनके बाद आचार्य विजयपाल दो बार प्रधान चुने गए। वर्तमान में मास्टर रामपाल आर्य को प्रधान चुना हुआ है। जिनके कार्यकाल में ही मठ में स्वामी स्वतंत्रानंद के नाम से हाल का निर्माण किया गया है।
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रेत के टीले पर शुरू हुआ मठ आज 8 एकड़ जमीन पर बन गया है। इस मठ में वर्तमान समय में भी निर्माण कार्य चल रहा है। मठ के पदाधिकारियों की मानें तो स्वामी दयानंद के अनुयायी रहे स्वामी स्वतंत्रानंद ने लगभग 1937 में इसकी स्थापना की थी। आजादी आंदोलन के अलावा हिंदी आंदोलन के समय में भी यह मठ आंदोलन का केंद्र बना रहा था। गोहाना रोड स्थित इस मठ से शिक्षा दीक्षा लेकर अनेक सदस्य देश के विभिन्न हिस्सों में कार्य कर रहे है। ऐतिहासिक महत्व रखने वाले इस मठ का संचालन आर्य प्रतिनिधि सभा हरियाणा की ओर से किया जा रहा है। सभा का गठन 1975 में किया गया था। इससे पहले यह मठ आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब की देखरेख हो रहा था।
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आर्य समाज के बारे में जानकारी
प्रदेश अध्यक्ष मास्टर रामपाल आर्य बताते हैं कि 1966 से पहले पंजाब हरियाणा दिल्ली को आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब चलाती थी 1966 में पंजाब से हरियाणा अलग हो गया। इसके बाद भी आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब ही इसको चलाती रही। 1975 में मठ का विभाजन हुआ। जिसके बाद 1975 में हरियाणा के रोहतक में यह प्रदेश स्तरीय आर्य प्रतिनिधित्व बनाया गया। पूरे हरियाणा में 704 से अधिक आर्य समाज मंदिर हैं। कुरुक्षेत्र में संचालित गुरुकुल भी आर्य समाज का ही है। रोहतक के इस मठ में सुबह शाम हवन होता है। रोहतक झज्जर और सोनीपत में सबसे ज्यादा आर्य समाजी हैं। रोहतक में एक लाख से ज्यादा आर्य समाजी हैं। हर जिले में वेद प्रचार मंडल अध्यक्ष के नेतृत्व में 14 वेद प्रचार रथ वेद प्रचार को बढ़ावा देते हैं और निशुल्क वेद प्रचार वितरित भी किया जाता है। दीपावली पर प्रदूषण होने पर पर्यावरण शुद्धि यज्ञ का आयोजन हर जिले में प्रतिवर्ष किया जाता है। इसके अलावा आर्य समाज शराबबंदी, मांस मदिरा प्रतिबंध, गौ हत्या के विरुद्ध आवाज बखूबी व निरंतर उठाता रहता है और इसके लिए बड़े स्तर पर अभियान भी चलाता है। रोहतक के 8 एकड़ पर बने इस मठ में कई वर्षों से निर्माणाधीन कार्य चल रहा है, जो कि आगे भी चलता रहेगा।
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ईश्वर का सर्वोत्तम और निज नाम ऊं है। उसमें अनंत गुण होने के कारण उसके ब्रह्मा, महेश, विष्णु, गणेश, देवी, अग्नि, शनि वगैरह अनंत नाम हैं। इनकी अलग-अलग नामों से मूर्ति पूजा ठीक नहीं है। आर्य समाज वर्णव्यवस्था यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र को कर्म से मानता है, जन्म से नहीं। आर्य समाज स्वदेशी, स्वभाषा, स्वसंस्कृति और स्वधर्म का पोषक है।
आर्य समाज सृष्टि की उत्पत्ति का समय चार अरब 32 करोड़ वर्ष और इतना ही समय प्रलय काल का मानता है। योग से प्राप्त मुक्ति का समय वेदों के अनुसार 31 नील 10 खरब 40 अरब यानी एक परांत काल मानता है। आर्य समाज वसुधैव कुटुंबकम् को मानता है। लेकिन भूमंडलीकरण को देश, समाज और संस्कृति के लिए घातक मानता है। आर्य समाज वैदिक समाज रचना के निर्माण व आर्य चक्रवर्ती राज्य स्थापित करने के लिए प्रयासरत है।
आर्य समाज के दस नियम
1. सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैंए उन सबका आदिमूल परमेश्वर है।
2. ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करने योग्य है।
3. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना, पढ़ाना और सुनना, सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।
4. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।
5. सब काम धर्मानुसार, अर्थात सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।
6. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
7. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिए।
8. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए।
9. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिए, किंतु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।
10. सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी, नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने में स्वतंत्र रहें।
अब तक चुने गए 18 प्रधान
आर्य प्रतिनिधि सभा हरियाणा के अब तक 18 प्रधान चुने गए हैं। सर्वप्रथम 1975 में स्वामी रामेश्वरानंद को सभा का प्रधान चुना गया। जिसके बाद दलीप सिंह आर्य, फि र स्वामी रामेश्वरानंद, उनके बाद फि र दलीप सिंह आर्य दो बार प्रधान रहे। उनके बाद प्रो. शेर सिंह लगातार छह बार प्रधान चुने गए। अब तक सबसे लंबे समय तक शेर सिंह की प्रधान रहे हैं। उनके बाद स्वामी ओमानंद को लगातार तीन बार प्रधान चुना गया। उनके बाद आचार्य बलदेव को प्रधान चुना गया। उनके बाद आचार्य विजयपाल दो बार प्रधान चुने गए। वर्तमान में मास्टर रामपाल आर्य को प्रधान चुना हुआ है। जिनके कार्यकाल में ही मठ में स्वामी स्वतंत्रानंद के नाम से हाल का निर्माण किया गया है।