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फैक्टरी बंद है, मार्च की तनख्वाह तक नहीं मिली, फिर यहां रुक कर क्या करें, अच्छा है अपने घर चले जाएं
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Factory is closed, did not get paid till March, then what to do by stopping here, it is good to go to your house
- फोटो : RohtakCity
फैक्टरी बंद है। जहां 100 कर्मचारियों की जरूरत है, वहां 20 लोग ही बुलाए जा रहे हैं। यही नहीं मार्च में किए काम का भुगतान तक नहीं किया गया है। जेब में पैसा है न खाने को रोटी। ऐसे में यहां रुक कर क्या करें। यह दर्द है श्याम कालोनी में रहने वाले छोटू का। वह बिहार से यहां रोजी-रोटी के लिए आया था। अब ये दोनों ही उसे नसीब नहीं हो रही हैं। इसलिए वह वापस अपने घर जा रहा है। यह अकेला ऐसा नहीं है। इस सरीखे भूपेश, शशि, धनंजय, अविनाश समेत और भी हैं। ये शास्त्री कॉलोनी, सैनी कॉलोनी व आसपास के इलाके तहत रहे हैं। अमर उजाला ने इनसे बातचीत की तो इनता दर्द सामने आया।
बिहार के आरा जिले में रहने वाले इन फैक्टरी मजदूरों का कहना है कि वे यहां रोजी-रोटी के लिए आए थे। अब न रोजी है न रोटी। कोरोना के कारण काम ठप है। फैक्ट्री में जरूरत से काफी कम मजदूर ही रखे गए हैं। बाकी को काम का इंतजार है। काम नहीं मिलने से खाना-पीना भी मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि हम नौ महीने पहले यहां आए थे। अब हालात ठीक नहीं हैं। इसलिए घर जा रहे हैं। खाने के लिए घर से रुपये मंगवाने पड़ रहे हैं। उसी से थोड़ा काम चल रहा है। किराएदार किराया छोड़ने को तैयार नहीं है। बगैर आमदनी उसे किराया देना, घर का खर्च बड़ा मुश्किल हो गया है। इसलिए अपना नाम दे दिया है। पुलिस का कहना है कि नंबर आते ही सबको बुला लिया जाएगा। अब तो हालात ठीक होने के बाद ही वापस आने की सोचेंगे। गांव में ही एक-दो साल मजदूरी कर पेट पालेंगे।
भूख से बिलखती बच्ची को पिलाया पाउडर का दूध
इसरत जहां पति व दो बच्चों के साथ शनिवार को सिरसा से रोहतक पहुंची। यहां से ट्रेन के जरिये उन्हें बिहार भेजा गया। तीखी गर्मी में भूख से बिलखते नौ माह के बच्चे को कुछ और नहीं मिला तो पाउडर वाला दूध पानी में घोलकर पिलाया। इसके बाद बच्चा शांति से मां की गोद में सो गया। उसस बड़ी दो साल की बच्ची मां का हाथ पकड़े पेड़ की छांव में खड़ी रही। जब नंबर आया तो ट्रेन में जगह मिलने पर इस परिवार ने राहत की सांस ली। इधर, छोटेलाल हिसार रोड से रेलवे स्टेशन पहुंचा। यहां उसका पंजीकरण नहीं था। इसलिए स्टेशन पर अंदर जाने से रोक दिया। उसे घर जाना था। वह बुरी तरह बिलख पड़ा। तेज धूप और गर्मी में प्रशासन से ट्रेन में और जगह नहीं मिलने के कारण उसे रोके रखा। बाद में ट्रेन चलने से कुछ देर पहले प्रशासन ने उसे भी घर जाने की मंजूरी दे दी। वह हंसते हुए दौड़ कर ट्रेन में चढ़ गया।
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बिहार के आरा जिले में रहने वाले इन फैक्टरी मजदूरों का कहना है कि वे यहां रोजी-रोटी के लिए आए थे। अब न रोजी है न रोटी। कोरोना के कारण काम ठप है। फैक्ट्री में जरूरत से काफी कम मजदूर ही रखे गए हैं। बाकी को काम का इंतजार है। काम नहीं मिलने से खाना-पीना भी मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि हम नौ महीने पहले यहां आए थे। अब हालात ठीक नहीं हैं। इसलिए घर जा रहे हैं। खाने के लिए घर से रुपये मंगवाने पड़ रहे हैं। उसी से थोड़ा काम चल रहा है। किराएदार किराया छोड़ने को तैयार नहीं है। बगैर आमदनी उसे किराया देना, घर का खर्च बड़ा मुश्किल हो गया है। इसलिए अपना नाम दे दिया है। पुलिस का कहना है कि नंबर आते ही सबको बुला लिया जाएगा। अब तो हालात ठीक होने के बाद ही वापस आने की सोचेंगे। गांव में ही एक-दो साल मजदूरी कर पेट पालेंगे।
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भूख से बिलखती बच्ची को पिलाया पाउडर का दूध
इसरत जहां पति व दो बच्चों के साथ शनिवार को सिरसा से रोहतक पहुंची। यहां से ट्रेन के जरिये उन्हें बिहार भेजा गया। तीखी गर्मी में भूख से बिलखते नौ माह के बच्चे को कुछ और नहीं मिला तो पाउडर वाला दूध पानी में घोलकर पिलाया। इसके बाद बच्चा शांति से मां की गोद में सो गया। उसस बड़ी दो साल की बच्ची मां का हाथ पकड़े पेड़ की छांव में खड़ी रही। जब नंबर आया तो ट्रेन में जगह मिलने पर इस परिवार ने राहत की सांस ली। इधर, छोटेलाल हिसार रोड से रेलवे स्टेशन पहुंचा। यहां उसका पंजीकरण नहीं था। इसलिए स्टेशन पर अंदर जाने से रोक दिया। उसे घर जाना था। वह बुरी तरह बिलख पड़ा। तेज धूप और गर्मी में प्रशासन से ट्रेन में और जगह नहीं मिलने के कारण उसे रोके रखा। बाद में ट्रेन चलने से कुछ देर पहले प्रशासन ने उसे भी घर जाने की मंजूरी दे दी। वह हंसते हुए दौड़ कर ट्रेन में चढ़ गया।
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