तीन दशक का इंतजार खत्म: 32 साल बाद प्लॉट मालिक बने कश्मीरी पंडित, 188 प्लॉटों का निकाला गया ड्रॉ, खिले चेहरे
हरियाणा के रोहतक में एचएसवीपी कार्यालय में बहादुरगढ़ के 188 प्लॉटों का ड्रॉ निकाला गया। करीब तीन पहले कश्मीरी पंडितों ने घर बसाने के लिए अपने पैसों से जमीन खरीदी थी।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अपनी ही जमीन मिलने का पिछले तीन दशक से इंतजार कर रहे कश्मीरी पंडितों के चेहरे बुधवार दोपहर को खिल उठे। एचएसवीपी (हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण) कार्यालय में अधिकारियों ने 188 प्लॉटों के ड्रॉ निकाले तो 32 साल बाद प्लॉट मालिक बने कश्मीरी पंडितों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इसके लिए सुबह से दोपहर तक उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ा। यही नहीं, एचएसवीपी ने उनकी जोरदार आवभगत की। उन्हें चाय नाश्ता ही नहीं, दोपहर का भोजन भी कराया गया।
बुधवार को एचएसवीपी के सेक्टर दो कार्यालय परिसर में कश्मीरी पंडितों के प्लॉटों का ड्रॉ निकाला गया। इसके लिए कार्यालय परिसर में ड्रॉ की व्यवस्था की गई। सुबह करीब 10 बजे शुरू होने वाला ड्रॉ कार्यक्रम दोपहर करीब ढाई बजे शुरू हुआ। इसकी वजह बुधवार सुबह 22 प्लॉटों की सूची और मिलना बताई गई है। इसका ब्योरा तैयार करने में समय लगा।
दोपहर को शुरू हुई ड्रॉ प्रक्रिया में पहले चार मरला प्लॉटों की सूची जारी की गई। इस ड्रॉ में तीन नाम शामिल रहे। पहला ड्रॉ नैंसीधर का निकला। इसके बाद महाराज कृष्ण कान्हा व तीसरा ड्रॉ नीलम का निकला। इसके बाद छह मरले व अन्य प्लॉटों के ड्रॉ निकाले गए। ड्रॉ की पर्ची वहां मौजूद कश्मीरी पंडितों में से ही लोगों ने चुनी। शाम तक यह प्रक्रिया जारी रही।
बता दें कि उमा नगरी कश्मीरी पंडित वेलफेयर एसोसिएशन ने 32 साल पहले बहादुरगढ़ में दो एकड़ जमीन खरीदी थी। इसमें किसी 50, किसी से 100 तो किसी ने 150 गज जमीन के लिए रुपये जुटाए थे। ज्यादातर लोगों ने वहां बसने व घर बनाकर परिवार को सुरक्षा देने के उद्देश्य से जमीन खरीदी थी। जबकि कुछ ने निवेश किया। इस जमीन की चहारदीवारी करा कर हवन भी किया था। यह एक तरह का भूमि पूजन था। यह वर्ष 1996-97 की बात है। इसके बाद एचएसवीपी ने जमीन एक्वायर कर ली।
निष्पक्षता व पारदर्शिता पर रहा जोर
ड्रॉ प्रक्रिया को निष्पक्ष व पारदर्शी बनाने के लिए वहां एचएसवीपी के अधिकारियों ने लोगों के सामने की पर्ची निकलवाई। कम उम्मीदवारों के लिए बड़े डिब्बे व अधिक के लिए स्टील का बड़ा ढोल रखा गया था। इसे लोगों ने ही घुमाया और अपने हाथ से मकान मालिक व प्लॉट नंबर की पर्ची निकाली।
चाय, नाश्ता व खाने की रही व्यवस्था
एचएसवीपी कार्यालय परिसर में ड्रॉ के लिए पहुंचे कश्मीरी पंडितों के लिए खाने-पीने की व्यवस्था भी रही। सुबह कार्यालय पहुंचे लोगों को चाय, नाश्ता व स्नैक्स दिए गए। दोपहर को भोजन कराया गया। इसके लिए टेंट के साथ ही हलवाई बुलाया गया।
ड्रॉ के लिए घंटों करना पड़ा इंतजार
ड्रॉ में शामिल होने के लिए बुधवार को बहादुरगढ़, जम्मू, कश्मीर, दिल्ली व अन्य जगहों से कश्मीरी पंडित एचएसवीपी कार्यालय पहुंचे। यहां सुबह नौ बजे ही लोगों की भीड़ जमा होना शुरू हो गई। सुबह दस बजे तक टेंट में काफी लोग पहुंच चुके थे। इसके बावजूद ड्रॉ प्रक्रिया शुरू नहीं हुई। इस कारण उन्हें घंटों इंतजार करना पड़ा।
कश्मीरी पंडितों ने बहादुरगढ़ में जमीन खरीदी थी। इसे बाद में हुडा ने विकसित करने के लिए एक्वायर कर लिया था। यह जमीन उनके मालिकों को देने की प्रक्रिया में कुछ तकनीकी गड़बड़ियां रहीं। इनका निवारण करने में काफी समय लग गया। बुधवार को इनकी जमीन का ड्रॉ निकाला गया। अब कोई दिक्कत नहीं है। शेष कागजी कार्रवाई व प्रक्रिया भी जल्द पूरी कर दी जाएगी। - श्वेता सुहाग, संपदा अधिकारी, एचएसवीपी
द कश्मीर फाइल्स फिल्म में सिर्फ एक प्रतिशत दर्शाया, इससे कई गुणा ज्यादा भयावह थी हकीकत
हैवानियत की वह तस्वीर बहुत भयावह थी। उसे सोचकर अब भी सिहर उठते हैं। लोगों को जिंदा जला डाला, अंग काट डाले, शरीर में कीलें ठोक दी गईं। आईबी अधिकारी एलएल बान की हत्या कर दी गई। उनकी पत्नी फूला बान को भी अब तक प्लॉट नहीं मिला है। द कश्मीर फाइल्स में आईबी अधिकारी की मौत की बात कही गई है। यह एक बानगी है।
फिल्म में दर्शाई सच्चाई महज एक प्रतिशत है, जबकि हकीकत इससे कई गुणा ज्यादा भयावह थी। यह कहना है कश्मीरी पंडितों का। अमर उजाला ने बुधवार को जमीन के ड्रॉ कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे कश्मीर के पंडितों से बातचीत की तो यह सच सामने आया।
यह बोले....
हमने 30 साल पहले बहादुरगढ़ में प्लॉट खरीदे थे। पिछले 30 साल से इंतजार कर रहे थे। इनमें कुछ पर तो अतिक्रमण भी हो गया था। लंबे इंतजार के बाद अब हमें जीत के रूप में खुशी मिल रही है। इसका श्रेय सरकार व प्रशासन को जाता है। प्रशासन ने ऐसी व्यवस्था बनाई है, जिसमें घंटों का काम मिनटों में और मिनटों का काम सेकेंड में हो रहा है। यही वजह है कि तीन दशक बाद हमें राहत मिल रही है। यह हमारे में बहुत बढ़ी खुशी है। - लोकेश काजी, बहादुरगढ़
कश्मीर में हमारे साथ जो हुआ, वह दिल दहला देने वाला था। वहां लोगों को सरेआम काट डाला गया। शरीर में कीलें ठोक दी गईं। द कश्मीर फाइल्स फिल्म में महज एक व्यक्ति की कहानी दिखाई गई है। ऐसे अनगिनत लोग थे। उस सच्चाई को कोई देख ले तो उसका कलेजा फट जाए। अपना सब कुछ छोड़ कर नंगे पैर यहां आए। पास में जो रुपये बचे थे। उससे परिवार को घर व सुरक्षा देने के लिए जमीन खरीदी थी। इसे भी उस समय हुडा ने ले लिया था। - एनजे रैना, जम्मू
हम पर 1990 में अत्याचार शुरू हुआ था। हमें हमारे घरों से भगा दिया। हमें टेंट में रहना पड़ा। किसी तरह हरियाणा आए। उस समय मेरी उम्र 30 वर्ष थी। अब 63 वर्ष का हो गया हूं। जनस्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त हूं। अब प्लॉट मिल रहा है। इसके लिए कई तो गुजर गए। हमें भी काफी धक्के खाने पड़े। एचएसवीपी के चक्कर लगा-लगाकर जूते घिस गए। जमीन अधिग्रहीत करने के बाद से हम अपने प्लॉटों के लिए धक्के खा रहे थे। अब राहत मिली है। - विजय वैष्णवी, जम्मू
बहादुरगढ़ में पिता कुलदीप कुमार भट ने प्लॉट लिया था। इसका विकास शुल्क समेत सेटलमंट डीडी के 60-60 हजार रुपये देने के बाद भी हमारी ओर ही विकास शुल्क की दो किस्तें बकाया हैं। जमीन हमारी पैसे हमारे, फिर भी कब्जे को तरसते रहे। कश्मीर में हुई घटना अपने बुजुर्गों से वीकेंड पर कहानी के रूप में सुनी थी। द कश्मीर फाइल्स फिल्म आई तो पर्दे पर भयावहता नजर आई। हालांकि यह हकीकत से काफी कम है, मगर सच से रूबरू कराने का प्रयास है। - सुशैन भट, नोएडा