{"_id":"5738e1914f1c1b0f19ac7878","slug":"rohtak-jaat-andolan-case-jat-riots-reservation-jan-ayog-arrest-police-haryana-rohtak","type":"story","status":"publish","title_hn":"जन आयोग की रिपोर्ट में हिंसा के लिए अफसर ही नहीं सरकार भी जिम्मेदार","category":{"title":"Crime","title_hn":"क्राइम ","slug":"crime"}}
जन आयोग की रिपोर्ट में हिंसा के लिए अफसर ही नहीं सरकार भी जिम्मेदार
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
Updated Mon, 16 May 2016 02:23 AM IST
विज्ञापन
जन आयोग के सुनवाई कार्यक्रम के दौरान संबोधित करते वक्ता।
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुए दंगों के लिए केवल अधिकारियों को दोषी ठहराना जायज नहीं है। दंगे निचले स्तर के अधिकारियों की लापरवाही या नाकामी का नतीजा नहीं हैं। इसमें नेतृत्व की कमजोरी साफ दिख रही है। सरकार हिंसा रोकने में पूरी तरह विफल रही और दंगाइयों को छूट दी गई। यहीं कारण रहा कि दंगाई शहर में घुसे और दंगा किया। सरकार का जनता से माफी मांगनी चाहिए। प्रदेश में हुई हिंसा के लिए सद्भावना मंच की तरफ से गठित जन आयोग के अध्यक्ष व पूर्व पुलिस महानिदेशक वी. एन. राय ने यह बात कही।
7 जिलों का मौका मुआयना करने के बाद रविवार को जन आयोग ने विकास भवन में अपनी 76 पेज की रिपोर्ट जनता के सामने पेश की। राय ने कहा कि फरवरी में रोहतक से हिंसा की शुरुआत हुई। इसका सबसे ज्यादा असर रोहतक, झज्जर, हिसार, सोनीपत, जींद, पानीपत और कैथल में हुआ। आयोग में पूर्व पुलिस महानिदेशक के अलावा राम मोहन राय एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट को संयोजक, एमडीयू के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. राजेंद्र चौधरी, पूर्व मंडलायुक्त गुड़गांव टीके शर्मा, लेखक व पूर्व प्राचार्या शुभा, पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. मेहर सिंह ओर राजीव गोदारा एडवोकेट पंजाब एंड हरियाणा शामिल रहे। आयोग ने रोहतक में दो दिन व अन्य जिलों में एक-एक दिन दौरा किया और पीड़ितों का दर्द सुना। इसमें सामने आया कि हिंसा के पीछे सरकार की नाकामी रही है। आयोग ने प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल अधिकारियों को हिंसा का दोषी ठहराना जायज नहीं है। इसके लिए सरकार भी दोषी है।
सरकार और पुलिस-प्रशासन के खिलाफ था गुस्सा
पूर्व पुलिस महानिदेशक ने बताया कि हमने कई जिलों में कई लोगों से बात की। आंदोलन करने वालों के पक्ष के लोगों का कहना था कि हम शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे थे। हिंसा से हमारा कोई मतलब नहीं है। जबकि दूसरा पक्ष इस हिंसा के लिए जाट आंदोलन को जिम्मेदार ठहरा रहा है। सरकार और पुलिस-प्रशासन के प्रति भी लोगों में आक्रोश था। आम जनता का साफ कहना था कि सरकार और पुलिस-प्रशासन ने उन्हें उपद्रवियों के हवाले छोड़ दिया।
विज्ञापन
पुलिस को पीछे कर क्यों बुलाई गई सेना
उन्होंने रिपोर्ट में यह भी जिक्र किया कि हिंसा के समय ऐसी क्या जरूरत पड़ गई थी कि पुलिस को सामने न लाकर सेना को बुला लिया गया है। जबकि सेना को तो आम जनता से निपटने की कोई ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती। सेना देश की रक्षा के लिए है। ऐसे अगर हर मामले में सेना को बुलाया जाएगा तो फिर पुलिस का क्या फायदा।
सांसद सैनी और जाट नेता भी जिम्मेदार
हिंसा के लिए सांसद राजकुमार सैनी, जाट नेता हवा सिंह सांगवान और यशपाल मलिक भी जिम्मेदार हैं। सांसद सैनी ने जहां लोगों को गलत बयानबाजी कर उकसाया। वहीं, कुछ नेताओं ने जाटों को मोहरा बनाकर आपसी गुटबाजी में लड़ाते रहे। यहीं कारण रहा कि जाट आरक्षण के लिए हामी भरने के बाद भी जाट नेताओं ने इस आंदोलन को वापस लेने के लिए कोई अपील नहीं की।
मुरथल कांड पर कुछ ऐसी है जन आयोग की रिपोर्ट
रिपोर्ट के अनुसार, मुरथल कांड को लेकर भी अलग-अलग बातें सुनने को मिल रही हैं। वहां पर स्थित एक ढाबा मालिक के बेटे ने बताया कि महिलाएं गाड़ी स्टार्ट छोड़कर ढाबे के पीछे छिपी थीं, लेकिन दुष्कर्म की बात से ढाबा मालिक के बेटे ने मना कर दिया। जिस समय जन आयोग की टीम ढाबा मालिक के बेटे से बातचीत कर रही थी उसी समय वहां पर मौजूद कुछ लोग, जो ग्राहक नहीं थे और सीआईडी वाले प्रतीत हो रहे थे, उन्होंने युवक को अपने पास बुलाया। ऐसे में मामले में पुलिस-प्रशासनिक दबाव से भी मना नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर गांव के कुछ लोगों ने पेड़ों की झुरमुट में ही महिलाओं को खींच ले जाने और अंतर्वस्त्र मिलने की बात कही। तीन अप्रैल को रोहतक में हुई सुनवाई में जनवादी महिला समिति की प्रतिनिधि ने बताया कि पहले जब उनकी टीम छानबीन करने पहुंची तो गांव की बुजुर्ग महिला ने बताया था कि सुबह-सुबह वहां एक महिला को निर्वस्त्र जाते देखा। गांव वालों ने उसे शाल ओढ़ा दिया। आगे बात जारी रखने पर महिला के बेटे ने उसे चुप कर दिया। मुरथल कांड की निष्पक्ष जांच के लिए प्रयासरत संगठन की नेत्री ने भी टीम को जानकारी दी कि उसे भी फोन पर धमकियां मिल रही हैं। कुछ लोग बयान देते हैं कि हमने ट्रकों को हाथ नहीं लगाया। महिलाओं से कैसे बदसलूकी की जा सकती है। 40 से अधिक गाड़ियां जलाई गई, इनमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी थीं। वे महिलाएं कहां गईं। ऐसे हालातों में किसी भी घटना से इंकार नहीं किया जा सकता।
इन बिंदुओं पर आयोग ने किया होमवर्क
- जाट आरक्षण आंदोलन व हिंसा की पृष्टभूमि
- आंदोलन व हिंसा में शासन व प्रशासन की भूमिका
- अन्य व्यक्तियों, संगठनों व समूहों की भूमिका
- हिंसा का स्वरूप व इसकी जिम्मेदारी
- न्याय, सद्भावना, सुरक्षा व शांति के उपायों की समीक्षा
- ऐसी घटनाओं की दोबारा होने से रोकने और शांति बनाए रखने के लिए सुझाव
यह है जन आयोग की सिफारिश व सुझाव
- नए सिरे से नीतिगत कवायद
- लोकतांत्रिक पुलिस और सक्षम नेतृत्व
- सत्ता निरपेक्ष पुलिस
- संवेदी पुलिस सशक्त समाज पाठ्यक्रम
- नागरिक ट्रिब्यूनल
- द्घैध शासन पद्घति
- जातीय पहचान
- स्त्री आरक्षण
- जनता से माफी मांगे सरकार
- क्षतिपूर्ण में असफल
- संवैधानिक सद्भावना के लिए विवेकाशील मंच
- मृतक-घायल परिवारों को क्षतिपूर्ति
- सेना का अंधाधुंध इस्तेमाल
- आरक्षण की संवैधानिक प्रणाली
- सिवाह मॉडल का अध्ययन
- कृषि-रोजगार संकट।
विज्ञापन
7 जिलों का मौका मुआयना करने के बाद रविवार को जन आयोग ने विकास भवन में अपनी 76 पेज की रिपोर्ट जनता के सामने पेश की। राय ने कहा कि फरवरी में रोहतक से हिंसा की शुरुआत हुई। इसका सबसे ज्यादा असर रोहतक, झज्जर, हिसार, सोनीपत, जींद, पानीपत और कैथल में हुआ। आयोग में पूर्व पुलिस महानिदेशक के अलावा राम मोहन राय एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट को संयोजक, एमडीयू के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. राजेंद्र चौधरी, पूर्व मंडलायुक्त गुड़गांव टीके शर्मा, लेखक व पूर्व प्राचार्या शुभा, पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. मेहर सिंह ओर राजीव गोदारा एडवोकेट पंजाब एंड हरियाणा शामिल रहे। आयोग ने रोहतक में दो दिन व अन्य जिलों में एक-एक दिन दौरा किया और पीड़ितों का दर्द सुना। इसमें सामने आया कि हिंसा के पीछे सरकार की नाकामी रही है। आयोग ने प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल अधिकारियों को हिंसा का दोषी ठहराना जायज नहीं है। इसके लिए सरकार भी दोषी है।
विज्ञापन
सरकार और पुलिस-प्रशासन के खिलाफ था गुस्सा
पूर्व पुलिस महानिदेशक ने बताया कि हमने कई जिलों में कई लोगों से बात की। आंदोलन करने वालों के पक्ष के लोगों का कहना था कि हम शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे थे। हिंसा से हमारा कोई मतलब नहीं है। जबकि दूसरा पक्ष इस हिंसा के लिए जाट आंदोलन को जिम्मेदार ठहरा रहा है। सरकार और पुलिस-प्रशासन के प्रति भी लोगों में आक्रोश था। आम जनता का साफ कहना था कि सरकार और पुलिस-प्रशासन ने उन्हें उपद्रवियों के हवाले छोड़ दिया।
विज्ञापन
पुलिस को पीछे कर क्यों बुलाई गई सेना
उन्होंने रिपोर्ट में यह भी जिक्र किया कि हिंसा के समय ऐसी क्या जरूरत पड़ गई थी कि पुलिस को सामने न लाकर सेना को बुला लिया गया है। जबकि सेना को तो आम जनता से निपटने की कोई ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती। सेना देश की रक्षा के लिए है। ऐसे अगर हर मामले में सेना को बुलाया जाएगा तो फिर पुलिस का क्या फायदा।
सांसद सैनी और जाट नेता भी जिम्मेदार
हिंसा के लिए सांसद राजकुमार सैनी, जाट नेता हवा सिंह सांगवान और यशपाल मलिक भी जिम्मेदार हैं। सांसद सैनी ने जहां लोगों को गलत बयानबाजी कर उकसाया। वहीं, कुछ नेताओं ने जाटों को मोहरा बनाकर आपसी गुटबाजी में लड़ाते रहे। यहीं कारण रहा कि जाट आरक्षण के लिए हामी भरने के बाद भी जाट नेताओं ने इस आंदोलन को वापस लेने के लिए कोई अपील नहीं की।
मुरथल कांड पर कुछ ऐसी है जन आयोग की रिपोर्ट
रिपोर्ट के अनुसार, मुरथल कांड को लेकर भी अलग-अलग बातें सुनने को मिल रही हैं। वहां पर स्थित एक ढाबा मालिक के बेटे ने बताया कि महिलाएं गाड़ी स्टार्ट छोड़कर ढाबे के पीछे छिपी थीं, लेकिन दुष्कर्म की बात से ढाबा मालिक के बेटे ने मना कर दिया। जिस समय जन आयोग की टीम ढाबा मालिक के बेटे से बातचीत कर रही थी उसी समय वहां पर मौजूद कुछ लोग, जो ग्राहक नहीं थे और सीआईडी वाले प्रतीत हो रहे थे, उन्होंने युवक को अपने पास बुलाया। ऐसे में मामले में पुलिस-प्रशासनिक दबाव से भी मना नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर गांव के कुछ लोगों ने पेड़ों की झुरमुट में ही महिलाओं को खींच ले जाने और अंतर्वस्त्र मिलने की बात कही। तीन अप्रैल को रोहतक में हुई सुनवाई में जनवादी महिला समिति की प्रतिनिधि ने बताया कि पहले जब उनकी टीम छानबीन करने पहुंची तो गांव की बुजुर्ग महिला ने बताया था कि सुबह-सुबह वहां एक महिला को निर्वस्त्र जाते देखा। गांव वालों ने उसे शाल ओढ़ा दिया। आगे बात जारी रखने पर महिला के बेटे ने उसे चुप कर दिया। मुरथल कांड की निष्पक्ष जांच के लिए प्रयासरत संगठन की नेत्री ने भी टीम को जानकारी दी कि उसे भी फोन पर धमकियां मिल रही हैं। कुछ लोग बयान देते हैं कि हमने ट्रकों को हाथ नहीं लगाया। महिलाओं से कैसे बदसलूकी की जा सकती है। 40 से अधिक गाड़ियां जलाई गई, इनमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी थीं। वे महिलाएं कहां गईं। ऐसे हालातों में किसी भी घटना से इंकार नहीं किया जा सकता।
इन बिंदुओं पर आयोग ने किया होमवर्क
- जाट आरक्षण आंदोलन व हिंसा की पृष्टभूमि
- आंदोलन व हिंसा में शासन व प्रशासन की भूमिका
- अन्य व्यक्तियों, संगठनों व समूहों की भूमिका
- हिंसा का स्वरूप व इसकी जिम्मेदारी
- न्याय, सद्भावना, सुरक्षा व शांति के उपायों की समीक्षा
- ऐसी घटनाओं की दोबारा होने से रोकने और शांति बनाए रखने के लिए सुझाव
यह है जन आयोग की सिफारिश व सुझाव
- नए सिरे से नीतिगत कवायद
- लोकतांत्रिक पुलिस और सक्षम नेतृत्व
- सत्ता निरपेक्ष पुलिस
- संवेदी पुलिस सशक्त समाज पाठ्यक्रम
- नागरिक ट्रिब्यूनल
- द्घैध शासन पद्घति
- जातीय पहचान
- स्त्री आरक्षण
- जनता से माफी मांगे सरकार
- क्षतिपूर्ण में असफल
- संवैधानिक सद्भावना के लिए विवेकाशील मंच
- मृतक-घायल परिवारों को क्षतिपूर्ति
- सेना का अंधाधुंध इस्तेमाल
- आरक्षण की संवैधानिक प्रणाली
- सिवाह मॉडल का अध्ययन
- कृषि-रोजगार संकट।