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जन स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही बिगाड़ रही शहर का स्वास्थ्य
Updated Tue, 15 May 2018 03:00 AM IST
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ड्रेन नंबर आठ जहर की खेती
जन स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही बिगाड़ रही शहर का स्वास्थ्य
सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से ड्रेन आठ में छोड़ा जा रहा काला जहर
फोटो सहित
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक।
जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग की लापरवाही शहर वासियों का स्वास्थ्य बिगाड़ रही है। क्योंकि भिवानी रोड के समीप विभाग का सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट कई सालों से ड्रेन आठ में काला जहर छोड़ रहा है। यह जहर ड्रेन के सहारे खेतों में और आमजन की खाने की थाली तक पहुंच रहा है। यही नहीं, इस जहर का असर यहां आसपास की कृषि भूमि में भी देखा जा सकता है। इसके बावजूद इस भयानक समस्या पर पब्लिक हेल्थ, सिंचाई विभाग, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन सभी आंखें मूंदे बैठे हैं।
विभाग ने सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, ताकि गंदे पानी को साफ कर उसे खेती के काम में लिया जा सके। इसके अलावा एकत्रित होने वाले गंद को खाद के रूप में प्रयोग किया जा सके। विभाग ने एक निजी कंपनी को प्लांट का टेंडर दिया हुआ है। प्लांट पर तकरीबन 15 से 16 कर्मचारी दिन-रात कार्यरत हैं। यहां शहर के गंदे पानी को पैनल, रिएक्टर में साफ करने के बाद बीयर और एफआरपी गटर बीयर के सहारे पाइप के माध्यम से तालाब में डाला जाता है। इसके लिए विभाग के पास साढ़े सात फुट गहरे पांच बड़े तालाब हैं। नियमानुसार इनका सैंपल जांच के लिए दिल्ली व चंडीगढ़ प्रयोगशाला में भेजा जाता है। प्रयोगशाला में पास होने के बाद ही पानी को ड्रेन में छोड़ा जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि यहां काम करने से बचने के लिए बगैर साफ किए ही पानी को ड्रेन में छोड़ दिया जाता है। जबकि तालाब में दिखाई देने में साफ पानी स्टॉक में रहता है। सूत्रों की मानें तो विभाग दिखाने के लिए तालाब में साफ पानी रखता है, जबकि ड्रेन में छोड़ता गंदा पानी ही है।
कहीं किसानों से सांठगांठ तो नहीं
सीवरेज का पानी साफ करने के लिए यहां प्लांट भी है और कर्मचारी भी। इसके बावजूद यहां गंदा पानी ड्रेन में छोड़ा जाना सवालों में है। ऐसे में सवाल उठता है कि प्लांट और किसानों के बीच कोई सांठगांठ तो नहीं है। क्योंकि ड्रेन आठ के आसपास खेती करने वाले अधिकांश किसान स्वयं चाहते हैं कि उन्हें गंदा पानी ही मिले। यहां खेती करने वाले एक किसान मोनू ने बताया कि जमीन से मीठा पानी लेने के लिए उन्हें अधिक गहराई तक बोरिंग करानी पड़ती है। मीठे पानी की सिंचाई से फसल भी देरी से पैदा होती है। यदि वह खेत में सीवर वाला पानी प्रयोग करते हैं तो फसल सामान्य फसल की अपेक्षा 40 फीसदी जल्दी तैयार हो जाती है।
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एसटीपी और किसान के बीच है सिंचाई विभाग
एसटीपी और किसान के बीच सिंचाई विभाग है। एसटीपी काम नहीं करना चाहता और किसान सीधा सीवर का पानी लेना चाहता है। बीच में सिंचाई विभाग की ड्रेन इसमें माध्यम बनी हुई है। सिंचाई विभाग के अधिकारियों का इस मामले में अनदेखी करना समझ से परे है। क्योंकि ड्रेन आठ में जितनी गंदगी जमा है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बरसात के पूर्व ड्रेन की सफाई कितनी हुई है। या तो विभाग कागजों में ही ड्रेन की सफाई कराता चला आ रहा है या वह भी सभी से मिला हुआ है।
बोले अधिकारी
ड्रेन में एसटीपी का बगैर फिल्टर का पानी छोड़ना गलत है। इस संबंध में संबंधित अधिकारी से पूछा जाएगा। इसके लिए पब्लिक हेल्थ विभाग के अधिकारियों से भी बात करेंगे।
- संजीव राठी, अधीक्षण अभियंता, सिंचाई विभाग
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जन स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही बिगाड़ रही शहर का स्वास्थ्य
सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से ड्रेन आठ में छोड़ा जा रहा काला जहर
फोटो सहित
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक।
जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग की लापरवाही शहर वासियों का स्वास्थ्य बिगाड़ रही है। क्योंकि भिवानी रोड के समीप विभाग का सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट कई सालों से ड्रेन आठ में काला जहर छोड़ रहा है। यह जहर ड्रेन के सहारे खेतों में और आमजन की खाने की थाली तक पहुंच रहा है। यही नहीं, इस जहर का असर यहां आसपास की कृषि भूमि में भी देखा जा सकता है। इसके बावजूद इस भयानक समस्या पर पब्लिक हेल्थ, सिंचाई विभाग, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन सभी आंखें मूंदे बैठे हैं।
विभाग ने सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, ताकि गंदे पानी को साफ कर उसे खेती के काम में लिया जा सके। इसके अलावा एकत्रित होने वाले गंद को खाद के रूप में प्रयोग किया जा सके। विभाग ने एक निजी कंपनी को प्लांट का टेंडर दिया हुआ है। प्लांट पर तकरीबन 15 से 16 कर्मचारी दिन-रात कार्यरत हैं। यहां शहर के गंदे पानी को पैनल, रिएक्टर में साफ करने के बाद बीयर और एफआरपी गटर बीयर के सहारे पाइप के माध्यम से तालाब में डाला जाता है। इसके लिए विभाग के पास साढ़े सात फुट गहरे पांच बड़े तालाब हैं। नियमानुसार इनका सैंपल जांच के लिए दिल्ली व चंडीगढ़ प्रयोगशाला में भेजा जाता है। प्रयोगशाला में पास होने के बाद ही पानी को ड्रेन में छोड़ा जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि यहां काम करने से बचने के लिए बगैर साफ किए ही पानी को ड्रेन में छोड़ दिया जाता है। जबकि तालाब में दिखाई देने में साफ पानी स्टॉक में रहता है। सूत्रों की मानें तो विभाग दिखाने के लिए तालाब में साफ पानी रखता है, जबकि ड्रेन में छोड़ता गंदा पानी ही है।
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कहीं किसानों से सांठगांठ तो नहीं
सीवरेज का पानी साफ करने के लिए यहां प्लांट भी है और कर्मचारी भी। इसके बावजूद यहां गंदा पानी ड्रेन में छोड़ा जाना सवालों में है। ऐसे में सवाल उठता है कि प्लांट और किसानों के बीच कोई सांठगांठ तो नहीं है। क्योंकि ड्रेन आठ के आसपास खेती करने वाले अधिकांश किसान स्वयं चाहते हैं कि उन्हें गंदा पानी ही मिले। यहां खेती करने वाले एक किसान मोनू ने बताया कि जमीन से मीठा पानी लेने के लिए उन्हें अधिक गहराई तक बोरिंग करानी पड़ती है। मीठे पानी की सिंचाई से फसल भी देरी से पैदा होती है। यदि वह खेत में सीवर वाला पानी प्रयोग करते हैं तो फसल सामान्य फसल की अपेक्षा 40 फीसदी जल्दी तैयार हो जाती है।
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एसटीपी और किसान के बीच है सिंचाई विभाग
एसटीपी और किसान के बीच सिंचाई विभाग है। एसटीपी काम नहीं करना चाहता और किसान सीधा सीवर का पानी लेना चाहता है। बीच में सिंचाई विभाग की ड्रेन इसमें माध्यम बनी हुई है। सिंचाई विभाग के अधिकारियों का इस मामले में अनदेखी करना समझ से परे है। क्योंकि ड्रेन आठ में जितनी गंदगी जमा है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बरसात के पूर्व ड्रेन की सफाई कितनी हुई है। या तो विभाग कागजों में ही ड्रेन की सफाई कराता चला आ रहा है या वह भी सभी से मिला हुआ है।
बोले अधिकारी
ड्रेन में एसटीपी का बगैर फिल्टर का पानी छोड़ना गलत है। इस संबंध में संबंधित अधिकारी से पूछा जाएगा। इसके लिए पब्लिक हेल्थ विभाग के अधिकारियों से भी बात करेंगे।
- संजीव राठी, अधीक्षण अभियंता, सिंचाई विभाग