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Rewari News: कोर्ट ने दो साल की सजा पाए युवक को बरी कर कहा-ट्रायल कोर्ट ने गलती की

Fri, 28 Nov 2025 12:09 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Fri, 28 Nov 2025 12:09 AM IST
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The court acquitted the man who was sentenced to two years in prison and said the trial court erred.
जिला न्यायालय रेवाड़ी। संवाद
रेवाड़ी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जतिन गर्ग की अदालत ने हथियार बरामदगी मामले में 2 साल पहले दोषी ठहराए गए गुड़ियानी निवासी चेतन को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि कई जरूरी अंतर हैं, साथ ही दूसरी कमियां भी हैं जो प्रॉसिक्यूशन के बयान पर संदेह पैदा करती हैं। ट्रायल कोर्ट ने कमियों पर बात न करके गलती की है।
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आगे कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि गलत तरीके से बरी होना अच्छा नहीं है और इससे लोगों का न्याय व्यवस्था से भरोसा डगमगाता है लेकिन इससे भी बुरा है किसी बेगुनाह आदमी को गलत तरीके से दोषी ठहराना। किसी बेगुनाह आदमी को दोषी ठहराने के नतीजे कहीं ज्यादा गंभीर होते हैं और इसकी मार सभ्य समाज में महसूस की ही जा सकती है।
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इसलिए यह कोर्ट की ड्यूटी है कि वह किसी को भी गलत तरीके से दोषी ठहराए जाने से बचाए। यह कानून का तय सिद्धांत है कि जब भी किसी मामले में दिए गए सबूतों पर दो राय हो सकती हैं, एक जो आरोपी की सजा और दूसरी उसकी बेगुनाही की ओर इशारा करती है तो जो राय आरोपी के पक्ष में हो, उसे अपनाया जाना चाहिए।
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आगे कहा कि दोषी के खिलाफ अपने केस को बिना किसी संदेह के साबित करने में नाकाम रहा है और ट्रायल कोर्ट ने कमियों पर बात न करके गलती की है। इन हालात में इस कोर्ट के पास आरोपियों को बरी करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है।
इसलिए, अपील करने वाले-दोषी को संदेह का लाभ देते हुए, उसे उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों से बरी किया जाता है। ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया दोषसिद्धि का फैसला और सजा का आदेश टिकने लायक नहीं है और इसलिए इसे रद्द किया जाता है और अपील स्वीकार की गई।
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2021 के फैसले के खिलाफ की थी अपील

2021 में कोसली की एसडीजेएम अदालत ने चेतन को आर्म्स एक्ट की धारा 25 के तहत दो वर्ष की सजा और पांच हजार रुपये जुर्माना सुनाया था। इसी के खिलाफ आरोपी ने सत्र अदालत में अपील दायर की थी। मामला 28 दिसंबर 2018 का है, जब पुलिस ने चेतन को एक देसी कट्टे और एक जिंदा कारतूस के साथ पकड़े जाने का दावा किया था। जांच पूरी होने के बाद उसे अदालत में पेश किया गया लेकिन अपील पर सुनवाई करते हुए सत्र अदालत ने पाया कि पुलिस की कार्रवाई कानूनी मानकों पर खरी नहीं उतरती।

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सबसे बड़ी खामी- शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी एक ही
अदालत ने कहा कि इस मामले की सबसे बड़ी खामी यह रही कि शिकायतकर्ता और पहले जांच अधिकारी एक ही व्यक्ति हेड कॉन्स्टेबल संदीप थे, जो कानून की नजर में उचित नहीं है। जब शिकायतकर्ता ही जांच करेगा तो निष्पक्षता संदिग्ध रहती है। बाद में बेशक जांच किसी अन्य पुलिसकर्मी को सौंप दी गई। यही नहीं, घटना स्थल व्यस्त सड़क थी जहां लोगों की आवाजाही रहती है लेकिन पुलिस ने किसी भी स्वतंत्र गवाह को शामिल नहीं किया। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में पूरी बरामदगी संदेह के घेरे में आ जाती है।
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