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Rewari News: स्क्रीन ने छीना मैदान से बचपन
Wed, 08 Jul 2026 11:38 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Wed, 08 Jul 2026 11:38 PM IST
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मोबाइल में वीडियो गेम खेलता बच्चा। संवाद
रेवाड़ी। मोबाइल गेमिंग के दौर में पारंपरिक खेल लुप्त होते जा रहे हैं। कभी गांव की गलियों में बच्चे गुल्ली-डंडा, कंचा, दौड़, पिट्ठू, लंगड़ी टांग, खो-खो और कबड्डी आदि खेलते थे और इनका शोरगुल सुनाई देता था लेकिन वर्तमान में ये सब अतीत की बातें हो गईं हैं।
शाम होते ही बच्चे घरों से निकलकर पारंपरिक खेल खेलते थे। इन खेलों से बच्चों का शारीरिक विकास होने के साथ-साथ अनुशासन, टीम भावना और सहयोग की भावना भी विकसित होती थी लेकिन समय के साथ तकनीक ने बच्चों की दिनचर्या बदल दी है। आज अधिकांश बच्चे अपना खाली समय मैदान में खेलने के बजाय मोबाइल फोन पर वीडियो गेम खेलने में बिताते हैं।
राष्ट्रीय वीडियो गेम दिवस के अवसर पर यह बदलाव साफ दिखाई देता है कि जहां पहले गांव के चौपाल, गलियां और स्कूल के मैदान बच्चों से गुलजार रहते थे। वहीं अब कई बच्चे घंटों मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त नजर आते हैं। गांव जड़थल निवासी बुजुर्ग शेर सिंह बताते हैं कि पहले गर्मी की छुट्टियों और शाम को बच्चे कबड्डी, गुल्ली-डंडा, पिट्ठू, कंचे, खो-खो, रस्सीकूद और लंगड़ी टांग खेलते थे।
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इन खेलों के लिए किसी महंगे सामान या इंटरनेट की जरूरत नहीं होती थी। बच्चे मिल-जुलकर खेलते थे, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास स्वाभाविक रूप से होता था। कोसली निवासी बुजुर्ग रामपाल ने बताया कि हमारे समय में बच्चे कबड्डी, गुल्ली-डंडा, कंचे, पिट्ठू और खो-खो जैसे खेल रोज खेलते थे। आज मोबाइल के बढ़ते उपयोग के कारण ये खेल धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी को इन खेलों से जोड़ने की जरूरत है।
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अभिभावक बोले
उषा देवी ने बताया कि पहले बच्चे स्कूल से लौटने के बाद सीधे मैदान में खेलने चले जाते थे। अब अधिकतर समय मोबाइल पर गेम खेलते हैं। बच्चों को फिर से पारंपरिक खेलों के लिए प्रेरित करना चाहिए।
रजनीश ने बताया कि मोबाइल गेम सीमित समय तक ठीक हैं लेकिन बच्चों को कबड्डी, खो-खो और गिल्ली-डंडा जैसे खेल भी खेलने चाहिए। इससे उनका स्वास्थ्य बेहतर रहता है और वे सामाजिक रूप से भी अधिक सक्रिय रहते हैं। वहीं टीना तंवर बताती हैं कि मोबाइल का सीमित उपयोग तो ठीक है लेकिन अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार पर असर डाल सकता है। वहीं पारंपरिक खेल बच्चों को शारीरिक रूप से सक्रिय रखने के साथ आत्मविश्वास और टीमवर्क की सीख भी देते हैं।
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शाम होते ही बच्चे घरों से निकलकर पारंपरिक खेल खेलते थे। इन खेलों से बच्चों का शारीरिक विकास होने के साथ-साथ अनुशासन, टीम भावना और सहयोग की भावना भी विकसित होती थी लेकिन समय के साथ तकनीक ने बच्चों की दिनचर्या बदल दी है। आज अधिकांश बच्चे अपना खाली समय मैदान में खेलने के बजाय मोबाइल फोन पर वीडियो गेम खेलने में बिताते हैं।
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राष्ट्रीय वीडियो गेम दिवस के अवसर पर यह बदलाव साफ दिखाई देता है कि जहां पहले गांव के चौपाल, गलियां और स्कूल के मैदान बच्चों से गुलजार रहते थे। वहीं अब कई बच्चे घंटों मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त नजर आते हैं। गांव जड़थल निवासी बुजुर्ग शेर सिंह बताते हैं कि पहले गर्मी की छुट्टियों और शाम को बच्चे कबड्डी, गुल्ली-डंडा, पिट्ठू, कंचे, खो-खो, रस्सीकूद और लंगड़ी टांग खेलते थे।
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इन खेलों के लिए किसी महंगे सामान या इंटरनेट की जरूरत नहीं होती थी। बच्चे मिल-जुलकर खेलते थे, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास स्वाभाविक रूप से होता था। कोसली निवासी बुजुर्ग रामपाल ने बताया कि हमारे समय में बच्चे कबड्डी, गुल्ली-डंडा, कंचे, पिट्ठू और खो-खो जैसे खेल रोज खेलते थे। आज मोबाइल के बढ़ते उपयोग के कारण ये खेल धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी को इन खेलों से जोड़ने की जरूरत है।
अभिभावक बोले
उषा देवी ने बताया कि पहले बच्चे स्कूल से लौटने के बाद सीधे मैदान में खेलने चले जाते थे। अब अधिकतर समय मोबाइल पर गेम खेलते हैं। बच्चों को फिर से पारंपरिक खेलों के लिए प्रेरित करना चाहिए।
रजनीश ने बताया कि मोबाइल गेम सीमित समय तक ठीक हैं लेकिन बच्चों को कबड्डी, खो-खो और गिल्ली-डंडा जैसे खेल भी खेलने चाहिए। इससे उनका स्वास्थ्य बेहतर रहता है और वे सामाजिक रूप से भी अधिक सक्रिय रहते हैं। वहीं टीना तंवर बताती हैं कि मोबाइल का सीमित उपयोग तो ठीक है लेकिन अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार पर असर डाल सकता है। वहीं पारंपरिक खेल बच्चों को शारीरिक रूप से सक्रिय रखने के साथ आत्मविश्वास और टीमवर्क की सीख भी देते हैं।

मोबाइल में वीडियो गेम खेलता बच्चा। संवाद