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अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक दिवस : संघर्ष, समर्पण और सफलता की मिसाल बने टेकचंद व शर्मिला धनखड़
Tue, 23 Jun 2026 04:07 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Tue, 23 Jun 2026 04:07 AM IST
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शर्मिला धनखड
रेवाड़ी। बावल शहर निवासी पैरा ओलंपियन एवं एथलेटिक्स कोच टेकचंद ने जेवलिन थ्रो में शानदार प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक अपने नाम किए हैं। 2021 के पैरा ओलंपिक में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। इसमें वे पदक जीतने से चूक गए थे लेकिन हार नहीं मानी और निरंतर मेहनत जारी रखी।
टेकचंद ने 2023 में एफ-55 कैटेगरी में खेलते हुए ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया। उनका खेल जीवन संघर्षों से भरा रहा है। वर्ष 2005 में राजस्थान के भिवाड़ी में एक कंपनी से लौटते समय वह सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए थे जिसमें उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई।
हादसे के बाद उन्हें लगभग सात वर्षों तक बिस्तर पर रहना पड़ा। व्हीलचेयर पर आने के बाद भी टेकचंद ने हिम्मत नहीं हारी और भीम अवॉर्डी कोच सतबीर से प्रेरणा लेकर भाला फेंक (जेवलिन थ्रो) को अपने करियर के रूप में अपनाया। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी खुद को तैयार किया और खेल जगत में अपनी अलग पहचान बनाई।
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टेकचंद ने 2018 एशियन गेम्स (जकार्ता) में कांस्य पदक और 2019 विश्व चैंपियनशिप (दुबई) में छठा स्थान प्राप्त किया था। वहीं 2021 में बेंगलुरु में आयोजित राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक चैंपियनशिप में उन्होंने जेवलिन, डिस्कस और शॉटपुट में एक-एक स्वर्ण पदक जीतकर शानदार प्रदर्शन किया।
उनकी लगातार उपलब्धियों के चलते उन्हें खेल विभाग में पैरा एथलेटिक्स कोच के पद पर नियुक्ति भी मिली। टेकचंद ने बताया कि आगे भी वह मेहनत करते रहेंगे। साथ ही युवाओं को भी प्रेरित करेंगे।
शर्मिला धनखड़ ने संघर्ष को बनाया ताकत
सनसिटी निवासी शर्मिला धनखड़ ने कठिन परिस्थितियों को पीछे छोड़ते हुए अपने संघर्ष को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है। हरियाणा रोडवेज की पहली महिला कंडक्टर के रूप में पहचान बनाने वाली शर्मिला ने खेल जगत में भी अपनी अलग पहचान स्थापित की है।
उन्होंने 2022 पैरा कॉमनवेल्थ गेम्स तक का सफर अपने दम पर तय कर जिले का नाम रोशन किया। शर्मिला ने एक पैर से करीब 40 प्रतिशत दिव्यांग होने के बावजूद कभी भी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने इंग्लैंड के बर्मिंघम में आयोजित 2022 पैरा कॉमनवेल्थ गेम्स में शॉट पुट स्पर्धा में चौथा स्थान हासिल कर शानदार प्रदर्शन किया।
वर्ष 2018 में रोडवेज हड़ताल के दौरान उन्हें कंडक्टर की नौकरी मिली थी लेकिन हड़ताल समाप्त होने के बाद नौकरी चली गई। इस झटके ने उन्हें निराश करने के बजाय आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उनके पति अजीत सिंह के सुझाव पर उन्होंने खेलों की ओर रुख किया और अपने दम पर पहचान बनाने का निर्णय लिया।
आज शर्मिला का लक्ष्य देश के लिए पदक जीतना है। वे 2026 पैरा कॉमनवेल्थ गेम्स, पैरा एशियन गेम्स और लॉस एंजिल्स 2028 पैरालिंपिक की तैयारी में जुटी हुई हैं। इसके लिए वे रोजाना चार से पांच घंटे अभ्यास करती हैं और कोच वीरेंद्र धनखड़ के मार्गदर्शन में थ्रो की ट्रेनिंग ले रही हैं। बेहतर प्रशिक्षण के लिए वे सोनीपत में रहकर अभ्यास कर रही हैं।
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टेकचंद ने 2023 में एफ-55 कैटेगरी में खेलते हुए ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया। उनका खेल जीवन संघर्षों से भरा रहा है। वर्ष 2005 में राजस्थान के भिवाड़ी में एक कंपनी से लौटते समय वह सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए थे जिसमें उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई।
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हादसे के बाद उन्हें लगभग सात वर्षों तक बिस्तर पर रहना पड़ा। व्हीलचेयर पर आने के बाद भी टेकचंद ने हिम्मत नहीं हारी और भीम अवॉर्डी कोच सतबीर से प्रेरणा लेकर भाला फेंक (जेवलिन थ्रो) को अपने करियर के रूप में अपनाया। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी खुद को तैयार किया और खेल जगत में अपनी अलग पहचान बनाई।
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टेकचंद ने 2018 एशियन गेम्स (जकार्ता) में कांस्य पदक और 2019 विश्व चैंपियनशिप (दुबई) में छठा स्थान प्राप्त किया था। वहीं 2021 में बेंगलुरु में आयोजित राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक चैंपियनशिप में उन्होंने जेवलिन, डिस्कस और शॉटपुट में एक-एक स्वर्ण पदक जीतकर शानदार प्रदर्शन किया।
उनकी लगातार उपलब्धियों के चलते उन्हें खेल विभाग में पैरा एथलेटिक्स कोच के पद पर नियुक्ति भी मिली। टेकचंद ने बताया कि आगे भी वह मेहनत करते रहेंगे। साथ ही युवाओं को भी प्रेरित करेंगे।
शर्मिला धनखड़ ने संघर्ष को बनाया ताकत
सनसिटी निवासी शर्मिला धनखड़ ने कठिन परिस्थितियों को पीछे छोड़ते हुए अपने संघर्ष को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है। हरियाणा रोडवेज की पहली महिला कंडक्टर के रूप में पहचान बनाने वाली शर्मिला ने खेल जगत में भी अपनी अलग पहचान स्थापित की है।
उन्होंने 2022 पैरा कॉमनवेल्थ गेम्स तक का सफर अपने दम पर तय कर जिले का नाम रोशन किया। शर्मिला ने एक पैर से करीब 40 प्रतिशत दिव्यांग होने के बावजूद कभी भी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने इंग्लैंड के बर्मिंघम में आयोजित 2022 पैरा कॉमनवेल्थ गेम्स में शॉट पुट स्पर्धा में चौथा स्थान हासिल कर शानदार प्रदर्शन किया।
वर्ष 2018 में रोडवेज हड़ताल के दौरान उन्हें कंडक्टर की नौकरी मिली थी लेकिन हड़ताल समाप्त होने के बाद नौकरी चली गई। इस झटके ने उन्हें निराश करने के बजाय आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उनके पति अजीत सिंह के सुझाव पर उन्होंने खेलों की ओर रुख किया और अपने दम पर पहचान बनाने का निर्णय लिया।
आज शर्मिला का लक्ष्य देश के लिए पदक जीतना है। वे 2026 पैरा कॉमनवेल्थ गेम्स, पैरा एशियन गेम्स और लॉस एंजिल्स 2028 पैरालिंपिक की तैयारी में जुटी हुई हैं। इसके लिए वे रोजाना चार से पांच घंटे अभ्यास करती हैं और कोच वीरेंद्र धनखड़ के मार्गदर्शन में थ्रो की ट्रेनिंग ले रही हैं। बेहतर प्रशिक्षण के लिए वे सोनीपत में रहकर अभ्यास कर रही हैं।