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परामर्श सेंटर तक सिमटी स्वास्थ्य सेवाएं, मरीज बोले- पांच में से मिलती है दो दवा
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अस्पताल में लगी मरीजों की भीड़
- फोटो : Rewari
सरकार से लेकर स्वास्थ्य विभाग की ओर से सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में बेहतर सेवाएं देने का दावा किया जाता है। लेकिन सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों के हालात ऐसे हैं कि ये स्वास्थ्य सेवाएं महज परामर्श सेंटर तक सिमट कर रही गई हैं। जिला के सबसे बड़े 100 बेड के नागरिक अस्पताल में स्टाफ नर्स की बात करें तो सेंक्शन में से आधी पोस्ट खाली हैं। दवाई भी पांच में मरीजों को दो ही मिलती हैं। ऐसे में जब दवाई ही पूरी न मिले तो बीमारियां किस तरह से ठीक हो पाएंगी।
नागरिक अस्पताल में 100 बेड के हिसाब से 25 डॉक्टर, 64 स्टाफ नर्स व 9 नर्सिंग सिस्टर की पोस्ट चार साल में स्वास्थ्य विभाग नहीं भर पाया। 5 मई को स्वास्थ्य विभाग की ओर से अस्पताल को 100 से बढ़ाकर 200 बेड करने की घोषणा के बाद निर्माण की अधिकारिक अनुमति भी मिल चुकी है। लेकिन यहां बड़ा सवाल है कि बेसिक सुविधाओं के अभाव में मरीजों को किस तरह से बेहतर उपचार मिल पाएगा।
200 बेड के लिए जरूरी 110 डॉक्टर और 180 स्टाफ नर्स
स्वास्थ्य सेवाओं में डॉक्टर के बाद स्टाफ नर्स नींव होती हैं। लेकिन रेवाड़ी में पहले से ही नींव हिली हुई है। रेवाड़ी में स्टाफ नर्स की 90 पोस्ट प्रस्तावित हैं, लेकिन कार्यरत महज 26 हैं। डॉक्टर की बात करें तो यहां पर 55 मेडिकल ऑफिसर (एमओ) की जरूरत है, लेकिन कार्यरत महज 30 ही हैं। क्योंकि अब अस्पताल 200 बेड का हो चुका है, ऐसे में स्टाफ नर्स की प्रस्तावित पोस्ट बढ़कर 180 व डॉक्टर की 110 हो जाएगी। लेकिन ऐसा कब होगा ये बड़ा सवाल है। ऐसा ही हाल नर्सिंग सिस्टर का है। यहां पर इनके लिए 10 पोस्ट प्रस्तावित है, लेकिन कार्यरत महज दो हैं। ऐसे में 8 पोस्ट खाली होने का खामियाजा यहां पर भर्ती मरीजों को उठाना पड़ रहा है।
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रोजाना औसतन 1500 की होती है ओपीडी
शहर के नागरिक अस्पताल में हर रोज औसतन नए और पुराने 1500 मरीजों की ओपीडी होती है। नागरिक अस्पताल में दवाओं की कमी से मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ती है। ठंड के मौसम के चलते अस्पताल में खांसी-जुकाम व मौसमी बीमारी के ज्यादा बीमार पहुंचते हैं। छोटी बीमारियों के लिए पूरी दवाएं नहीं मिलती गंभीर उपचार के लिए रेफर ही सहारा है।
ट्रॉमा सेंटर भी महज रेफरल सेंटर
जिला से तीन नेशनल हाईवे- 48, 11 व 71 होकर गुजरते हैं। पटौदी रोड को भी हाईवे में तब्दील करने पर कार्य चल रहा है। ऐसे में सड़क दुर्घटनाओं के हर रोज शहर के ट्रॉमा सेंटर में 10-12 केस पहुंचते हैं। ट्रॉमा सेंटर में व्यवस्थाएं नहीं होने से हर रोज 80 फीसदी घायलों को रेफर कर दिया जाता है। इसका बड़ा कारण यह है कि आज तक ट्रॉमा सेंटर में स्थायी चिकित्सकों की नियुक्ति नहीं हो पाई है। नागरिक अस्पताल के डॉक्टरों की ड्यूटी ही ट्रॉमा सेंटर में लगाई जाती है।
चार में से मिली दो दवाई : गुलाब
अस्पताल में एलर्जी उपचार के लिए आए गुलाब ने बताया कि पहले तो डॉक्टर के यहां पर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा। दवाएं लेने की बारी तो चार में से महज दो ही दवाई मिल पाई। ऐसा पहली बार नहीं अधिकतर ऐसा ही होता है।
मरीजों से बातचीत
पांच में से मिली दो दवाई : सुमन
नागरिक अस्पताल में दवा लेने आई सुमन ने बताया कि पांच में से दो ही दवाई मिल पाई हैं। जब भी अस्पताल आते हैं, अधिकतर दवाई बाहर से खरीदनी पड़ती है। डॉक्टर से दिखाने के लिए महज पांच रुपये लगते हैं, इसलिए आते हैं।
छाती में दर्द के लिए आया था, वहीं दवाई नहीं मिली : पूर्णमल
पूर्णमल मुुदगिल ने बताया कि छाती में दर्द के चलते नागरिक अस्पताल में आया था। सस्ती दवाई तो मिल जाती है, महंगी दवाओं के लिए बाहर भेज, दिया जाता है। मुख्य दवाई ही न मिले तो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का क्या फायदा।
नहीं मिली पैर की दवाई : त्रिलोक
शहर के नागरिक अस्पताल में पैर के उपचार के लिए आया था। पांच में चार दवाई मिल गई, एक दवाई नहीं मिली उसे बाहर से खरीदना पड़ेगा। सभी दवाएं अस्पताल में ही मिल जानी चाहिए।
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नागरिक अस्पताल में 100 बेड के हिसाब से 25 डॉक्टर, 64 स्टाफ नर्स व 9 नर्सिंग सिस्टर की पोस्ट चार साल में स्वास्थ्य विभाग नहीं भर पाया। 5 मई को स्वास्थ्य विभाग की ओर से अस्पताल को 100 से बढ़ाकर 200 बेड करने की घोषणा के बाद निर्माण की अधिकारिक अनुमति भी मिल चुकी है। लेकिन यहां बड़ा सवाल है कि बेसिक सुविधाओं के अभाव में मरीजों को किस तरह से बेहतर उपचार मिल पाएगा।
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200 बेड के लिए जरूरी 110 डॉक्टर और 180 स्टाफ नर्स
स्वास्थ्य सेवाओं में डॉक्टर के बाद स्टाफ नर्स नींव होती हैं। लेकिन रेवाड़ी में पहले से ही नींव हिली हुई है। रेवाड़ी में स्टाफ नर्स की 90 पोस्ट प्रस्तावित हैं, लेकिन कार्यरत महज 26 हैं। डॉक्टर की बात करें तो यहां पर 55 मेडिकल ऑफिसर (एमओ) की जरूरत है, लेकिन कार्यरत महज 30 ही हैं। क्योंकि अब अस्पताल 200 बेड का हो चुका है, ऐसे में स्टाफ नर्स की प्रस्तावित पोस्ट बढ़कर 180 व डॉक्टर की 110 हो जाएगी। लेकिन ऐसा कब होगा ये बड़ा सवाल है। ऐसा ही हाल नर्सिंग सिस्टर का है। यहां पर इनके लिए 10 पोस्ट प्रस्तावित है, लेकिन कार्यरत महज दो हैं। ऐसे में 8 पोस्ट खाली होने का खामियाजा यहां पर भर्ती मरीजों को उठाना पड़ रहा है।
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रोजाना औसतन 1500 की होती है ओपीडी
शहर के नागरिक अस्पताल में हर रोज औसतन नए और पुराने 1500 मरीजों की ओपीडी होती है। नागरिक अस्पताल में दवाओं की कमी से मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ती है। ठंड के मौसम के चलते अस्पताल में खांसी-जुकाम व मौसमी बीमारी के ज्यादा बीमार पहुंचते हैं। छोटी बीमारियों के लिए पूरी दवाएं नहीं मिलती गंभीर उपचार के लिए रेफर ही सहारा है।
ट्रॉमा सेंटर भी महज रेफरल सेंटर
जिला से तीन नेशनल हाईवे- 48, 11 व 71 होकर गुजरते हैं। पटौदी रोड को भी हाईवे में तब्दील करने पर कार्य चल रहा है। ऐसे में सड़क दुर्घटनाओं के हर रोज शहर के ट्रॉमा सेंटर में 10-12 केस पहुंचते हैं। ट्रॉमा सेंटर में व्यवस्थाएं नहीं होने से हर रोज 80 फीसदी घायलों को रेफर कर दिया जाता है। इसका बड़ा कारण यह है कि आज तक ट्रॉमा सेंटर में स्थायी चिकित्सकों की नियुक्ति नहीं हो पाई है। नागरिक अस्पताल के डॉक्टरों की ड्यूटी ही ट्रॉमा सेंटर में लगाई जाती है।
चार में से मिली दो दवाई : गुलाब
अस्पताल में एलर्जी उपचार के लिए आए गुलाब ने बताया कि पहले तो डॉक्टर के यहां पर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा। दवाएं लेने की बारी तो चार में से महज दो ही दवाई मिल पाई। ऐसा पहली बार नहीं अधिकतर ऐसा ही होता है।
मरीजों से बातचीत
पांच में से मिली दो दवाई : सुमन
नागरिक अस्पताल में दवा लेने आई सुमन ने बताया कि पांच में से दो ही दवाई मिल पाई हैं। जब भी अस्पताल आते हैं, अधिकतर दवाई बाहर से खरीदनी पड़ती है। डॉक्टर से दिखाने के लिए महज पांच रुपये लगते हैं, इसलिए आते हैं।
छाती में दर्द के लिए आया था, वहीं दवाई नहीं मिली : पूर्णमल
पूर्णमल मुुदगिल ने बताया कि छाती में दर्द के चलते नागरिक अस्पताल में आया था। सस्ती दवाई तो मिल जाती है, महंगी दवाओं के लिए बाहर भेज, दिया जाता है। मुख्य दवाई ही न मिले तो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का क्या फायदा।
नहीं मिली पैर की दवाई : त्रिलोक
शहर के नागरिक अस्पताल में पैर के उपचार के लिए आया था। पांच में चार दवाई मिल गई, एक दवाई नहीं मिली उसे बाहर से खरीदना पड़ेगा। सभी दवाएं अस्पताल में ही मिल जानी चाहिए।