फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Rewari News ›   galwan dispute, ex army man, china, indian army, rewari

रेजांगला योद्धा बोले-धोखा देना चीन की फितरत

Thu, 18 Jun 2020 11:51 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Thu, 18 Jun 2020 11:51 PM IST
विज्ञापन
galwan dispute, ex army man, china, indian army, rewari
रेजांगला योद्धा निहाल सिंह से बातचीत करते सत्यवीर नाहड़िया। - फोटो : Rewari
रेवाड़ी। भारत-चीन के बीच सन 1962 में हुए रेजांगला युद्ध के अलंकृत योद्धा सेना मेडल निहाल सिंह यादव को आज भी चीनियों के नापाक इरादों की दास्तान याद है। गांव चिमनावास के निहाल सिंह ने युद्ध के अनछुए पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। निहाल सिंह दिनभर टीवी पर भारत-चीन के बीच गलवां घाटी प्रकरण संबंधी खबरें देखते हैं।
विज्ञापन

निहाल सिंह ने बताया कि धोखा देना चीन की फितरत रही है। सन 1962 में भी हिंदी-चीनी भाई-भाई नारे की आड़ में हमारी पीठ में छुरा घोंपा गया। पौ फटते ही हजारों चीनियों ने लेह लद्दाख के करीब सामरिक महत्व की चौकी रेजांगला पोस्ट पर हमला बोल दिया। हमारी कंपनी 13 कुमाऊं तैनात थी, जिसमें तीन जेसीओ सहित 120 जवान थे। कंपनी कमांडर मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में सभी जवानों ने मोर्चा संभाला तथा देखते-देखते घाटी को चीनियों की लाशों से पाट दिया। इस युद्ध में जहां हमारे 114 जवान शहीद हुए, वहीं उन्होंने अंतिम सांस तक लड़ते हुए करीब 1300 से ज्यादा चीनियों को मार गिराया था। हम कुछ सैनिक ही जिंदा बचे थे। एक परमवीर चक्र, आठ वीर चक्र, चार सेना मेडल तथा एक मेंशन इन डिस्पैच जैसे अलंकरण इस युद्ध की वीरता और बलिदान की कहानी कहते हैं। निहाल सिंह ने बताया कि युद्ध किसी चीज का समाधान नहीं होता, किंतु देश की अखंडता और संप्रभुता को चुनौती देने वालों को युद्ध की भाषा ही समझा सकती है। टीवी पर बार-बार लद्दाख क्षेत्र की संबंधित झड़पें देखकर उनका चेहरा तमतमा उठता है। एक ओर जहां वे अपने साथी शहीदों को याद कर भावुक हो उठते हैं, वहीं चीन की दोगली नीतियों के प्रति रोष भी जाहिर करते हैं।
विज्ञापन

देश की सरहद पर उकसावे की ये हरकतें निंदनीय
जैसे ही लद्दाख की गलवां घाटी पर 20 सैनिकों की शहादत का समाचार मिला, बर्फीले तूफान के बीच चीनियों को धूल चटा चुके है निहाल सिंह चीनियों को सबक सीखने की बात कहने लगे। निहाल सिंह ने बताया कि कोरोना से कठिन काल में देश की सरहद पर उकसावे की ये हरकतें निंदनीय हैं। ऐसे समय में युद्ध न हो तो सभी की भलाई है, किंतु यदि होता है तो चीन समझ ले कि अब यह बासठ वाला हिंदुस्तान नहीं है। अपने जीवन का 80वां बसंत देखने के लिए आगे बढ़ रहे निहाल सिंह यादव मात्र 18 वर्ष की आयु में भारतीय सेना में भर्ती हो गए थे तथा रेजांगला युद्ध में घायल हो गए थे। अपनी सेवानिवृत्ति के 45 साल बाद आज भी उन्हें रेजांगला युद्ध, अहीरवाल के सैनिकों द्वारा अंतिम सांस और अंतिम गोली तक लड़ी गई उस लड़ाई की अनेक मार्मिक कहानियां याद हैं। गांव चिमनावास की पहाड़ियों से लेकर रेजांगला की पर्वत श्रृंखलाओं तक की उनकी यात्रा अहीरवाल की स्वर्णिम सैनिक संस्कृति की अनेक मार्मिक दास्तान सहेजे हैं। वीरवार को साहित्यकार सत्यवीर सिंह नाहड़िया भी चिमनावास में निहाल सिंह से मिलने पहुंचे।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed