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गांव में देसी घी के नखरे, शहर में वनस्पति घी भी इतराया
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रेवाड़ी। मकर संक्रांति पर्व पर लोग अपनी बहन और बुआ के घर संक्रांत भेजने की लोक परंपरा का निर्वाह करते हैं। इस दौरान लोग उन्हें उपहार स्वरूप देसी घी, दाल, चावल, नमक, सब्जी मिठाई आदि देते हैं। वहीं, करीब एक सप्ताह से जिले में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में देसी घी खरीदने और उसे बेचने का काम ग्रामीण महिलाओं और दुग्ध उत्पादक किसान परिवार कर रहे हैं। अहम यह है कि देशी घी के नखरे बढ़ गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में देसी घी के दाम बढ़ गए, जबकि शहर में वनस्पति घी भी खूब इतराया।
मकर संक्रांति पर्व पर विशेष रूप से देसी घी भिजवाने का चलन है। बेटी के घर संतान होने पर भी मां अपनी बेटी के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए देसी घी भिजवाती है। यह परंपरा भी काफी पुरानी चली आ रही है, जिसमें संबंधित परिवार अपनी खुशी और सामर्थ्य अनुसार देशी घी भेजते हैं, जिसकी मात्रा कम से कम एक किलोग्राम से लेकर दस किलोग्राम तक होती है। बीते एक पखवाड़ा से ग्रामीण इलाकों में देसी घी की मांग बढ़ गई। इसके चलते इसकी कीमतों में भारी वृद्धि देखने को मिली है।
गाय के दूध से बना देसी घी 1200 और भैंस का घी बिका 800 रुपये प्रति किलो
गांवों में देसी गाय के दूध से बनने वाला देसी घी कम लोग इस्तेमाल करते हैं। इसका अधिकतर इस्तेमाल दवाएं बनाने या फिर हवन-यज्ञ में इस्तेमाल होता है। यह सबसे महंगा होता है। दिसंबर-जनवरी में इसकी कीमत 1 हजार से 1200 रुपये तक प्रतिकिलोग्राम रही। उधर भैंस के दूध से बने देसी घी की मांग काफी अधिक रही। इसकी कीमत 800 से 900 रुपये प्रतिकिलोग्राम भाव रही। ग्रामीण क्षेत्रों से जिला मुख्यालय की ओर से आने वाली सड़कों पर चलने वाली डेयरी और मिष्ठान भंडार वाली दुकानों पर देसी घी 500 से 600 रुपये प्रतिकिलोग्राम के भाव से बिका, जो सितंबर में 440 रुपये प्रति किलो भाव से बिकता था।
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200 से 250 रुपये प्रति किलो बिका वनस्पति घी
शहरी क्षेत्रों में परचून की दुकानों पर वनस्पति घी प्रति किलोग्राम 200 से 250 रुपये प्रति किलो से अधिक दाम से बिका, जो बीते दिनों में भाव के उतार चढ़ाव के साथ बिका।
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मकर संक्रांति पर्व पर विशेष रूप से देसी घी भिजवाने का चलन है। बेटी के घर संतान होने पर भी मां अपनी बेटी के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए देसी घी भिजवाती है। यह परंपरा भी काफी पुरानी चली आ रही है, जिसमें संबंधित परिवार अपनी खुशी और सामर्थ्य अनुसार देशी घी भेजते हैं, जिसकी मात्रा कम से कम एक किलोग्राम से लेकर दस किलोग्राम तक होती है। बीते एक पखवाड़ा से ग्रामीण इलाकों में देसी घी की मांग बढ़ गई। इसके चलते इसकी कीमतों में भारी वृद्धि देखने को मिली है।
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गाय के दूध से बना देसी घी 1200 और भैंस का घी बिका 800 रुपये प्रति किलो
गांवों में देसी गाय के दूध से बनने वाला देसी घी कम लोग इस्तेमाल करते हैं। इसका अधिकतर इस्तेमाल दवाएं बनाने या फिर हवन-यज्ञ में इस्तेमाल होता है। यह सबसे महंगा होता है। दिसंबर-जनवरी में इसकी कीमत 1 हजार से 1200 रुपये तक प्रतिकिलोग्राम रही। उधर भैंस के दूध से बने देसी घी की मांग काफी अधिक रही। इसकी कीमत 800 से 900 रुपये प्रतिकिलोग्राम भाव रही। ग्रामीण क्षेत्रों से जिला मुख्यालय की ओर से आने वाली सड़कों पर चलने वाली डेयरी और मिष्ठान भंडार वाली दुकानों पर देसी घी 500 से 600 रुपये प्रतिकिलोग्राम के भाव से बिका, जो सितंबर में 440 रुपये प्रति किलो भाव से बिकता था।
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200 से 250 रुपये प्रति किलो बिका वनस्पति घी
शहरी क्षेत्रों में परचून की दुकानों पर वनस्पति घी प्रति किलोग्राम 200 से 250 रुपये प्रति किलो से अधिक दाम से बिका, जो बीते दिनों में भाव के उतार चढ़ाव के साथ बिका।