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समाज के सहयोग के बिना कोई कार्य नहीं कर सकते : नरेंद्र शर्मा
Mon, 04 Mar 2024 12:24 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Mon, 04 Mar 2024 12:24 AM IST
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रेवाड़ी। सहारनवास में सिलाई ट्रेनिंग के सर्टिफिकेट दिए गए। सेवा भारती के सहयोग से गांव की महिलाओं को सिलाई प्रशिक्षण कार्यक्रम पिछले वर्ष अप्रैल से चल रहा है। महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से 6 महीने की ट्रेनिंग निशुल्क दी जाती है। गांव की कुछ महिलाओं ने बुटीक भी खोल लिया है।
सहारनवास गांव की लगभग 53 महिलाओं ने गांव की ही सुरेश से 6 महीने ट्रेनिंग ली। 35 महिला परीक्षा में बैठीं। उत्तीर्ण होने वाली 25 महिलाओं को विभाग प्रमुख नरेंद्र शर्मा ने सर्टिफिकेट ट्रेनिंग सेंटर में दिए। नरेंद्र शर्मा ने अपने कहा की समाज के सहयोग के बिना कोई कार्य नहीं कर सकते हैं। उन्होंने सहारनवास गांव की महिलाओं और दादी जी के ट्रेनिंग केंद्र की सराहना की।
दादी जी के ट्रेनिंग सेंटर में प्रशिक्षण दे रही गांव की महिला सुरेश ने कहा कि 1975 में जब वे मात्र 11 वर्ष की थीं। विवाह कर दिया गया था। 14 वर्ष की उम्र में अपने पीहर चांदन वास खेड़ा में सिलाई–कढ़ाई सीख ली थी। उस समय गांव के सरकारी सिलाई सेंटर में नौकरी का ऑफर भी मिल गया था, लेकिन पिता ने नौकरी पर भेजने की बजाय ससुराल सहारनवास भेज दिया दिया था। चार बेटियों और एक बेटे के परिवार को उन्होंने इसी हुनर से कपड़े सीलकर आर्थिक योगदान किया। इस हुनर की बदौलत ही समाज में कपड़े सीलना सिखाती हैं।
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सहारनवास गांव की लगभग 53 महिलाओं ने गांव की ही सुरेश से 6 महीने ट्रेनिंग ली। 35 महिला परीक्षा में बैठीं। उत्तीर्ण होने वाली 25 महिलाओं को विभाग प्रमुख नरेंद्र शर्मा ने सर्टिफिकेट ट्रेनिंग सेंटर में दिए। नरेंद्र शर्मा ने अपने कहा की समाज के सहयोग के बिना कोई कार्य नहीं कर सकते हैं। उन्होंने सहारनवास गांव की महिलाओं और दादी जी के ट्रेनिंग केंद्र की सराहना की।
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दादी जी के ट्रेनिंग सेंटर में प्रशिक्षण दे रही गांव की महिला सुरेश ने कहा कि 1975 में जब वे मात्र 11 वर्ष की थीं। विवाह कर दिया गया था। 14 वर्ष की उम्र में अपने पीहर चांदन वास खेड़ा में सिलाई–कढ़ाई सीख ली थी। उस समय गांव के सरकारी सिलाई सेंटर में नौकरी का ऑफर भी मिल गया था, लेकिन पिता ने नौकरी पर भेजने की बजाय ससुराल सहारनवास भेज दिया दिया था। चार बेटियों और एक बेटे के परिवार को उन्होंने इसी हुनर से कपड़े सीलकर आर्थिक योगदान किया। इस हुनर की बदौलत ही समाज में कपड़े सीलना सिखाती हैं।
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