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क्रोध, मोह-माया को त्याग कर मिलजुलकर रहना चाहिए : अरुण मुनि
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क्रोध, मोह-माया को त्याग कर मिलजुलकर रहना चाहिए : अरुण मुनि
- फोटो : क्रोध, मोह-माया को त्याग कर मिलजुलकर रहना चाहिए : अरुण मुनि
अग्रवाल मंडी के जैन स्थानक में चातुर्मास पर अरुण मुनि महाराज ने दिए प्रवचन
संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। अग्रवाल मंडी के जैन स्थानक में चल रहे चातुर्मास में युवा प्रेरक अरुण मुनि महाराज ने प्रवचन दिए। अरुण मुनि के साथ उनके शिष्य अभिषेक मुनि भी विराजमान रहे। अरुण मुनि ने बताया कि रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के अटूट रिश्ते के रूप में मनाया जाता है। भाई-बहन एक-दूसरे के सुख व दुख में एक साथ खड़े मिलते हैं। वे कभी एक-दूसरे को अकेला नहीं छोड़ते हैं। प्रवचन सुनने के लिए पहुंचे श्रावक-श्राविकाओं ने अरुण मुनि ने संदेश व गहन भाव को ध्यान से सुना और इसे जीवन में अपनाने के लिए भी वादा किया। जीवन में क्रोध, मोह-माया को त्याग कर सभी को मिलजुलकर रहना चाहिए। इससे भाईचारे के साथ आपसी प्रेम भाव भी बढ़ता है। जो व्यक्ति जीवन में क्रोध व मोह-माया को त्याग देता है वह सुख-दुख से परे भगवान की आस्था में लीन होकर जीवन को व्यतीत करता है। इसलिए जीवन में भाईचारे को अपनाने के साथ क्रोध को त्यागना चाहिए।
राजाखेड़ी गांव में श्रेयांश मुनि ने दिया संदेश
राजाखेड़ी गांव में चल रहे चातुर्मास में श्रेयांश मुनि व रोहित मुनि ने प्रवचन दिए और सभी को रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दी। श्रेयांश मुनि ने बताया कि व्यक्तिगत उग्र स्वभाव से कई बार अकारण ही क्रोध उत्पन्न हो जाता है। जब व्यक्ति क्रोध में भर जाता है। तब वह दुर्वचन बोलता है। इसलिए क्रोधित व्यक्ति को दुर्वचन बोलने से पहले सोचना समझना चाहिए। जहां तक संभव हो व्यक्ति को क्रोध में कम बात करनी चाहिए। क्योंकि क्रोध व्यक्ति के दुश्मन के समान होता है। क्रोध व्यक्ति के सोचने-समझने की क्षमता को समाप्त कर देता है। जिससे व्यक्ति क्रोध में ज्यादातर गलत शब्दों का प्रयोग ही करता है। इसलिए ध्यान रखें ये क्रोध आत्मा की अधोगति का कारण है। यही नहीं क्रोध से सत्य, शील, विनय और धर्म का भी नाश होता है।
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सच्चा मित्र वही जो गुरु के निकट ले जाए : उपेंद्र मुनि
समालखा। समालखा में चल रहे चातुर्मास में उपेंद्र मुनि ने सबसे पहले रक्षाबंधन पर्व की शुभकामनाएं दी। फिर सच्चे मित्र पर गहन प्रवचन दिए। मुनि ने बताया कि जीवन लंबा हो सकता है पर उसमें सच्चा मित्र होना जरूरी है। जो आपके सुने भी और गलत काम में आपको रोके भी। सच्चा मित्र वह नहीं होता जो आपके प्रत्येक सही या गलत काम में साथ दे। जबकि सच्चा मित्र वह होता है जो आपको गलत काम करने से रोके और आपको सही मार्ग दिखाए। जैसा मित्र वैसा चरित्र। मित्र अगर गलत संगत का हो तो जीवन भी दिशा खो सकता है। जिस मित्र में सादगी, संस्कार और भाव होते हैं वही जीवन को सार्थक बना सकता है। प्रवचन सुनने के लिए आस-पास के क्षेत्रों से भी श्रावक-श्राविकाएं पहुंची।
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संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। अग्रवाल मंडी के जैन स्थानक में चल रहे चातुर्मास में युवा प्रेरक अरुण मुनि महाराज ने प्रवचन दिए। अरुण मुनि के साथ उनके शिष्य अभिषेक मुनि भी विराजमान रहे। अरुण मुनि ने बताया कि रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के अटूट रिश्ते के रूप में मनाया जाता है। भाई-बहन एक-दूसरे के सुख व दुख में एक साथ खड़े मिलते हैं। वे कभी एक-दूसरे को अकेला नहीं छोड़ते हैं। प्रवचन सुनने के लिए पहुंचे श्रावक-श्राविकाओं ने अरुण मुनि ने संदेश व गहन भाव को ध्यान से सुना और इसे जीवन में अपनाने के लिए भी वादा किया। जीवन में क्रोध, मोह-माया को त्याग कर सभी को मिलजुलकर रहना चाहिए। इससे भाईचारे के साथ आपसी प्रेम भाव भी बढ़ता है। जो व्यक्ति जीवन में क्रोध व मोह-माया को त्याग देता है वह सुख-दुख से परे भगवान की आस्था में लीन होकर जीवन को व्यतीत करता है। इसलिए जीवन में भाईचारे को अपनाने के साथ क्रोध को त्यागना चाहिए।
राजाखेड़ी गांव में श्रेयांश मुनि ने दिया संदेश
राजाखेड़ी गांव में चल रहे चातुर्मास में श्रेयांश मुनि व रोहित मुनि ने प्रवचन दिए और सभी को रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दी। श्रेयांश मुनि ने बताया कि व्यक्तिगत उग्र स्वभाव से कई बार अकारण ही क्रोध उत्पन्न हो जाता है। जब व्यक्ति क्रोध में भर जाता है। तब वह दुर्वचन बोलता है। इसलिए क्रोधित व्यक्ति को दुर्वचन बोलने से पहले सोचना समझना चाहिए। जहां तक संभव हो व्यक्ति को क्रोध में कम बात करनी चाहिए। क्योंकि क्रोध व्यक्ति के दुश्मन के समान होता है। क्रोध व्यक्ति के सोचने-समझने की क्षमता को समाप्त कर देता है। जिससे व्यक्ति क्रोध में ज्यादातर गलत शब्दों का प्रयोग ही करता है। इसलिए ध्यान रखें ये क्रोध आत्मा की अधोगति का कारण है। यही नहीं क्रोध से सत्य, शील, विनय और धर्म का भी नाश होता है।
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सच्चा मित्र वही जो गुरु के निकट ले जाए : उपेंद्र मुनि
समालखा। समालखा में चल रहे चातुर्मास में उपेंद्र मुनि ने सबसे पहले रक्षाबंधन पर्व की शुभकामनाएं दी। फिर सच्चे मित्र पर गहन प्रवचन दिए। मुनि ने बताया कि जीवन लंबा हो सकता है पर उसमें सच्चा मित्र होना जरूरी है। जो आपके सुने भी और गलत काम में आपको रोके भी। सच्चा मित्र वह नहीं होता जो आपके प्रत्येक सही या गलत काम में साथ दे। जबकि सच्चा मित्र वह होता है जो आपको गलत काम करने से रोके और आपको सही मार्ग दिखाए। जैसा मित्र वैसा चरित्र। मित्र अगर गलत संगत का हो तो जीवन भी दिशा खो सकता है। जिस मित्र में सादगी, संस्कार और भाव होते हैं वही जीवन को सार्थक बना सकता है। प्रवचन सुनने के लिए आस-पास के क्षेत्रों से भी श्रावक-श्राविकाएं पहुंची।
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