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हिंदी के अस्तित्व को बचाना जरूरी, नई शिक्षा नीति से आस

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 12 Sep 2020 01:18 AM IST
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जिस देश में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक कभी हिंदी का ही बोलबाला रहा हो, वहां आज इस भाषा को अपने अस्तित्व के लिए जूझना पड़ रहा है। हालांकि नई शिक्षा नीति से उम्मीद जगी है जिसके लागू होने पर हिंदी के अस्तित्व को बचाया जा सकता है। शिक्षाविदें की मानें तो धीरे-धीरे ही सही हिंदी अपना अस्तित्व बढ़ाती जा रही है। ज्यादातर का मानना है कि हिंदी के विकास पर जोर देने की आवश्यकता है।
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हिंदी आगे तो बढ़ रही है लेकिन हिंदी की कक्षा में पढ़ने वाला छात्र जब अपने शिक्षक से कक्षा में प्रवेश की अनुमति चाहता है तो कहता है- मे आई कम इन सर। इससे दुखद पहलू ओर क्या होगा। जो लोग हिंदी के विकास की बात करते हैं, वे स्वयं भी इसका अनादर करने से बाज नहीं आते।
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प्रवीण कुमार, अध्यापक, रावमावि, सुताना, पानीपत।
आम बोल-चाल की भाषा में हिंदी के साथ अंग्रेजी का प्रयोग बढ़ रहा है। लोग एक-दूसरे पर दोष मढ़ रहे हैं लेकिन सार्थक प्रयास नहीं दिख रहे हैं। शासकीय कामकाज में हिंदी का प्रयोग बढ़ाने का आदेश तो दिया जाता है लेकिन इसका परिपत्र भी अंग्रेजी में लिखा जाता है।
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संदीप कुमार, प्रवक्ता, आर्य महाविद्यालय, पानीपत।
पहले प्राथमिक कक्षा में हिंदी की बारहखड़ी सिखायी जाती थी। इससे मात्राओं और शुद्ध उच्चारण का ज्ञान होता था। अब बच्चों में हिंदी भाषा का ज्ञान औपचारिकता तक सिमट गया है। नई शिक्षा नीति लागू होने पर उम्मीद है कि हिंदी के विकास पर जोर दिया जाए।
राजेश शर्मा, हिंदी अध्यापक, आर्य आदर्श स्कूल, मडलौडा, पानीपत।
युवाओं के बीच हिंदी जैसे गुम सी होती जा रही है। युवा मानते हैं कि हिंदी हमारी मातृभाषा है और हमें इसे बोलना चाहिए, पर अच्छा कैरियर बनाने के लिए और बेहतर नौकरी के लिए अंग्रेजी का प्रयोग हमारी मजबूरी बन गया है।

अमित कुमार, एक प्राइवेट कंपनी में सुपरवाइजर।
हिंदी की स्थिति में काफी सुधार आया है। कई संस्थाओं के प्रयास से हिंदी को एक नया जीवन मिला है। यदि हिंदी को बचाना है, सहेजना है तो सभी को सामूहिक प्रयास करने होंगे। सिर्फ मुट्ठी भर लोग लाख चाहने के बाद भी कुछ विशेष नहीं कर पाएंगे।
ज्योत्सना छौक्कर, डायरेक्टर, इमदाद वेल्फेयर फाउंडेशन, पानीपत।
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