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Panipat News: डिप्रेशन की मरीज बताकर क्लेम देने से किया इंकार, आयोग ने कहा-इलाज बुखार का हुआ क्लेम देना होगा
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पानीपत। डिप्रेशन की मरीज बताकर क्लेम का दावा खारिज करना कंपनी को भारी पड़ा। आयोग ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि पीड़िता का बुखार संबंधित बीमारी का उपचार हुआ है। जिस कारण डिप्रेशन की मरीज बताकर क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता। आयोग ने बीमा कंपनी को पांच लाख रुपये का क्लेम नौ प्रतिशत ब्याज के साथ भुगतान करने के आदेश दिए हैं।
पानीपत के यशपाल ने जिला उपभोक्ता आयोग में याचिका दाखिल की थी। उनका कहना था कि उन्होंने अपनी पत्नी के नाम पर स्टोर हैल्थ इंश्योरेंस कंपनी से पॉलिसी ले रखी थी। जिसकी कवर राशि पांच लाख रुपये थी। यह पॉलिसी 2019 से लगातार नवीनीकृत की जा रही थी। जनवरी 2022 में अचानक उनकी पत्नी की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें पहले पानीपत के एक निजी अस्पताल में भर्ती किया गया। जहां पर इलाज में 11 लाख रुपये का खर्च आया।
इलाज के बाद बीमा कंपनी से क्लेम मांगा, लेकिन कंपनी ने कैशलेस सुविधा देने से इनकार कर दिया और बाद में क्लेम भी खारिज कर दिया। कंपनी का कहना था कि मरीज को पहले से डिप्रेशन की बीमारी थी, जिसकी जानकारी पॉलिसी लेते समय नहीं दी गई। शिकायतकर्ता ने आयोग में दायर याचिका में कहा कि उनका इलाज बुखार और अन्य गंभीर शारीरिक समस्याओं के कारण हुआ था, जिसका डिप्रेशन से कोई संबंध नहीं है।
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जांच में सामने आया डिप्रेशन का इलाज से कोई संबंध नहीं
आयोग ने दोनों पक्षों की दलील सुनी और रिकॉर्ड का अवलोकन किया। इसके बाद आयोग ने पाया कि अस्पताल के दस्तावेजों में डिग्रपेशन का कोई उल्लेख नहीं है। जिस कारण इलाज का उससे कोई संबंध नहीं था। आयोग ने यह भी माना कि बीमा कंपनी ने पॉलिसी जारी करते समय मेडिकल जांच नहीं कराई, इसलिए बाद में बीमारी छिपाने का आरोप लगाना उचित नहीं है। आयोग आदेश दिया है कि बीमा कंपनी को पांच लाख रुपये नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अदा करने के निर्देश दिए। साथ ही मानसिक कष्ट के लिए 11 हजार रुपये और मुकदमे के खर्च के रूप में 5,500 रुपये देने को कहा गया है।
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पानीपत के यशपाल ने जिला उपभोक्ता आयोग में याचिका दाखिल की थी। उनका कहना था कि उन्होंने अपनी पत्नी के नाम पर स्टोर हैल्थ इंश्योरेंस कंपनी से पॉलिसी ले रखी थी। जिसकी कवर राशि पांच लाख रुपये थी। यह पॉलिसी 2019 से लगातार नवीनीकृत की जा रही थी। जनवरी 2022 में अचानक उनकी पत्नी की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें पहले पानीपत के एक निजी अस्पताल में भर्ती किया गया। जहां पर इलाज में 11 लाख रुपये का खर्च आया।
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इलाज के बाद बीमा कंपनी से क्लेम मांगा, लेकिन कंपनी ने कैशलेस सुविधा देने से इनकार कर दिया और बाद में क्लेम भी खारिज कर दिया। कंपनी का कहना था कि मरीज को पहले से डिप्रेशन की बीमारी थी, जिसकी जानकारी पॉलिसी लेते समय नहीं दी गई। शिकायतकर्ता ने आयोग में दायर याचिका में कहा कि उनका इलाज बुखार और अन्य गंभीर शारीरिक समस्याओं के कारण हुआ था, जिसका डिप्रेशन से कोई संबंध नहीं है।
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जांच में सामने आया डिप्रेशन का इलाज से कोई संबंध नहीं
आयोग ने दोनों पक्षों की दलील सुनी और रिकॉर्ड का अवलोकन किया। इसके बाद आयोग ने पाया कि अस्पताल के दस्तावेजों में डिग्रपेशन का कोई उल्लेख नहीं है। जिस कारण इलाज का उससे कोई संबंध नहीं था। आयोग ने यह भी माना कि बीमा कंपनी ने पॉलिसी जारी करते समय मेडिकल जांच नहीं कराई, इसलिए बाद में बीमारी छिपाने का आरोप लगाना उचित नहीं है। आयोग आदेश दिया है कि बीमा कंपनी को पांच लाख रुपये नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अदा करने के निर्देश दिए। साथ ही मानसिक कष्ट के लिए 11 हजार रुपये और मुकदमे के खर्च के रूप में 5,500 रुपये देने को कहा गया है।