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अधिकारों पर वर्षों की चुप्पी न्याय को करती है परास्त, नहीं मिल सकती राहत: हाईकोर्ट

Tue, 06 Jan 2026 09:39 PM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 06 Jan 2026 09:39 PM IST
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Years of silence on rights defeats justice; no relief can be granted: High Court
चंडीगढ़। पंजाब पुलिस के पूर्व कर्मचारी की 1998 की बर्खास्तगी से लेकर बाद के सभी विभागीय आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अपने अधिकारों को लेकर वर्षों तक चुप बैठने वालों को कोर्ट से राहत नहीं मिल सकती। हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की चुप्पी न्याय को परास्त करती है और बिना किसी ठोस और विश्वसनीय कारण के दायर याचिका देरी के सिद्धांत से ग्रस्त है।
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जस्टिस जगमोहन बंसल की एकलपीठ के समक्ष याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसकी नियुक्ति के समय कथित रूप से फर्जी मैट्रिक प्रमाणपत्र पेश करने का आरोप लगाया गया था। इसके आधार पर 8 सितंबर 1998 को उसे बर्खास्त कर दिया गया। बाद में विभागीय अपील, दया याचिका और पुनर्विचार आवेदन भी अलग-अलग वर्षों में खारिज होते चले गए।
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याचिकाकर्ता का तर्क था कि आपराधिक मुकदमे में उसे बरी कर दिया गया इसलिए बर्खास्तगी गलत है। अदालत ने रिकाॅर्ड का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को आपराधिक मुकदमे में 2010 में ही बरी कर दिया गया था और राज्य सरकार की अपील भी 2012 में खारिज हो चुकी थी। इसके बावजूद उसने हाईकोर्ट का रुख करने में लगभग डेढ़ दशक लगा दिया। जब अदालत ने देरी का कारण पूछा, तो याचिकाकर्ता की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा सका।
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कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाओं के लिए भले ही कोई तय समय-सीमा निर्धारित न हो लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि कोई भी व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार कभी भी अदालत पहुंच जाए। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक अपने अधिकारों पर सोया रहता है और बाद में अचानक असाधारण राहत की मांग करता है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल उन्हीं मामलों में देरी के बावजूद हस्तक्षेप किया जा सकता है, जहां कोई स्पष्ट और गंभीर अवैधता सामने आती हो, लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया। अंतत हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।
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