पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की महत्वूपर्ण टिप्पणी, सरकार की आलोचना सांविधानिक अधिकार
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लोकतंत्र में सोशल मीडिया पर सरकार और उसकी नीति की आलोचना करने का सभी को सांविधानिक अधिकार है लेकिन इसका तरीका सभ्य होना चाहिए। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी छह माह से जेल में बंद आरोपी को जमानत देते हुए की। कोरोना के चलते पंजाब में लॉकडाउन करने व काम काज बंद होने से परेशान होकर जसबीर नामक व्यक्ति ने फेसबुक पर लाइव आकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।
इसके बाद पंजाब पुलिस ने 14 अप्रैल को होशियारपुर निवासी जसबीर के खिलाफ होशियारपुर में एफआईआर दर्ज कर दी। एफआईआर के अनुसार याचिकाकर्ता फेसबुक पर लाइव हुआ और राष्ट्र की एकता और अखंडता के खिलाफ बयान दिया। उनके बयान का उद्देश्य सांप्रदायिक असंतोष पैदा करना भी था। इस प्रकार, उसके खिलाफ राजद्रोह, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और सांप्रदायिक असंतोष का कारण बनने का मुकदमा दर्ज किया गया।
सुनवाई के दौरान जसबीर के वकील ने अदालत में तर्क पेश किया कि याचिकाकर्ता छह महीने से अधिक समय से हिरासत में है। इस साल 9 जुलाई को चार्जशीट पेश की गई थी लेकिन अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं। अभी केस के जल्द निपटारे की कोई संभावना भी नजर नहीं आ रही है। याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई अन्य आपराधिक मामला भी लंबित नहीं है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता के बयान से यह साफ है कि उसका मकसद राजद्रोह और सांप्रदायिक भावना भड़काने वाला नहीं था। इस प्रकार याचिकाकर्ता को नियमित जमानत दी जा सकती है।
नफरत फैलाने के लिए नहीं की टिप्पणी
जस्टिस मित्तल ने याचिकाकर्ता के फेसबुक लाइव सत्र के ट्रांसस्क्रिप्ट देखने के बाद कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता कोरोनावायरस के कारण लाकडाउन लगाने से नाखुश था। उसने भारत सरकार व पंजाब सरकार द्वारा महामारी से संभालने और सरकारों के कामकाज की आलोचना की है। उसने सरकारों के उच्चाधिकारियों के साथ-साथ चुने हुए प्रतिनिधियों के खिलाफ भी तीखी और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है, लेकिन यह सब नफरत फैलाने के लिए नहीं है। यह धार्मिक असहमति या सांप्रदायिक सद्भाव को बाधित करने के लिए भी नहीं है।
असंतोष की अभिव्यक्ति है सरकार की आलोचना
बेंच ने कहा कि यह सरकार के कामकाज और उसकी नीतियों की आलोचना के साथ असंतोष की अभिव्यक्ति है। लोकतंत्र में, प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्र रूप से अपनी राय रखने और सरकार के कामकाज की आलोचना करने का अधिकार है। हालांकि, यह सभ्य तरीके से किया जाना चाहिए और असंसदीय भाषा को नहीं अपनाया जाना चाहिए। सरकार को भी राजद्रोह और धार्मिक असहमति से संबंधित कानूनों को लागू करते समय अधिक सहिष्णु और चौकस रहने की जरूरत है।