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जज को माय लॉर्ड कहने पर नहीं की जा सकती वकील पर कोई कार्रवाई: हाईकोर्ट
Updated Sat, 24 Jun 2017 01:16 AM IST
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नोएडा के ध्यानार्थ -
जज को माय लॉर्ड संबोधित करने वाले वकील पर नहीं की जा सकती कार्रवाई: हाईकोर्ट
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों में अवहेलना पर कहीं दंड प्रावधान नहीं: हाईकोर्ट
- नियमों के पार्ट 4 चैप्टर 3 ए की अवहेलना का था आरोप
- नियमों के तहत जजों को योर ऑनर या ऑनरेबल कोर्ट से ही किया जा सकता है संबोधन
विवेक शर्मा
चंडीगढ़।
जजों के संबोधन को लेकर बनी दुविधा की स्थिति के बीच पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने इसे लेकर अहम आदेश जारी किए हैं। जस्टिस राजेश बिंदल पर आधारित खंडपीठ ने स्पष्ट कर दिया कि जज को माय लॉर्ड संबोधित करने वाले वकील पर कार्रवाई नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही यह संबोधन बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के खिलाफ है लेकिन नियमों में कार्रवाई का प्रावधान नहीं है।
इस मामले में याचिका दाखिल करते हुए अमृतसर निवासी याचिकाकर्ता ने कहा था कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के पार्ट 4 चैप्टर 3 ए के तहत विभिन्न स्तर पर जज को संबोधित करने के तरीके का वर्णन है। इसके अनुसार उच्च न्यायपालिका के जज को योर ऑनर या ऑनरेबल कोर्ट कहकर संबोधित किया जाना चाहिए और निचली अदालतों के जजों को सर कहकर संबोधित किया जा सकता है। याची ने कहा कि इन नियमों के खिलाफ जज को संबोधित करने के लिए माय लॉर्ड योर लॉर्डशिप संबोधन का प्रयोग किया जा रहा है। नियमों के खिलाफ होने के कारण इस संबोधन का प्रयोग करने वाले वकील के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस हरिंदर सिंह सिद्धू की खंडपीठ ने याची पक्ष की दलील को सुनने के बाद अपने फैसले में कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के पार्ट 4 चैप्टर 3 ए के तहत संबोधन का तो जिक्र है लेकिन इस बात का कहीं उल्लेख नहीं है कि इसकी पालना न करने पर वकील के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे में इस याचिका को आधारहीन मानते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।
क्या है माय लॉड से जुड़ा विवाद
जज को माय लॉर्ड या योर लॉर्डशिप को लेकर विवाद है। माय लॉर्ड व योर लॉर्डशिप को औपनिवेशिक पदों के अवशेष के रूप में देखा जाता है जो दूसरे शब्दों में गुलामी का प्रतीक है। देश की कई बार काउंसिल प्रस्ताव लाकर यह तय कर चुकी हैं कि जज को यह कहकर संबोधित नहीं करेंगी। मद्रास हाईकोर्ट के जज जस्टिस के चंद्रू ने 2009 में अपनी कोर्ट में माय लॉर्ड संबोधन को बैन कर दिया था। 2014 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एचएल दत्तू व जस्टिस एसए बोबडे ने एडवोकेट शिव सागर तिवारी की जनहित याचिका दाखिल करते हुए कहा था कि माय लॉर्ड, योर लॉर्डशिप संबोधन अनिवार्य नहीं है। यदि सर कहा जाए तो भी मंजूर, योर ऑनर भी मंजूर, माय लॉर्ड भी मंजूर है कोई भी संबोधन हो बस सम्मान के साथ होना चाहिए।
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जज को माय लॉर्ड संबोधित करने वाले वकील पर नहीं की जा सकती कार्रवाई: हाईकोर्ट
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों में अवहेलना पर कहीं दंड प्रावधान नहीं: हाईकोर्ट
- नियमों के पार्ट 4 चैप्टर 3 ए की अवहेलना का था आरोप
- नियमों के तहत जजों को योर ऑनर या ऑनरेबल कोर्ट से ही किया जा सकता है संबोधन
विवेक शर्मा
चंडीगढ़।
जजों के संबोधन को लेकर बनी दुविधा की स्थिति के बीच पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने इसे लेकर अहम आदेश जारी किए हैं। जस्टिस राजेश बिंदल पर आधारित खंडपीठ ने स्पष्ट कर दिया कि जज को माय लॉर्ड संबोधित करने वाले वकील पर कार्रवाई नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही यह संबोधन बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के खिलाफ है लेकिन नियमों में कार्रवाई का प्रावधान नहीं है।
इस मामले में याचिका दाखिल करते हुए अमृतसर निवासी याचिकाकर्ता ने कहा था कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के पार्ट 4 चैप्टर 3 ए के तहत विभिन्न स्तर पर जज को संबोधित करने के तरीके का वर्णन है। इसके अनुसार उच्च न्यायपालिका के जज को योर ऑनर या ऑनरेबल कोर्ट कहकर संबोधित किया जाना चाहिए और निचली अदालतों के जजों को सर कहकर संबोधित किया जा सकता है। याची ने कहा कि इन नियमों के खिलाफ जज को संबोधित करने के लिए माय लॉर्ड योर लॉर्डशिप संबोधन का प्रयोग किया जा रहा है। नियमों के खिलाफ होने के कारण इस संबोधन का प्रयोग करने वाले वकील के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस हरिंदर सिंह सिद्धू की खंडपीठ ने याची पक्ष की दलील को सुनने के बाद अपने फैसले में कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के पार्ट 4 चैप्टर 3 ए के तहत संबोधन का तो जिक्र है लेकिन इस बात का कहीं उल्लेख नहीं है कि इसकी पालना न करने पर वकील के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे में इस याचिका को आधारहीन मानते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।
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क्या है माय लॉड से जुड़ा विवाद
जज को माय लॉर्ड या योर लॉर्डशिप को लेकर विवाद है। माय लॉर्ड व योर लॉर्डशिप को औपनिवेशिक पदों के अवशेष के रूप में देखा जाता है जो दूसरे शब्दों में गुलामी का प्रतीक है। देश की कई बार काउंसिल प्रस्ताव लाकर यह तय कर चुकी हैं कि जज को यह कहकर संबोधित नहीं करेंगी। मद्रास हाईकोर्ट के जज जस्टिस के चंद्रू ने 2009 में अपनी कोर्ट में माय लॉर्ड संबोधन को बैन कर दिया था। 2014 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एचएल दत्तू व जस्टिस एसए बोबडे ने एडवोकेट शिव सागर तिवारी की जनहित याचिका दाखिल करते हुए कहा था कि माय लॉर्ड, योर लॉर्डशिप संबोधन अनिवार्य नहीं है। यदि सर कहा जाए तो भी मंजूर, योर ऑनर भी मंजूर, माय लॉर्ड भी मंजूर है कोई भी संबोधन हो बस सम्मान के साथ होना चाहिए।
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