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अंकल बैठने घर से दरी लाकर बैठते हैं
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पलवल। अंकल हमारे स्कूल में बैठने को बेंच नहीं है। हम घर से दरी लेकर आते हैं और उसे बिछाकर बैठते हैं। स्कूल में बने कमरों की हालत भी खराब हैं। जिस कारण बरामदे या पेड़ों के नीचे बैठाया जाता है। यह कहना था गांव सुजवाड़ी के राजकीय प्राथमिक स्कूल के बच्चों का। खास बात यह है कि इसके बावजूद इसे शिक्षा विभाग द्वारा मॉडल संस्कृति स्कूल का दर्जा दिया गया है। वहीं सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने इसकी हालत सुधारने के लिए अदालत का सहारा लिया है।
गांव सुजवाड़ी का राजकीय प्राथमिक स्कूल काफी पुराना है। पहली से पांचवीं तक 205 जबकि छठी से आठवीं तक 110 बच्चे पढ़ते हैं। कोरोना महामारी के दौरान स्कूलों को बंद कर दिया गया था। एक साल बाद शुरू हुए इन स्कूलों में पढ़ने आ रहे बच्चे पहले की तरह ही आज भी अपने घरों से बैठने के लिए दरी व बिछावन लेकर आ रहे हैं, ताकि उन्हें बिछाकर उन पर बैठ सकें, क्योंकि स्कूल की तरफ से बच्चों को जमीन पर बैठने के लिए कोई इंतजाम नहीं है। विभाग द्वारा बच्चों के बैठने के लिए जो बैंचें लगवाई गईं थीं, वे स्कूल के एक कमरे में कबाड़ के रूप में पड़ी हैं। जिस कारण बच्चों के बैठने के लिए बेंचों की कोई व्यवस्था नहीं है।
कमरों की हालत भी है बेहद जर्जर
स्कूल में कहने को तो करीब 10 कमरे हैं, लेकिन दो कमरों को छोड़कर सभी की हालत खस्ता है। कमरे पूरी तरह से जर्जर हालत में हैं। उनके अंदर बैठने में भी बच्चों को डर लगता है। इस कारण बच्चों की कक्षाएं स्कूल भवन के बरामदों तथा पेड़ों के नीचे लगाई जाती हैं। खुले आसमान के नीचे धूप व सर्दी में बैठकर बच्चे पढ़ते हैं। बरामदों में तथा पेड़ों के नीचे बैठकर पढ़ने के लिए बच्चों को स्कूल की तरफ से बिछावन तक नहीं दी जाती है।
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वर्जन-
स्कूल में बैठने के लिए जो बेंच हैं, वे टूटी पड़ी हैं। इस कारण उन्हें कमरे में बंद करके रखा हुआ है। हम तो अपने घरों से ही दरी लेकर आते हैं व उस पर बैठकर पढ़ते हैं और छुट्टी के बाद अपने साथ ही ले जाते हैं। कमरों के अंदर बैैठकर पढ़ने से डर लगता है कि कहीं कमरों की छतें न गिर जाएं। - साहिल, छात्र
जमीन पर बैठने कर पढ़ाया जाता है। लेकिन नीचे बिछाने को कुछ नहीं है। इस कारण अपने घर से ही दरी व बोरियां लेकर आते हैं व उन पर बैठकर पढ़ते हैं। स्कूल की तरफ से न तो बेंच हैं बैठने को और न ही दरियां हैं। ठंड हो या गर्मी बाहर ही बैठकर अपनी दरियों, बोरियों को बिछाकर पढ़ना पड़ता है। - नेहा, छात्रा
कमरों में सफेदी चल रही है। इस कारण बाहर बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। बेंचें टूट चुकी हैं। जिनके बारे में अधिकारियों को अवगत कराया हुआ है। कई बार लिखकर नईं बेंचों का इंतजाम कराने की मांग भी की जा चुकी है। जल्द से जल्द बच्चों के बैठने के लिए बैंचों की व्यवस्था कर दी जाएगी। - राम सिंह, मुख्याध्यापक
जिले में केवल सुजवाड़ी ही नहीं आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी में पता चला है कि करीब 61 स्कूलों में 248 कमरों की हालत जर्जर है। बच्चों के बैठने के लिए स्कूलों में बेंच तक नहीं है। बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ने के लिए अपने घरों से दरी व बोरियां लेकर आते हैं। इससे पहले भी जिले के सात स्कूलों में अदालत का सहारा लेकर ही उनका जीर्णोद्धार कराया गया था। - अशोक कुमार अग्रवाल, वकील
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गांव सुजवाड़ी का राजकीय प्राथमिक स्कूल काफी पुराना है। पहली से पांचवीं तक 205 जबकि छठी से आठवीं तक 110 बच्चे पढ़ते हैं। कोरोना महामारी के दौरान स्कूलों को बंद कर दिया गया था। एक साल बाद शुरू हुए इन स्कूलों में पढ़ने आ रहे बच्चे पहले की तरह ही आज भी अपने घरों से बैठने के लिए दरी व बिछावन लेकर आ रहे हैं, ताकि उन्हें बिछाकर उन पर बैठ सकें, क्योंकि स्कूल की तरफ से बच्चों को जमीन पर बैठने के लिए कोई इंतजाम नहीं है। विभाग द्वारा बच्चों के बैठने के लिए जो बैंचें लगवाई गईं थीं, वे स्कूल के एक कमरे में कबाड़ के रूप में पड़ी हैं। जिस कारण बच्चों के बैठने के लिए बेंचों की कोई व्यवस्था नहीं है।
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कमरों की हालत भी है बेहद जर्जर
स्कूल में कहने को तो करीब 10 कमरे हैं, लेकिन दो कमरों को छोड़कर सभी की हालत खस्ता है। कमरे पूरी तरह से जर्जर हालत में हैं। उनके अंदर बैठने में भी बच्चों को डर लगता है। इस कारण बच्चों की कक्षाएं स्कूल भवन के बरामदों तथा पेड़ों के नीचे लगाई जाती हैं। खुले आसमान के नीचे धूप व सर्दी में बैठकर बच्चे पढ़ते हैं। बरामदों में तथा पेड़ों के नीचे बैठकर पढ़ने के लिए बच्चों को स्कूल की तरफ से बिछावन तक नहीं दी जाती है।
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स्कूल में बैठने के लिए जो बेंच हैं, वे टूटी पड़ी हैं। इस कारण उन्हें कमरे में बंद करके रखा हुआ है। हम तो अपने घरों से ही दरी लेकर आते हैं व उस पर बैठकर पढ़ते हैं और छुट्टी के बाद अपने साथ ही ले जाते हैं। कमरों के अंदर बैैठकर पढ़ने से डर लगता है कि कहीं कमरों की छतें न गिर जाएं। - साहिल, छात्र
जमीन पर बैठने कर पढ़ाया जाता है। लेकिन नीचे बिछाने को कुछ नहीं है। इस कारण अपने घर से ही दरी व बोरियां लेकर आते हैं व उन पर बैठकर पढ़ते हैं। स्कूल की तरफ से न तो बेंच हैं बैठने को और न ही दरियां हैं। ठंड हो या गर्मी बाहर ही बैठकर अपनी दरियों, बोरियों को बिछाकर पढ़ना पड़ता है। - नेहा, छात्रा
कमरों में सफेदी चल रही है। इस कारण बाहर बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। बेंचें टूट चुकी हैं। जिनके बारे में अधिकारियों को अवगत कराया हुआ है। कई बार लिखकर नईं बेंचों का इंतजाम कराने की मांग भी की जा चुकी है। जल्द से जल्द बच्चों के बैठने के लिए बैंचों की व्यवस्था कर दी जाएगी। - राम सिंह, मुख्याध्यापक
जिले में केवल सुजवाड़ी ही नहीं आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी में पता चला है कि करीब 61 स्कूलों में 248 कमरों की हालत जर्जर है। बच्चों के बैठने के लिए स्कूलों में बेंच तक नहीं है। बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ने के लिए अपने घरों से दरी व बोरियां लेकर आते हैं। इससे पहले भी जिले के सात स्कूलों में अदालत का सहारा लेकर ही उनका जीर्णोद्धार कराया गया था। - अशोक कुमार अग्रवाल, वकील