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मदर्स डे विशेष : पति की मृत्यु के बाद भी नहीं टूटी हिम्मत, सीमित संसाधनों के बावजूद मां बनीं सहारा
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- आशा रावत ने अपने पति की मौत के बाद भी न सिर्फ अपना घर संभाला बल्कि दो बच्चों को पढ़ाया लिखाया
निशांत पटेल
पलवल। मां से बड़ा शब्द दुनिया में कोई नहीं है। एक मां का अपने बच्चों के प्रति जो निस्वार्थ प्रेम होता है उसकी तुलना किसी और चीज से नहीं की जा सकती है। 12 मई को मदर्स डे मनाया जा रहा है। महिलाओं का अपने बच्चों और परिवार के लिए संघर्ष समाज को यह सिखाता है कि ममता, साहस और जिम्मेदारी उम्र या शिक्षा की मोहताज नहीं होती। इस अवसर पर एक ऐसे ही मां की बात करने वाले हैं पति की मौत के बाद भी न सिर्फ अपना घर संभाला बल्कि 2 बच्चों को पढ़ाया लिखाया।
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हम बात कर रहे हैं पलवल के पटवारी कॉलोनी निवासी आशा रावत की, जो मां और कर्मठ महिला दोनों का रूप एक साथ जी रही हैं। वह नागरिक अस्पताल में स्थित वन स्टॉप सेंटर में मल्टीपर्पज वर्कर के रूप में कार्यरत हैं। पति दलवीर रावत का देहांत वर्ष 2014 में हो गया, जो प्राइवेट जॉब करके घर चलाते थे, लेकिन आशा ने जीवन की चुनौतियों के सामने हार नहीं मानी। पति के निधन के बाद जब पूरा परिवार टूटने की कगार पर था, आशा ने अपने बच्चों के भविष्य को संवारने का निश्चय किया। उन्होंने अपने पति की मौत के बाद भी न सिर्फ अपना घर संभाला बल्कि 2 बच्चों को पढ़ाया लिखाया। इसमें से अभी बेटी उपासना (25) अभी पीएचडी कर रही हैं, साथ ही बेटा मोहित (24) एमसीए (स्नातकोत्तर कंप्यूटर में) कर रहा है। उन्होंने परिवार को चलाने के लिए डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड क्रेच सेंटर में नौकरी से शुरुआत की और आज वह वन स्टॉप सेंटर पलवल में मल्टीपर्पज वर्कर के रूप में कार्य कर रही हैं। आशा रावत जैसी माताएं आज के समाज के लिए प्रेरणा की मिसाल हैं। उन्होंने न केवल अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई, बल्कि खुद भी आत्मनिर्भर बनकर महिला सशक्तिकरण का उदाहरण पेश किया।
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70 साल की दादी सुखदेई बनीं 10 वर्षीय नाती सतवान की मां
मां सिर्फ जन्म देने वाली नहीं होती, कई बार वह दादी के रूप में भी मां की भूमिका निभाती है। ऐसा ही उदाहरण है 70 वर्षीय सुखदेई देवी का, जो अपने 10 साल के नाती, जो ऑटिज्म से ग्रसित था, के लिए न सिर्फ मां बनीं, बल्कि हर पड़ाव पर नाती का साथ दिया। सुखदेई देवी पलवल के धौलागढ़ क्षेत्र की रहने वाली हैं। उनके पति नहीं हैं और बेटा जिसके बेटे की वे देखभाल कर रही हैं, वह भी इस दुनिया में नहीं है। इस मासूम बच्चे के माता-पिता दोनों नहीं हैं, लेकिन दादी ने हार नहीं मानी। कम पढ़ी लिखी और अपने सीमित संसाधनों के बावजूद सुखदेई देवी ने अपने नाती सतवान को दिल्ली के बड़े अस्पतालों तक इलाज के लिए अकेले पहुंचाया। डीईआइसी के माध्यम से श्रोफ आई सेंटर दिल्ली में आंखों की दिक्कत का फ्री इलाज कराया। साथ ही सुखदेई देवी ने खुद अनपढ़ होने के बावजूद नाती के इलाज और पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी संग बच्चे को संभाल रही हैं।
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निशांत पटेल
पलवल। मां से बड़ा शब्द दुनिया में कोई नहीं है। एक मां का अपने बच्चों के प्रति जो निस्वार्थ प्रेम होता है उसकी तुलना किसी और चीज से नहीं की जा सकती है। 12 मई को मदर्स डे मनाया जा रहा है। महिलाओं का अपने बच्चों और परिवार के लिए संघर्ष समाज को यह सिखाता है कि ममता, साहस और जिम्मेदारी उम्र या शिक्षा की मोहताज नहीं होती। इस अवसर पर एक ऐसे ही मां की बात करने वाले हैं पति की मौत के बाद भी न सिर्फ अपना घर संभाला बल्कि 2 बच्चों को पढ़ाया लिखाया।
हम बात कर रहे हैं पलवल के पटवारी कॉलोनी निवासी आशा रावत की, जो मां और कर्मठ महिला दोनों का रूप एक साथ जी रही हैं। वह नागरिक अस्पताल में स्थित वन स्टॉप सेंटर में मल्टीपर्पज वर्कर के रूप में कार्यरत हैं। पति दलवीर रावत का देहांत वर्ष 2014 में हो गया, जो प्राइवेट जॉब करके घर चलाते थे, लेकिन आशा ने जीवन की चुनौतियों के सामने हार नहीं मानी। पति के निधन के बाद जब पूरा परिवार टूटने की कगार पर था, आशा ने अपने बच्चों के भविष्य को संवारने का निश्चय किया। उन्होंने अपने पति की मौत के बाद भी न सिर्फ अपना घर संभाला बल्कि 2 बच्चों को पढ़ाया लिखाया। इसमें से अभी बेटी उपासना (25) अभी पीएचडी कर रही हैं, साथ ही बेटा मोहित (24) एमसीए (स्नातकोत्तर कंप्यूटर में) कर रहा है। उन्होंने परिवार को चलाने के लिए डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड क्रेच सेंटर में नौकरी से शुरुआत की और आज वह वन स्टॉप सेंटर पलवल में मल्टीपर्पज वर्कर के रूप में कार्य कर रही हैं। आशा रावत जैसी माताएं आज के समाज के लिए प्रेरणा की मिसाल हैं। उन्होंने न केवल अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई, बल्कि खुद भी आत्मनिर्भर बनकर महिला सशक्तिकरण का उदाहरण पेश किया।
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70 साल की दादी सुखदेई बनीं 10 वर्षीय नाती सतवान की मां
मां सिर्फ जन्म देने वाली नहीं होती, कई बार वह दादी के रूप में भी मां की भूमिका निभाती है। ऐसा ही उदाहरण है 70 वर्षीय सुखदेई देवी का, जो अपने 10 साल के नाती, जो ऑटिज्म से ग्रसित था, के लिए न सिर्फ मां बनीं, बल्कि हर पड़ाव पर नाती का साथ दिया। सुखदेई देवी पलवल के धौलागढ़ क्षेत्र की रहने वाली हैं। उनके पति नहीं हैं और बेटा जिसके बेटे की वे देखभाल कर रही हैं, वह भी इस दुनिया में नहीं है। इस मासूम बच्चे के माता-पिता दोनों नहीं हैं, लेकिन दादी ने हार नहीं मानी। कम पढ़ी लिखी और अपने सीमित संसाधनों के बावजूद सुखदेई देवी ने अपने नाती सतवान को दिल्ली के बड़े अस्पतालों तक इलाज के लिए अकेले पहुंचाया। डीईआइसी के माध्यम से श्रोफ आई सेंटर दिल्ली में आंखों की दिक्कत का फ्री इलाज कराया। साथ ही सुखदेई देवी ने खुद अनपढ़ होने के बावजूद नाती के इलाज और पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी संग बच्चे को संभाल रही हैं।
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