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Palwal News: बिना रखरखाव के सूखे लाखों पेड़, नशेड़ियों का अड्डा बना पार्क
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अनूप पाराशर
पलवल। दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में आए दिन बढ़ रहे प्रदूषण को कम कर लोगों को राहत दिलाने के लिए देश के सबसे बड़े एक्सप्रेसवे के साथ-साथ लगाए गए पौधे रखरखाव के अभाव में सूख गए हैं। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सरकार की ओर से लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद लोगों को इनका लाभ नहीं मिल पाया। केएमपी-केजीपी एक्सप्रेसवे के साथ लगाए गए एक लाख से ज्यादा पौधे बिना रखरखाव के सूख गए हैं। इतना ही नहीं दोनों एक्सप्रेसवे के डिवाइडर पर लगाए गए फूलों के पौधे भी गर्मी के कारण दम तोड़ दिए। इसके बावजूद इस तरफ न तो राजमार्ग प्राधिकरण का ध्यान है और न ही वन विभाग का। इतना ही नहीं केजीपी-केएमपी इंटरचेंज को हरा-भरा रखने व लोगों को बेहतर माहौल देने के लिए बनाए गए पार्कों में लगे पेड़-पौधे भी पूरी तरह से बिना रखरखाव के खत्म हो गए हैं। कोई देखकर भी नहीं कह सकता कि यहां पार्कों का निर्माण किया गया था। इतना ही नहीं पार्क नशेबाजों का अड्डा बनकर रह गए।
केएमपी पर 2016 में लगाए गए थे पौधे
केंद्र सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट ईस्टर्न-वेस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के तहत पांच अप्रैल 2016 को कुंडली से मानेसर एक्सप्रेसवे का शुभारंभ हुडा सेक्टर-दो में आयोजित जनसभा में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया था। शुभारंभ के साथ ही पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए केएमपी के दोनों तरफ 40 हजार पौधे लगाए गए थे लेकिन पानी व रखरखाव के अभाव में एक भी पौधा नहीं पनपा। इसके बाद मई 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैराना से 135 किलोमीटर लंबे केजीपी का शुभारंभ किया। शुभारंभ के साथ ही एक्सप्रेसवे को हरा-भरा बनाने का अभियान भी शुरू किया गया था। इसके तहत लाखों पेड़ लगाए गए, जो बिना रखरखाव व गर्मी की तपिश में सूख गए।
पार्कों में लगे पेड़ भी सूखकर खत्म हो गए
राष्ट्रीय राजमार्ग पर पलवल के नजदीक केएमपी-केजीपी के सबसे बड़े इंटरचेंज पर बनाए गए पार्कों में लगाए पौधे भी सूख कर खत्म हो गए। जहां हरे-भरे पार्क होने चाहिए थे, वहां आज खल्लर जमीन दिखाई देती है। चारों तरफ से लोहे की ग्रिलों से घिरे इन पार्कों में न तो अब घास है और न ही हरे-भरे पेड़ हैं। इन पार्कों में लगाए गए फव्वारे आज कर कभी नहीं चले। इन दोनों इंटरचेंज पर करीब 18 पार्क बनाने की योजना थी, जिनमें से चार पार्कों का निर्माण भी किया गया व बाकी छोटे 14 पार्क बनाए जाने थे, जो आज तक विकसित नहीं हो पाए।
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नशा करने के स्थान बन गए ये पार्क
हालात ये हैं कि अब ये पार्क न होकर नशेबाजों के अड्डे बन गए हैं। जहां शाम ढलते ही नशेबाज शराब, सुल्फा, गांजा, चरस आदि का सेवन करते हैं। इतना ही नहीं नशे के इंजेक्शन लगाने के लिए भी नशेबाज शाम ढलते ही यहां पहुंच जाते हैं। देर रात तक यहां नशेबाज नशा करते हैं। वे यहां थोड़े बहुत बचे पेड़-पौधों को नशे की हालत में उजाड़ देते हैं, लेकिन इस तरफ किसी का ध्यान नहीं है।
जिले को हरा भरा बनाने के लिए कराई गई थी पेड़ों की गणना
जिले को हरा भरा बनाने के लिए पेड़ों की गणना कराई गई, ताकि पता लगाया जा सके कि जिले में कहां कितने पेड़ों की आवश्यकता है। इसके लिए अक्तूबर 2022 से पेड़ों की गणना का कार्य शुरू किया गया। जो करीब एक साल तक चला। इसके तहत जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में करीब एक लाख पेड़ो की गणना भी की गई। उसके बाद गणना का कार्य बंद कर दिया गया। शहरी क्षेत्र में एक भी पेड़ की गणना नहीं की गई। इससे वन विभाग का जिले में कहां-कितने पेड़ हैं तथा कहां पेड़ों को लगाने की जरूरत है, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सका और सरकार की जिले को हरा-भरा बनाने की योजना भी अधर में लटक गई।
क्या कहते हैं पर्यावरणविद
पर्यावरणविद डॉ. महावीर सिंह मलिक के अनुसार पलवल जिले में बारिश का स्तर निरंतर घटता जा रहा है। इसका मुख्य कारण पौधों की कमी है। जिले के अंदर वन क्षेत्र घटता जा रहा है और कंकरीट का जंगल खड़ा होता जा रहा है। बारिश की कमी से जहां जलस्तर नीचे चला गया है, वहीं पर्यावरण भी असंतुलित होता जा रहा है। ऐसे में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने की जरूरत है। ताकि जिले को हरा-भरा बनाया जा सके।
पर्यावरणविद हरेंद्र सिंह का कहना है कि वन विभाग में पानी के टैंकर, ट्रैक्टर आदि तो हैं लेकिन पेड़ों को हरा-भरा रखने के लिए पानी देने की व्यवस्था नहीं है। सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए।
वन विभाग के रेंज अधिकारी नरेश रंगा का कहना है कि जिले में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया है। सामाजिक संस्थाओं का सहयोग लिया जाएगा व विभाग की तरफ से भी इस तरफ पूरा ध्यान दिया जाएगा। पेड़ों को पानी देने की व्यवस्था की गई है। पार्कों की देखरेख की जिम्मेदारी वहां की एसोसिएशन की है। सड़कों पर लगे पेड़-पौधों की देखभाल व रखरखाव पूरा कराया जाएगा।
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पलवल। दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में आए दिन बढ़ रहे प्रदूषण को कम कर लोगों को राहत दिलाने के लिए देश के सबसे बड़े एक्सप्रेसवे के साथ-साथ लगाए गए पौधे रखरखाव के अभाव में सूख गए हैं। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सरकार की ओर से लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद लोगों को इनका लाभ नहीं मिल पाया। केएमपी-केजीपी एक्सप्रेसवे के साथ लगाए गए एक लाख से ज्यादा पौधे बिना रखरखाव के सूख गए हैं। इतना ही नहीं दोनों एक्सप्रेसवे के डिवाइडर पर लगाए गए फूलों के पौधे भी गर्मी के कारण दम तोड़ दिए। इसके बावजूद इस तरफ न तो राजमार्ग प्राधिकरण का ध्यान है और न ही वन विभाग का। इतना ही नहीं केजीपी-केएमपी इंटरचेंज को हरा-भरा रखने व लोगों को बेहतर माहौल देने के लिए बनाए गए पार्कों में लगे पेड़-पौधे भी पूरी तरह से बिना रखरखाव के खत्म हो गए हैं। कोई देखकर भी नहीं कह सकता कि यहां पार्कों का निर्माण किया गया था। इतना ही नहीं पार्क नशेबाजों का अड्डा बनकर रह गए।
केएमपी पर 2016 में लगाए गए थे पौधे
केंद्र सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट ईस्टर्न-वेस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के तहत पांच अप्रैल 2016 को कुंडली से मानेसर एक्सप्रेसवे का शुभारंभ हुडा सेक्टर-दो में आयोजित जनसभा में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया था। शुभारंभ के साथ ही पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए केएमपी के दोनों तरफ 40 हजार पौधे लगाए गए थे लेकिन पानी व रखरखाव के अभाव में एक भी पौधा नहीं पनपा। इसके बाद मई 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैराना से 135 किलोमीटर लंबे केजीपी का शुभारंभ किया। शुभारंभ के साथ ही एक्सप्रेसवे को हरा-भरा बनाने का अभियान भी शुरू किया गया था। इसके तहत लाखों पेड़ लगाए गए, जो बिना रखरखाव व गर्मी की तपिश में सूख गए।
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पार्कों में लगे पेड़ भी सूखकर खत्म हो गए
राष्ट्रीय राजमार्ग पर पलवल के नजदीक केएमपी-केजीपी के सबसे बड़े इंटरचेंज पर बनाए गए पार्कों में लगाए पौधे भी सूख कर खत्म हो गए। जहां हरे-भरे पार्क होने चाहिए थे, वहां आज खल्लर जमीन दिखाई देती है। चारों तरफ से लोहे की ग्रिलों से घिरे इन पार्कों में न तो अब घास है और न ही हरे-भरे पेड़ हैं। इन पार्कों में लगाए गए फव्वारे आज कर कभी नहीं चले। इन दोनों इंटरचेंज पर करीब 18 पार्क बनाने की योजना थी, जिनमें से चार पार्कों का निर्माण भी किया गया व बाकी छोटे 14 पार्क बनाए जाने थे, जो आज तक विकसित नहीं हो पाए।
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नशा करने के स्थान बन गए ये पार्क
हालात ये हैं कि अब ये पार्क न होकर नशेबाजों के अड्डे बन गए हैं। जहां शाम ढलते ही नशेबाज शराब, सुल्फा, गांजा, चरस आदि का सेवन करते हैं। इतना ही नहीं नशे के इंजेक्शन लगाने के लिए भी नशेबाज शाम ढलते ही यहां पहुंच जाते हैं। देर रात तक यहां नशेबाज नशा करते हैं। वे यहां थोड़े बहुत बचे पेड़-पौधों को नशे की हालत में उजाड़ देते हैं, लेकिन इस तरफ किसी का ध्यान नहीं है।
जिले को हरा भरा बनाने के लिए कराई गई थी पेड़ों की गणना
जिले को हरा भरा बनाने के लिए पेड़ों की गणना कराई गई, ताकि पता लगाया जा सके कि जिले में कहां कितने पेड़ों की आवश्यकता है। इसके लिए अक्तूबर 2022 से पेड़ों की गणना का कार्य शुरू किया गया। जो करीब एक साल तक चला। इसके तहत जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में करीब एक लाख पेड़ो की गणना भी की गई। उसके बाद गणना का कार्य बंद कर दिया गया। शहरी क्षेत्र में एक भी पेड़ की गणना नहीं की गई। इससे वन विभाग का जिले में कहां-कितने पेड़ हैं तथा कहां पेड़ों को लगाने की जरूरत है, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सका और सरकार की जिले को हरा-भरा बनाने की योजना भी अधर में लटक गई।
क्या कहते हैं पर्यावरणविद
पर्यावरणविद डॉ. महावीर सिंह मलिक के अनुसार पलवल जिले में बारिश का स्तर निरंतर घटता जा रहा है। इसका मुख्य कारण पौधों की कमी है। जिले के अंदर वन क्षेत्र घटता जा रहा है और कंकरीट का जंगल खड़ा होता जा रहा है। बारिश की कमी से जहां जलस्तर नीचे चला गया है, वहीं पर्यावरण भी असंतुलित होता जा रहा है। ऐसे में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने की जरूरत है। ताकि जिले को हरा-भरा बनाया जा सके।
पर्यावरणविद हरेंद्र सिंह का कहना है कि वन विभाग में पानी के टैंकर, ट्रैक्टर आदि तो हैं लेकिन पेड़ों को हरा-भरा रखने के लिए पानी देने की व्यवस्था नहीं है। सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए।
वन विभाग के रेंज अधिकारी नरेश रंगा का कहना है कि जिले में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया है। सामाजिक संस्थाओं का सहयोग लिया जाएगा व विभाग की तरफ से भी इस तरफ पूरा ध्यान दिया जाएगा। पेड़ों को पानी देने की व्यवस्था की गई है। पार्कों की देखरेख की जिम्मेदारी वहां की एसोसिएशन की है। सड़कों पर लगे पेड़-पौधों की देखभाल व रखरखाव पूरा कराया जाएगा।