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Mahendragarh-Narnaul News: अपनों की उपेक्षा ने भटकते-भटकते पहुंचाया बिहार से अटेली

Sun, 14 Jun 2026 11:24 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sun, 14 Jun 2026 11:24 PM IST
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Neglect by loved ones led to a wandering journey from Bihar to Ateli.
फोटो 80अमर सिंह
मंडी अटेली। लगभग पांच वर्ष पूर्व गांव भोजावास के पास सड़क पर एक शख्स दयनीय हालत में मिला। उस समय उनके बिखरे बाल, बढ़े नाखून और हालात एकदम दयनीय थी। नाम पूछने पर सिर्फ मुख्त्यार, दरभंगा ही बता पाए और उस दौरान वह भूख से व्याकुल थे।
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उनको शांतिकुंज मोड़ी आश्रम लाया गया। स्नान, भोजन, साफ कपड़े, डॉक्टर देखभाल और सुरक्षित आश्रय दिया गया। एक महीने की देखभाल के बाद वे स्वस्थ हो गए और आत्मनिर्भर बनकर शांतिकुंज आश्रम अटेली-बेगपुर की दिनचर्या में सक्रिय भाग ले रहे हैं।
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मुख्त्यार से हुई बातचीत से जो सच सामने आया, वह शरीर के जख्मों से ज्यादा गहरा था। उनका दरभंगा में परिवार है लेकिन बीमारी और मानसिक असंतुलन के बाद धीरे-धीरे परिवार ने दूरी बना ली।
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शुरुआत में दवा-इलाज हुआ...पर जैसे-जैसे स्थिति बिगड़ी तो अपनापन भी घटता गया। ताने, उपेक्षा और अंततः तिरस्कार का सामना करना पड़ा। खाना-कपड़ा भी समय पर मिलना बंद हो गया। घर की चहारदीवारी में ही वे अजनबी बन गए।
एक दिन मानसिक उलझन में वे घर से निकल पड़े। न कोई रोकने आया, न खोजने। सैकड़ों किलोमीटर भटकते हुए वे दरभंगा से भोजावास तक पहुंच गए। शरीर तो मैला था ही लेकिन दिल अपनों की ओर से ठुकराए जाने का अपार दर्द भी था।

शांतिकुंज प्रभुद्ध निवास आश्रम में उन्हें पहली बार बिना शर्त स्वीकारा गया। यहां न बीमारी देखी गई, न अतीत पूछा गया। सिर्फ एक इंसान को इंसान की तरह गले लगाया गया।

आज मुख्त्यार कहते हैं कि यहां सब अपने हैं। वे समय पर उठते हैं, प्रार्थना करते हैं और आश्रम में काम करते हैं। उनके चेहरे की हंसी बताती है कि सम्मान की एक रोटी, उपेक्षा के महल से कहीं ज्यादा बेहतर होती है।

आश्रम के संचालक पवन राठौड़ का कहना है कि जब हम उन्हें लाए थे, तब वे इंसान की परछाई मात्र थे। हमने सिर्फ उनका शरीर नहीं संभाला, उनके टूटे हुए विश्वास को जोड़ा है। असली बीमारी तन की नहीं, मन की उपेक्षा है।

आश्रम में हम पुनर्वास नहीं करते, परिवार देते हैं। मुख्त्यार अब हमारे परिवार का हिस्सा हैं लेकिन हमारा प्रयास रहेगा कि उनके दरभंगा वाले परिवार से संपर्क हो। क्योंकि सेवा की सार्थकता तभी है जब बिछड़ा हुआ व्यक्ति अपने घर तक पहुंचे।
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