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Mahendragarh-Narnaul News: समावेशी विकास पर मंथन, सीयूएच की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में 171 शोध-पत्र प्रस्तुत
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फोटो संख्या:65 अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र में उपस्थित विशेषज्ञ, आयोजक एवं प्रतिभागी--
महेंद्रगढ़। हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग ने एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सोमवार को समापन हुआ। यह संगोष्ठी भारतीय समाजशास्त्रीय सोसाइटी के सहयोग से हुई थी। इसे भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद ने प्रायोजित किया था।
दो दिवसीय इस संगोष्ठी का विषय ''समावेशी विकास, सामाजिक परिवर्तन एवं संस्थागत सुदृढ़ता विकसित भारत 2047 की दिशा में भारत की यात्रा'' था। इसमें भारत और विदेशों से 171 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। इनमें 31 ऑफलाइन और 140 ऑनलाइन प्रस्तुतियां शामिल थीं। देश-विदेश के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं ने भाग लिया। विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भी सहभागिता की। उन्होंने विकसित भारत 2047 की दिशा में गहन विचार-विमर्श किया।
मुख्य वक्ता राजेश गिल ने प्रमुख सामाजिक मुद्दों का विश्लेषण किया। उन्होंने युवाओं का पलायन और महिला सशक्तीकरण पर बात की। बदलते अकादमिक रोजगार परिदृश्य भी उनके विश्लेषण का हिस्सा था। अपने 34 वर्षों के अनुभव से उन्होंने कहा कि सार्थक परिवर्तन के लिए संवाद, शोध और नीतिगत सुधार जरूरी हैं। ऐसी संगोष्ठियां चुनौतियों के समाधान के लिए महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती हैं।
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समापन अवसर पर संगोष्ठी के संयोजक डॉ. टी. लोंगकोई खियामनिउंगन, सह-संयोजक डॉ. तन्वी भाटी तथा आयोजन समिति के सदस्यों डॉ. युधवीर, डॉ. कश्मीरा खानम और डॉ. सोमचंद ने विश्वविद्यालय प्रशासन, आईसीएसएसआर, भारतीय समाजशास्त्रीय सोसाइटी, वक्ताओं, प्रतिभागियों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों का आभार व्यक्त किया।
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दो दिवसीय इस संगोष्ठी का विषय ''समावेशी विकास, सामाजिक परिवर्तन एवं संस्थागत सुदृढ़ता विकसित भारत 2047 की दिशा में भारत की यात्रा'' था। इसमें भारत और विदेशों से 171 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। इनमें 31 ऑफलाइन और 140 ऑनलाइन प्रस्तुतियां शामिल थीं। देश-विदेश के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं ने भाग लिया। विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भी सहभागिता की। उन्होंने विकसित भारत 2047 की दिशा में गहन विचार-विमर्श किया।
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मुख्य वक्ता राजेश गिल ने प्रमुख सामाजिक मुद्दों का विश्लेषण किया। उन्होंने युवाओं का पलायन और महिला सशक्तीकरण पर बात की। बदलते अकादमिक रोजगार परिदृश्य भी उनके विश्लेषण का हिस्सा था। अपने 34 वर्षों के अनुभव से उन्होंने कहा कि सार्थक परिवर्तन के लिए संवाद, शोध और नीतिगत सुधार जरूरी हैं। ऐसी संगोष्ठियां चुनौतियों के समाधान के लिए महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती हैं।
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समापन अवसर पर संगोष्ठी के संयोजक डॉ. टी. लोंगकोई खियामनिउंगन, सह-संयोजक डॉ. तन्वी भाटी तथा आयोजन समिति के सदस्यों डॉ. युधवीर, डॉ. कश्मीरा खानम और डॉ. सोमचंद ने विश्वविद्यालय प्रशासन, आईसीएसएसआर, भारतीय समाजशास्त्रीय सोसाइटी, वक्ताओं, प्रतिभागियों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों का आभार व्यक्त किया।