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दिखावे की चकाचौंध से प्राणी भटक रहा धर्ममार्ग से
Updated Sat, 29 Jul 2017 12:27 AM IST
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दिखावे की चकाचौंध से धर्म मार्ग से भटक रहा प्राणी
अमर उजाला ब्यूरो
नारनौल। धर्म मुनि महाराज ने कहा कि इंद्रियों के सुख छोड़ने वाला प्राणी अरिहंत बन सकता है। इंद्रियों के गुलाम बने रहने से धर्म नहीं हो सकता। धार्मिक प्राणी को इंद्रियों को वश में करना ही होगा। वे शुक्रवार को मानक चौक स्थित स्थानक भवन में प्रवचन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि संसार में गुणीजन निरंतर घटते जा रहे हैं और स्वार्थी बढ़ते जा रहे हैं। दिखावे की चकाचौंध में प्राणी धर्म के मार्ग से भटक जाता है। सांसारिक प्राणी पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि पेट भरने के फेर में लगा हुआ है। दिन रात द्रव्य पदार्थों के उपार्जन में लगा हुआ है। साधु संगति से उसे कुछ लेना-देना ही नहीं है। उन्होंने कहा कि ज्ञानी लोगों के सामने मत्था टेकने से पाप कर्म का क्षय होता है। इसलिए जब भी समय मिले उनके दर्शन लाभ लेने चाहिए। जैन संत ने कहा कि पहले के प्राणी की उम्र बहुत ज्यादा होती थी। अब अल्प आयु में ही मौत हो जाती है। इसका कारण तनाव है। इस वजह से अनेक बीमारियां उसे घेरकर अकाल मौत की ओर धकेल रही हैं। कहा कि लक्ष्मी के लालच में प्राणी खाना तक छोड़ देता है। उसे समय ही नहीं मिलता कि वो शांतिपूर्वक खाना खा सके। उन्होंने कहा कि आत्मा का स्वभाव निरआहार है। मन, वचन और काया की एकात्मकता से आत्मा मोक्ष गामी बन जाती है। इसलिए आत्मा के मूल धर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम अपनी भूख मिटाने के लिए निरअपराध जीवों की हत्या करते हैं। यह धर्म के खिलाफ है। ऐसे प्राणी को त्रियंच गति में जाना पड़ेगा। इसलिए अभी भी समय है मांसाहार, पान, बीड़ी, सिगरेट और शराब के सेवन से छुटकारा पाकर प्राणी उज्ज्वल मार्ग गामी बन सकता है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नारनौल। धर्म मुनि महाराज ने कहा कि इंद्रियों के सुख छोड़ने वाला प्राणी अरिहंत बन सकता है। इंद्रियों के गुलाम बने रहने से धर्म नहीं हो सकता। धार्मिक प्राणी को इंद्रियों को वश में करना ही होगा। वे शुक्रवार को मानक चौक स्थित स्थानक भवन में प्रवचन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि संसार में गुणीजन निरंतर घटते जा रहे हैं और स्वार्थी बढ़ते जा रहे हैं। दिखावे की चकाचौंध में प्राणी धर्म के मार्ग से भटक जाता है। सांसारिक प्राणी पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि पेट भरने के फेर में लगा हुआ है। दिन रात द्रव्य पदार्थों के उपार्जन में लगा हुआ है। साधु संगति से उसे कुछ लेना-देना ही नहीं है। उन्होंने कहा कि ज्ञानी लोगों के सामने मत्था टेकने से पाप कर्म का क्षय होता है। इसलिए जब भी समय मिले उनके दर्शन लाभ लेने चाहिए। जैन संत ने कहा कि पहले के प्राणी की उम्र बहुत ज्यादा होती थी। अब अल्प आयु में ही मौत हो जाती है। इसका कारण तनाव है। इस वजह से अनेक बीमारियां उसे घेरकर अकाल मौत की ओर धकेल रही हैं। कहा कि लक्ष्मी के लालच में प्राणी खाना तक छोड़ देता है। उसे समय ही नहीं मिलता कि वो शांतिपूर्वक खाना खा सके। उन्होंने कहा कि आत्मा का स्वभाव निरआहार है। मन, वचन और काया की एकात्मकता से आत्मा मोक्ष गामी बन जाती है। इसलिए आत्मा के मूल धर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम अपनी भूख मिटाने के लिए निरअपराध जीवों की हत्या करते हैं। यह धर्म के खिलाफ है। ऐसे प्राणी को त्रियंच गति में जाना पड़ेगा। इसलिए अभी भी समय है मांसाहार, पान, बीड़ी, सिगरेट और शराब के सेवन से छुटकारा पाकर प्राणी उज्ज्वल मार्ग गामी बन सकता है।
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