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सड़कों पर दौड़ रही बेटियां सरकार की खेल नीति की खोल रही हैं पोल

Updated Sun, 14 Jan 2018 12:41 AM IST
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प्रदीप शर्मा
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महेंद्रगढ़। भले प्रदेश सरकार खिलाड़ियों के लिए अच्छी खेल सुविधा देने का दावा करे, किंतु हकीकत कुछ और ही है। गांव जाटवास में ट्रैक के अभाव में सड़कों पर दौड़ रही बेटियां सरकार के दावों की पोल खोल रही हैं। गांव के खिलाड़ी सुविधाओं के अभाव में खेल छोड़ रहे हैं। गांव में 2010 से स्टेडियम प्रस्तावित है। पंचायत की ओर से सभी कार्रवाई पूरी कर जिला खेल विभाग को सौंप देने के सात वर्ष बाद भी स्टेडियम नहीं बन पाया है। जिस कारण बेेटे एवं बेटियों को सड़कों पर दौड़ना पड़ रहा है। इन बेटियों ने सुविधाओं के अभाव में खेल छोड़कर पुलिस में भर्ती होने का मन बना लिया है। उन्होंने कहा कि अगर खेल सुविधा उन्हें मिलती तो वो भी साक्षी मलिक एवं पीवी सिंधू की तरह देश का नाम रोशन करती। किंतु सरकार की ओर से उनके गांव में तो क्या जिले में पूरी सुविधा नहीं है। न तो खेलों के पूरे सामान हैं और न ही कोच हैं।

डेढ वर्ष पहले हो चुका है एक्सीडेंट
खिलाड़ी मोनिका शर्मा ने बताया कि सुबह धुंध होने की वजह से सड़क पर दौड़ना बहुत खतरनाक होता है। डेढ़ वर्ष पहले इसी रोड़ पर एक्सीडेंट भी हो गया था, जिसमें दो लोगों की मौत भी हो गई थी। एक्सीडेंट के चलते उनके परिजन उन्हें दौड़ने से मना करते हैं जबकि गांव में ट्रैक की सुविधा नहीं है। युवा आसपास के मैदान में जाकर दौड़ लगा लेते हैं।


2010 में हुआ था प्रस्ताव:
खेल विभाग से मिली जानकारी के अनुसार पंचायत ने 45600 रुपये की राशि तथा जमाबंदी, प्रस्ताव आदि जिला खेल विभाग के पास जमा करवा दिया था। विभाग ने अपने खेल विभाग के निदेशक को सभी दस्तावेज भेज दिए थे। उसी दौरान कमिश्नर ने चंडीगढ़ में मीटिंग ली थी। मीटिंग में फैसला लिया गया था कि ये स्टेडियम पंचायती राज विकास विभाग द्वारा बनवाए जाएंगे।

बाक्सिंग में स्टेट लेवल पर खेल चुकी हूं। राज्य स्तर पर 1 गोल्ड तथा 1 सिल्वर मेडल भी जीता था। अब सुविधा के अभाव में खेल छोड़ना पड़ेगा। गांव में स्टेडियम में नहीं होने के कारण सड़कों पर ही दौड़ना पड़ता है। - लक्ष्मी दीक्षित।

मैं स्कूल लेवल पर एथलेटिक्स खेल चुकी हूं। अब मैं हरियाणा एवं राजस्थान पुलिस की तैयारी कर रही हूं। केवल स्टेडियम से बात नहीं बनेगी अच्छे खेल सुविधा भी होनी चाहिए। - मोनिका शर्मा।

मैं वालीबॉल जिला स्तर तक खेल चुकी हूं। गांव में स्टेडियम के अभाव में प्रेक्टिस नहीं हुई और खेल छोड़ना पड़ा। अब 12वीं कक्षा की छात्रा हूं और राजस्थान पुलिस की तैयारी कर रही हूं। सुविधा मिलें तो हम भी मेडल ला सकती हैं। - मुस्कान

मैं पहले बाक्सिंग खेलता था और स्टेट लेवल तक पहुंचा था। उसके बाद एकेडमी में फीस बढ़ा दी। आर्थिक तंगी के चलते परिजनों ने खेलने से मना कर दिया। गांव में खेल सुविधा नहीं होने के चलते खेल छोड़ना पड़ा। - गोविंद

हमारे क्षेत्र में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। यहां कमी है तो खेल सुविधाओं की। अभी तक जितने खिलाड़ी नेशनल लेवल तक पहुंचे हैं वो बाहर एकेडमी में तैयारी कर पहुंचे हैं। जिले में न तो कोच हैं और न अच्छी खेल सुविधा। फिर कैसे हमारे इलाके के खिलाड़ी आगे बढे़ंगे। - मनीष यादव, बाक्सर, सिलेक्शन इन कॉमनवेल्थ।

केवल स्टेडियम से ही काम नहीं चलेगा पूरी खेल सुविधा यहां होनी चाहिए। ताकि क्षेत्र के खिलाड़ी उसका लाभ उठा सकें। गरीब खिलाड़ी पैसों के अभाव में बाहर नहीं जा सकते। मजबूरी में उन्हें खेल छोड़ना पड़ता है। - अंकित

वर्जन:
हमारे पास अभी तक इस संबंध में कोई ग्रांट नहीं आई है। न ही इस संबंध में कोई दस्तावेज हमारे पास आया है। पंचायती राज के पास पैसे आने के बाद तुरंत काम शुरू हो जाता है। - नरेश यादव, एक्सईएन पंचायती राज

गांव जाटवास की पंचायत द्वारा स्टेडियम के लिए निर्धारित जमीन की जमाबंदी व निर्धारित फीस विभाग को जमा करवा दी थी। उसके विभाग के उच्चाधिकारियों के पास दस्तावेज भेज दिए गए थे। खेल विभाग के कमिश्नर ने स्टेडियम बनाने का जिम्मा पंचायती राज विभाग को सौंपा था।
- जयसिंह पिलानिया, डीएसओ, महेंद्रगढ़।
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