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हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में मनाया गया पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस
Updated Thu, 17 Aug 2017 11:16 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
महेंद्रगढ़। हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग द्वारा भारतीय पुस्तकालय विज्ञान के जनक डॉ. एसआर रंगनाथन के जन्मदिवस पर पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस मनाया गया। इस अवसर पर विभाग के प्राध्यापक डॉ. पवन कुमार सैनी ने विद्यार्थियों को पुस्तकालय विज्ञान के क्षेत्र में डॉ. रंगनाथन के योगदान से अवगत कराया।
रंगनाथन का जन्म शियाली, मद्रास वर्तमान चेन्नई मे हुआ था। रंगनाथ की शिक्षा शियाली के हिन्दू हाई स्कूल, मद्रास क्रिशचन कॉलेज में और टीचर्स कॉलेज, सईदापेट्ट में हुई। 1924 में उन्हें मद्रास विश्वविद्यालय का पहला पुस्तकालयाध्यक्ष बनाया गया । 1945-47 के दौरान उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पुस्तकालयाध्यक्ष और पुस्तकालय विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया व 1947-54 के दौरान उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया। 1954-57 के दौरान वे ज्यूरिख, स्विट्जरलैंड में शोध और लेखन में व्यस्त रहे। इसके बाद वे भारत लौट आए और 1959 तक विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में अतिथि प्राध्यापक रहे। 1962 में उन्होंने बंगलोर में प्रलेखन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया और इसके प्रमुख बने और जीवन पर्यंत इससे जुड़े रहे। 1965 में भारत सरकार ने उन्हें पुस्तकालय विज्ञान में राष्ट्रीय शोध प्राध्यापक की उपाधि से सम्मानित किया।
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महेंद्रगढ़। हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग द्वारा भारतीय पुस्तकालय विज्ञान के जनक डॉ. एसआर रंगनाथन के जन्मदिवस पर पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस मनाया गया। इस अवसर पर विभाग के प्राध्यापक डॉ. पवन कुमार सैनी ने विद्यार्थियों को पुस्तकालय विज्ञान के क्षेत्र में डॉ. रंगनाथन के योगदान से अवगत कराया।
रंगनाथन का जन्म शियाली, मद्रास वर्तमान चेन्नई मे हुआ था। रंगनाथ की शिक्षा शियाली के हिन्दू हाई स्कूल, मद्रास क्रिशचन कॉलेज में और टीचर्स कॉलेज, सईदापेट्ट में हुई। 1924 में उन्हें मद्रास विश्वविद्यालय का पहला पुस्तकालयाध्यक्ष बनाया गया । 1945-47 के दौरान उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पुस्तकालयाध्यक्ष और पुस्तकालय विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया व 1947-54 के दौरान उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया। 1954-57 के दौरान वे ज्यूरिख, स्विट्जरलैंड में शोध और लेखन में व्यस्त रहे। इसके बाद वे भारत लौट आए और 1959 तक विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में अतिथि प्राध्यापक रहे। 1962 में उन्होंने बंगलोर में प्रलेखन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया और इसके प्रमुख बने और जीवन पर्यंत इससे जुड़े रहे। 1965 में भारत सरकार ने उन्हें पुस्तकालय विज्ञान में राष्ट्रीय शोध प्राध्यापक की उपाधि से सम्मानित किया।
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