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हम सबको देश की उन्नति के लिए एकजुट होना चाहिए : स्वामी विज्ञानानन्द
Updated Mon, 04 Sep 2017 12:39 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
महेंद्रगढ़। श्री गीता विज्ञान प्रचार समिति महेंद्रगढ़ के तत्वावधान में बाबा जयरामदास धर्मशाला में चल रही भागवत कथा में महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती ने गोवर्धन लीला, रासलीला आदि प्रसंगों में कहा कि भागवत कथा परमात्मा के प्रति प्रेम उत्पन्न करती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि आत्मा-परमात्मा का मिलन दो प्रकार से होता है। एक विचार से, दूसरे पुकार से। विचार ज्ञान है और पुकार शरणागति है। उन्होंने कहा कि परमात्मा अहम और ममता का हरण करते हैं। प्रजापति ब्रह्मा का मान मर्दन हुआ। इंद्र के अहम का हरण हुआ। यत्र तत्र सर्वत्र यह प्रतीत होता है कि भगवान अहम, ममता का भक्षण करते हैं। तीनों कालों में रहने वाला परमात्मा प्रेम का सागर है। ज्ञान, शांति सहित अनेक दिव्य गुणों का महासागर है। हमें चाहिए कि हम अपनी वृत्ति को नाशवान संसार की ओर न लगाकर परमात्मा में लगाएं। गोवर्धन लीला के प्रसंग पर कहा कि जैसे भगवान ने सबको एक किया। हम सबको देश, समाज की उन्नति के लिए एकजुट होना चाहिए। महामंडलेश्वर ने आचार्य श्याम के साथ श्रद्धालुओं को श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय को लेकर दैवी संपदा तथा आसुरी संपदा की व्याख्या की ।
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महेंद्रगढ़। श्री गीता विज्ञान प्रचार समिति महेंद्रगढ़ के तत्वावधान में बाबा जयरामदास धर्मशाला में चल रही भागवत कथा में महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती ने गोवर्धन लीला, रासलीला आदि प्रसंगों में कहा कि भागवत कथा परमात्मा के प्रति प्रेम उत्पन्न करती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि आत्मा-परमात्मा का मिलन दो प्रकार से होता है। एक विचार से, दूसरे पुकार से। विचार ज्ञान है और पुकार शरणागति है। उन्होंने कहा कि परमात्मा अहम और ममता का हरण करते हैं। प्रजापति ब्रह्मा का मान मर्दन हुआ। इंद्र के अहम का हरण हुआ। यत्र तत्र सर्वत्र यह प्रतीत होता है कि भगवान अहम, ममता का भक्षण करते हैं। तीनों कालों में रहने वाला परमात्मा प्रेम का सागर है। ज्ञान, शांति सहित अनेक दिव्य गुणों का महासागर है। हमें चाहिए कि हम अपनी वृत्ति को नाशवान संसार की ओर न लगाकर परमात्मा में लगाएं। गोवर्धन लीला के प्रसंग पर कहा कि जैसे भगवान ने सबको एक किया। हम सबको देश, समाज की उन्नति के लिए एकजुट होना चाहिए। महामंडलेश्वर ने आचार्य श्याम के साथ श्रद्धालुओं को श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय को लेकर दैवी संपदा तथा आसुरी संपदा की व्याख्या की ।