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Kurukshetra News: साक्ष्यों के अभाव में आरोपी पति को अदालत ने किया बरी
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कुरुक्षेत्र। लगभग साढ़े सात वर्ष पुराने दहेज उत्पीड़न, मारपीट, आपराधिक विश्वासघात और धमकी के मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अनमोल कक्कड़ अदालत ने आरोपी प्रीतपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा तथा उपलब्ध साक्ष्य दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों में कई महत्वपूर्ण कमियां और विरोधाभास पाए गए, जिस कारण आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया।
शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2012 में विवाह के बाद उसके पति प्रीतपाल और ससुराल पक्ष ने दहेज में कार, नकद राशि तथा अन्य मांगों को लेकर उसे प्रताड़ित किया। शिकायत में यह भी कहा गया था कि उनके गहने वापस नहीं किए गए, उनके साथ मारपीट की गई तथा जान से मारने की धमकियां दी गईं। इन आरोपों के आधार पर 29 सितंबर 2018 को थाना सदर थानेसर में भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 406, 498-ए और 506 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने कथित मारपीट की घटनाओं के संबंध में कोई चिकित्सीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता किसी विशेष तारीख, समय अथवा घटना का स्पष्ट विवरण देने में असमर्थ रही। इसके अतिरिक्त, विवाह के लगभग छह वर्ष बाद एफआईआर दर्ज होने को भी अदालत ने महत्वपूर्ण माना। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि आपराधिक मामलों में अभियोजन पर आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने का दायित्व होता है, जो अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर पाया।
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शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2012 में विवाह के बाद उसके पति प्रीतपाल और ससुराल पक्ष ने दहेज में कार, नकद राशि तथा अन्य मांगों को लेकर उसे प्रताड़ित किया। शिकायत में यह भी कहा गया था कि उनके गहने वापस नहीं किए गए, उनके साथ मारपीट की गई तथा जान से मारने की धमकियां दी गईं। इन आरोपों के आधार पर 29 सितंबर 2018 को थाना सदर थानेसर में भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 406, 498-ए और 506 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने कथित मारपीट की घटनाओं के संबंध में कोई चिकित्सीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता किसी विशेष तारीख, समय अथवा घटना का स्पष्ट विवरण देने में असमर्थ रही। इसके अतिरिक्त, विवाह के लगभग छह वर्ष बाद एफआईआर दर्ज होने को भी अदालत ने महत्वपूर्ण माना। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि आपराधिक मामलों में अभियोजन पर आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने का दायित्व होता है, जो अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर पाया।
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